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शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

१२ जुलाई - तीन भारतीय दिग्गजों की पुण्यतिथि का दिन

आज १२ जुलाई है ... विचित्र संयोग है कि आज ही के दिन भारत के तीन दिग्गजों की पुण्यतिथि होती है |
 
दारा सिंह (जन्म 19 नवंबर 1928; मृत्यु: 12 जुलाई 2012) ज्ञात हो कि गुरुवार १२ जुलाई २०१२ की सुबह 7.30 बजे अभिनेता महाबली दारा सिंह जी काफी दिनों तक जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद  दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। डाक्टरों ने बताया था कि उनके खून में ऑक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने वाले दारा सिंह जी अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लड़ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हुई थी उसे क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डेमीलीटेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह जी ने 1962 में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह जी को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था।
प्राण (जन्म: 12 फरवरी 1920; मृत्यु: 12 जुलाई 2013) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रमुख चरित्र अभिनेता थे जो मुख्यतः अपनी खलनायक की भूमिका के लिये जाने जाते हैं। कई बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार तथा बंगाली फ़िल्म फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड्स जीतने वाले इस भारतीय अभिनेता ने हिन्दी सिनेमा में 1940 से 1990 के दशक तक दमदार खलनायक और नायक का अभिनय किया। उन्होंने प्रारम्भ में 1940 से 1947 तक नायक के रूप में फ़िल्मों में अभिनय किया। इसके अलावा खलनायक की भूमिका में अभिनय 1942 से 1991 तक जारी रखा। उन्होंने 1948 से 2007 तक सहायक अभिनेता की तर्ज पर भी काम किया।अपने उर्वर अभिनय काल के दौरान उन्होंने 350 से अधिक फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने खानदान (1942), पिलपिली साहेब (1954) और हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमती (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर २०३ (1972), बे-ईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है।
सुशील कुमार चड्ढा उर्फ हुल्लड़ मुरादाबादी (जन्म: 29 मई 1942 ; मृत्यु: 12 जुलाई 2014) हुल्लड़ मुरादाबादी जी का शनिवार, 12 जुलाई 2014, की शाम करीब 4 बजे मुंबई स्थित आवास में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। हुल्लड़ मुरादाबादी के निधन की खबर से  कवि साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
इतनी ऊंची मत छोड़ो, क्या करेगी चांदनी, यह अंदर की बात है, तथाकथित भगवानों के नाम जैसी हास्य कविताओं से भरपूर पुस्तकें लिखने वाले हुल्लड़ मुरादाबादी को कलाश्री, अट्टहास सम्मान, हास्य रत्न सम्मान जैसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हुल्लड़ मुरादाबादी का जन्म 29 मई 1942 को गुजरावाला पाकिस्तान में हुआ था। बंटवारे के दौरान परिवार के साथ मुरादाबाद आ गए थे। बुध बाजार से स्टेशन रोड पर सबरवाल बिल्डिंग के पीछे दाहिनी ओर स्थित एक आवास में किराए पर उनका परिवार रहने लगा। बाद में पंचशील कालोनी (सेंट मैरी स्कूल के निकट, सिविल लाइंस) में उन्होंने अपना आवास बना लिया था।

 
आज के दिन हम सब इन तीनों दिग्गजों को शत शत नमन करते हैं |

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

तीन भारतीय दिग्गजों की पुण्यतिथि का दिन १२ जुलाई

आज १२ जुलाई है ... विचित्र संयोग है कि आज ही के दिन भारत के तीन दिग्गजों की पुण्यतिथि होती है |
 
