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मंगलवार, 7 जुलाई 2009

कक्षा एक किताबें दस = शिक्षा का व्यवसायीकरण


कक्षा एक अर्थात अक्षर ज्ञान और अंक ज्ञान वाला पाठयक्रम जिसके एक थ्री इन वन पुस्तक भी पर्याप्त है लेकिन उसमें एक साथ दस किताबें पाठयक्रम में शामिल हैं क्योंकि ज्यों ज्यों किताबों की संख्या बढ़ती जाती है त्यों त्यों कमीशन बढ़ता जाता है।

ज्ञातव्य है कि सत्र हुए होने से पूर्व पुस्तक विक्रेता विद्यालय संचालकों से सीधा सम्पर्क कर उनके विद्यालय की छात्र संख्या जान लेते है और एकमुश्त कमीशन का आफर देते हैं जिसमें एक मात्र शर्त होती है कि जितनी अधिक किताबें बिकेगी उतना ही कमीशन बढ़ जाएगा। इस कमीशन को बढ़ाने के लिए कक्षा एक में भी 10 पुस्तकें शामिल कर दी जाती हैं। जिनमें गौर करने लायक बात यह होती है कि जिस विद्यार्थी को अक्षर और अंकों का भी ज्ञान नहीं है उसे अंग्रेजी में लिखी सामाजिक विषय, सामान्य ज्ञान और विज्ञान की भी पुस्तकें खरीदवा दी जाती हैं। चूंकि अक्षर और अंक ही सिखाने है इसलिए शेष किताबों से वर्षभर कोई वास्ता नहीं रहता। पूरी साल बच्चा उन्हें पीठ पर लादकर स्कूल ले जाता है और लाकर फिर खूंटी पर टांग देता है।

चूंकि अभिभावक की प्रबल इच्छा है अपने बच्चे को अंग्रेजी सिखाने की, इसलिए वह कुछ खर्च करने को तैयार रहता है लेकिन वर्ष के अन्त में फिर चकित हो जाता है क्योंकि जो कुछ किताब में वर्णित है उनमें से वह कुछ भी नहीं जानता। चूंकि सब स्कूलों का एक ही हाल है इसलिए जहां जाता हैं वहीं उसे कीमती व अनावश्यक पुस्तकें खरीदनी होती है।

नया शिक्षा का सत्र एक जुलाई से शुरू हो गया है । वहीं शिक्षा विभाग नए सत्र की तैयारियों में पिछले कई दिनों से मुस्तैदी से जुटा है। इधर अभिभावक भी अपने बच्चों के प्रवेश को लेकर चिंतित है कि वह अपने बच्चे को कहां दाखिल दिलाएं। जिससे उनके बच्चे को गुणवत्तापूर्ण पूरा शैक्षिक माहौल मिल सके।

वहीं गली-गली में बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह जून-जुलाई शुरू होते ही नए नए विद्यालय खुल चुके हैं, जिनमें प्रवेश के लिए कुछ विद्यालयों की टीम तो घर घर तक जाकर तथा पम्पलेट प्रसार के माध्यम से अपनी संस्था में प्रवेश दिलाने के लिए अभिभावकों को विश्वास दिला रही है। वहीं कशमकम की स्थिति में फंसे अभिभावक यह नहीं सोच पा रहे कि आखिर वह अपने बच्चों वह अपने बच्चों को कौन से विद्यालय में प्रवेश दिलाएं।

दूसरी ओर गांव से लेकर कस्बों तक तमाम ऐसे विद्यालय मिल जाएंगे जो मानकों की धज्जियां उड़ाते नजर आएंगे। जैसा कि विद्यालय की मान्यता लेने के लिए लैन्टर्ड, बिल्डिंग, पंखा, विद्युत व्यवस्था व अन्य सुविधाओं से युक्त होना जरूरी है। साथ ही विद्यालय कितने क्षेत्रफल में है, उसके लिए भी जमीन का निर्धारण किया गया है लेकिन ऐसे तमाम स्कूल है जो विद्यालय की मान्यता लेने के मानकों को मुंह चिढ़ाते रहे है। ना तो इन विद्यालयों की छत का पता है ना क्षेत्रफल का। लेकिन कहीं टिनशैड तो कहीं छप्परों के नीचे यह विद्यालय चलाए जा रहे है। वहीं कई विद्यालय जुलाई सत्र में और देखने को मिल जाएंगे जो मानकों को पूरा नहीं करते।

शिक्षा का व्यवसायीकरण होने के चलते विद्यालय खेलने को लेकर लोगों के बीच होड़ सी लगी है। भले ही इन विद्यालयों में छात्र-छात्राओं की सुविधाओं के लिए पूर्ण व्यवस्था हो या नही। बस बच्चों की संख्या बढ़ती जाए। यदि अभिभावक अपने बच्चों को प्रवेश दिलाने से पूर्व विद्यालय की व्यवस्थाओं की पूरी जानकारी लें तभी बच्चे को विद्यालय में प्रवेश दिलाये तो ऐसे विद्यालय स्वत: खत्म हो जाएंगे। लेकिन नजदीक में होने तथा फीस में थोड़ी सी सुविधा मिलने पर वह भी अन्य बातों को दरकिनार कर देते है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि मान्यता देते समय विभाग किन बातों की जांच करता है और क्या देखकर टिनशेड में चलाए जा रहे विद्यालयों को मान्यता दे देता है। जो विद्यालय की मान्यता लेने की कसौटी पर कसे भी नहीं जाते और आराम से कहीं भी किसी गली कूचे में दो कमरो के मकान में विद्यालय चलते चलते रहते है और विभाग को कोई खबर भी नहीं होती।

एक ओर शिक्षा विभाग नए सत्र के लिए बदले हुए शैक्षिक कलेवर को सुचारु रूप से लागू करने के लिए तैयारियां कर चुका है। वहीं दूसरी ओर बेसिक शिक्षा में अध्यापकों के समायोजन व स्थानान्तरण की प्रक्रिया अभी पूर्ण नहीं हो सकी है। शिक्षकों का कई विद्यालयों में अभाव है। भला कैसे उन बच्चों का विद्यालय में पहले दिन से ही अध्यापन कार्य शुरू करा जा सकेगा। हालांकि सरकार युद्ध स्तर पर नयी नयी नीतियों के साथ बेसिक एंव माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रयासरत है। देखना यह है कि यह प्रयास हकीकत में कितना सफल होता है। स्कूल चलो अभियान तथा 6-14 एवं 14-18 वर्ष की उम्र का एक भी बच्चा शिक्षा पाने से वंचित न रहने पाए। इसके लिए भी न्याय पंचायत स्तर पर विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों को जिम्मेदारियां बांटी गयी है। देखना यह है कि सरकार की यह मंशा केवल कागजी घोड़ों पर ही सरपट दौड़ेंगी या हकीकत में बेहतर परिणामों के साथ उबरकर सामने आएगी। यदि ऐसा हो पाया तो निश्चित ही विकसित भारत एवं शिक्षित भारतीय होने का स्वप्न पूरा हो सकेगा।

2 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय..अच्छा चिन्तन किया है.

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  2. आज शिक्षा शिक्षा नहीं रह गयी है .. व्‍यवसाय बन गयी है !!

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