दारा सिंह (जन्म 19 नवंबर 1928; मृत्यु: 12 जुलाई 2012) ज्ञात हो कि गुरुवार १२ जुलाई २०१२ की सुबह 7.30 बजे अभिनेता महाबली दारा सिंह जी काफी दिनों तक जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद  दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। डाक्टरों ने बताया था कि उनके खून में ऑक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने वाले दारा सिंह जी अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लड़ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हुई थी उसे क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डेमीलीटेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह जी ने 1962 में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह जी को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था।
प्राण (जन्म: 12 फरवरी 1920; मृत्यु: 12 जुलाई 2013) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रमुख चरित्र अभिनेता थे जो मुख्यतः अपनी खलनायक की भूमिका के लिये जाने जाते हैं। कई बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार तथा बंगाली फ़िल्म फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड्स जीतने वाले इस भारतीय अभिनेता ने हिन्दी सिनेमा में 1940 से 1990 के दशक तक दमदार खलनायक और नायक का अभिनय किया। उन्होंने प्रारम्भ में 1940 से 1947 तक नायक के रूप में फ़िल्मों में अभिनय किया। इसके अलावा खलनायक की भूमिका में अभिनय 1942 से 1991 तक जारी रखा। उन्होंने 1948 से 2007 तक सहायक अभिनेता की तर्ज पर भी काम किया।अपने उर्वर अभिनय काल के दौरान उन्होंने 350 से अधिक फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने खानदान (1942), पिलपिली साहेब (1954) और हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमती (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर २०३ (1972), बे-ईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है।
सुशील कुमार चड्ढा उर्फ हुल्लड़ मुरादाबादी (जन्म: 29 मई 1942 ; मृत्यु: 12 जुलाई 2014) हुल्लड़ मुरादाबादी जी का शनिवार, 12 जुलाई 2014, की शाम करीब 4 बजे मुंबई स्थित आवास में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। हुल्लड़ मुरादाबादी के निधन की खबर से  कवि साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
इतनी ऊंची मत छोड़ो, क्या करेगी चांदनी, यह अंदर की बात है, तथाकथित भगवानों के नाम जैसी हास्य कविताओं से भरपूर पुस्तकें लिखने वाले हुल्लड़ मुरादाबादी को कलाश्री, अट्टहास सम्मान, हास्य रत्न सम्मान जैसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हुल्लड़ मुरादाबादी का जन्म 29 मई 1942 को गुजरावाला पाकिस्तान में हुआ था। बंटवारे के दौरान परिवार के साथ मुरादाबाद आ गए थे। बुध बाजार से स्टेशन रोड पर सबरवाल बिल्डिंग के पीछे दाहिनी ओर स्थित एक आवास में किराए पर उनका परिवार रहने लगा। बाद में पंचशील कालोनी (सेंट मैरी स्कूल के निकट, सिविल लाइंस) में उन्होंने अपना आवास बना लिया था।

 
आज के दिन हम सब इन तीनों दिग्गजों को शत शत नमन करते हैं |

बुधवार, 12 जुलाई 2017

तीन दिग्गजों की पुण्यतिथि का दिन १२ जुलाई

आज १२ जुलाई है ... विचित्र संयोग है कि आज ही के दिन भारत के तीन दिग्गजों की पुण्यतिथि होती है |
दारा सिंह (जन्म 19 नवंबर 1928; मृत्यु: 12 जुलाई 2012) ज्ञात हो कि गुरुवार १२ जुलाई २०१२ की सुबह 7.30 बजे अभिनेता महाबली दारा सिंह जी काफी दिनों तक जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद  दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। डाक्टरों ने बताया था कि उनके खून में ऑक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने वाले दारा सिंह जी अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लड़ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हुई थी उसे क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डेमीलीटेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह जी ने 1962 में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह जी को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था।
प्राण (जन्म: 12 फरवरी 1920; मृत्यु: 12 जुलाई 2013) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रमुख चरित्र अभिनेता थे जो मुख्यतः अपनी खलनायक की भूमिका के लिये जाने जाते हैं। कई बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार तथा बंगाली फ़िल्म फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड्स जीतने वाले इस भारतीय अभिनेता ने हिन्दी सिनेमा में 1940 से 1990 के दशक तक दमदार खलनायक और नायक का अभिनय किया। उन्होंने प्रारम्भ में 1940 से 1947 तक नायक के रूप में फ़िल्मों में अभिनय किया। इसके अलावा खलनायक की भूमिका में अभिनय 1942 से 1991 तक जारी रखा। उन्होंने 1948 से 2007 तक सहायक अभिनेता की तर्ज पर भी काम किया।अपने उर्वर अभिनय काल के दौरान उन्होंने 350 से अधिक फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने खानदान (1942), पिलपिली साहेब (1954) और हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमती (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर २०३ (1972), बे-ईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है।
सुशील कुमार चड्ढा उर्फ हुल्लड़ मुरादाबादी (जन्म: 29 मई 1942 ; मृत्यु: 12 जुलाई 2014) हुल्लड़ मुरादाबादी जी का शनिवार, 12 जुलाई 2014, की शाम करीब 4 बजे मुंबई स्थित आवास में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। हुल्लड़ मुरादाबादी के निधन की खबर से  कवि साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
इतनी ऊंची मत छोड़ो, क्या करेगी चांदनी, यह अंदर की बात है, तथाकथित भगवानों के नाम जैसी हास्य कविताओं से भरपूर पुस्तकें लिखने वाले हुल्लड़ मुरादाबादी को कलाश्री, अट्टहास सम्मान, हास्य रत्न सम्मान जैसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हुल्लड़ मुरादाबादी का जन्म 29 मई 1942 को गुजरावाला पाकिस्तान में हुआ था। बंटवारे के दौरान परिवार के साथ मुरादाबाद आ गए थे। बुध बाजार से स्टेशन रोड पर सबरवाल बिल्डिंग के पीछे दाहिनी ओर स्थित एक आवास में किराए पर उनका परिवार रहने लगा। बाद में पंचशील कालोनी (सेंट मैरी स्कूल के निकट, सिविल लाइंस) में उन्होंने अपना आवास बना लिया था।

आज के दिन हम सब इन तीनों दिग्गजों को शत शत नमन करते हैं |

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

१२ जुलाई - तीन दिग्गजों की पुण्यतिथि

आज १२ जुलाई है ... विचित्र संयोग है कि आज ही के दिन भारत के तीन दिग्गजों की पुण्यतिथि होती है |

दारा सिंह (जन्म 19 नवंबर 1928; मृत्यु: 12 जुलाई 2012) ज्ञात हो कि गुरुवार १२ जुलाई २०१२ की सुबह 7.30 बजे अभिनेता महाबली दारा सिंह जी काफी दिनों तक जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद  दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। डाक्टरों ने बताया था कि उनके खून में ऑक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने वाले दारा सिंह जी अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लड़ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हुई थी उसे क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डेमीलीटेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह जी ने 1962 में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह जी को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था।
प्राण (जन्म: 12 फरवरी 1920; मृत्यु: 12 जुलाई 2013) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रमुख चरित्र अभिनेता थे जो मुख्यतः अपनी खलनायक की भूमिका के लिये जाने जाते हैं। कई बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार तथा बंगाली फ़िल्म फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड्स जीतने वाले इस भारतीय अभिनेता ने हिन्दी सिनेमा में 1940 से 1990 के दशक तक दमदार खलनायक और नायक का अभिनय किया। उन्होंने प्रारम्भ में 1940 से 1947 तक नायक के रूप में फ़िल्मों में अभिनय किया। इसके अलावा खलनायक की भूमिका में अभिनय 1942 से 1991 तक जारी रखा। उन्होंने 1948 से 2007 तक सहायक अभिनेता की तर्ज पर भी काम किया।अपने उर्वर अभिनय काल के दौरान उन्होंने 350 से अधिक फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने खानदान (1942), पिलपिली साहेब (1954) और हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमती (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर २०३ (1972), बे-ईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है।
सुशील कुमार चड्ढा उर्फ हुल्लड़ मुरादाबादी (जन्म: 29 मई 1942 ; मृत्यु: 12 जुलाई 2014) हुल्लड़ मुरादाबादी जी का शनिवार, 12 जुलाई 2014, की शाम करीब 4 बजे मुंबई स्थित आवास में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। हुल्लड़ मुरादाबादी के निधन की खबर से  कवि साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
इतनी ऊंची मत छोड़ो, क्या करेगी चांदनी, यह अंदर की बात है, तथाकथित भगवानों के नाम जैसी हास्य कविताओं से भरपूर पुस्तकें लिखने वाले हुल्लड़ मुरादाबादी को कलाश्री, अट्टहास सम्मान, हास्य रत्न सम्मान जैसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हुल्लड़ मुरादाबादी का जन्म 29 मई 1942 को गुजरावाला पाकिस्तान में हुआ था। बंटवारे के दौरान परिवार के साथ मुरादाबाद आ गए थे। बुध बाजार से स्टेशन रोड पर सबरवाल बिल्डिंग के पीछे दाहिनी ओर स्थित एक आवास में किराए पर उनका परिवार रहने लगा। बाद में पंचशील कालोनी (सेंट मैरी स्कूल के निकट, सिविल लाइंस) में उन्होंने अपना आवास बना लिया था।


आज के दिन हम सब इन तीनों दिग्गजों को शत शत नमन करते हैं |

शनिवार, 12 जुलाई 2014

रुस्तम ए हिन्द की दूसरी पुण्यतिथि पर नमन

आज रुस्तम ए हिन्द स्व ॰ दारा सिंह जी की दूसरी पुण्यतिथि है ... 2 साल पहले आज ही के दिन उनका लंबी बीमारी के बाद निधन हुआ था !

इंडिया के आयरन मैन
गौरतलब है कि कई दिनों तक अभिनेता महाबली दारा सिंह जी जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद गुरुवार १२ जुलाई २०१२ की सुबह 7.30 बजे दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। डाक्टरों ने बताया था कि उनके खून में ऑक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने वाले दारा सिंह जी अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लड़ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हुई थी उसे क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डेमीलीटेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह जी ने 1962 में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह जी को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था।
 
अखाड़े से फिल्मी दुनिया का सफर
 
अखाड़े से फिल्मी दुनिया तक का सफर दारा सिंह जी के लिए काफी चुनौती भरा रहा। दारा सिंह रंधावा का जन्म 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर के धरमूचक गांव में बलवंत कौर और सूरत सिंह रंधावा के घर हुआ था।

जार्ज गारडियांको को हराकर बने विश्व चैंपियन
 
दारा सिंह जी अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान थे। उन्होंने 1959 में विश्व चैंपियन जार्ज गारडियांको को कोलकाता में कामनवेल्थ खेल में हराकर विश्व चैंपियनशिप का खिताब हासिल किया। साठ के दशक में पूरे भारत में उनकी फ्री स्टाइल कुश्तियों का बोलबाला रहा। दारा सिंह जी ने अपने घर से ही कुश्ती की शुरूआत की थी।
 
भारतीय कुश्ती को दिलाई पहचान
 
दारा सिंह जी और उनके छोटे भाई सरदारा सिंह ने मिलकर पहलवानी शुरू कर दी और धीरे-धीरे गांव के दंगलों से लेकर शहरों में कुश्तियां जीतकर अपने गांव का नाम रोशन करना शुरू कर दिया और भारत में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश में जुट गए थे।
 
सिंगापुर से लौटकर बने चैंपियन
 
1947 में दारा सिंह जी सिंगापुर चले गए। वहां रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चैंपियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी। उसके बाद उनका विजयी रथ अन्य देशों की ओर चल पड़ा और एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी धाक जमाकर वे 1952 में भारत लौट आए। भारत आकर सन 1954 में वे भारतीय कुश्ती चैंपियन बने थे।
 
अपराजेय रहे दारा सिंह जी
 
उसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैंपियन किंगकाग को परास्त कर दिया था। दारा सिंह जी ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहां फ्रीस्टाइल कुश्तियां लड़ी जाती थीं। आखिरकार अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैंपियन बन गए। 1983 में उन्होंने अपराजेय पहलवान के रूप में कुश्ती से संन्यास ले लिया।
 
दारा सिंह जी का प्रेम
 
जब दारा सिंह जी ने पहलवानी के क्षेत्र में अपार लोकप्रियता प्राप्त कर ली तभी उन्हें अपनी पसंद की लड़की सुरजीत कौर मिल गई। आज दारा सिंह जी के भरे-पूरे परिवार में तीन बेटियां और दो बेटे हैं। दारा सिंह ने अपने समय की मशहूर अदाकारा मुमताज के साथ हिंदी की स्टंट फिल्मों में प्रवेश किया और कई फिल्मों में अभिनेता बने। यही नहीं कई फिल्मों में वह निर्देशक व निर्माता भी बने।
 
हनुमान बन बटोरी लोकप्रियता
 
 
उन्हें टीवी धारावाहिक रामायण में हनुमानजी के अभिनय से अपार लोकप्रियता मिली जिसके परिणाम स्वरूप भाजपा ने उन्हें राज्यसभा की सदस्यता भी प्रदान की। उन्होंने कई फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए थे। वर्ष 2007 में आई जब वी मेट उनकी आखिरी फिल्म थी। वर्ष 2002 में शरारत, 2001 में फर्ज, 2000 में दुल्हन हम ले जाएंगे, कल हो ना हो, 1999 में ज़ुल्मी, 1999 में दिल्लगी और इस तरह से अन्य कई फिल्में। लेकिन वर्ष 1976 में आई रामायण में जय बजरंग बली, हनुमानजी का किरदार निभाकर लाखों दिलों को जीत लिया था।

'रुस्तम ए हिन्द' स्व ॰ दारा सिंह जी को सभी की ओर से शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि |

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

पहली बरसी पर विशेष - अपराजेय रहे दारा सिंह

आज रुस्तम ए हिन्द स्व ॰ दारा सिंह जी की पहली बरसी है ... पिछले साल आज ही के दिन उनका लंबी बीमारी के बाद निधन हुआ था !

इंडिया के आयरन मैन
गौरतलब है कि कई दिनों तक अभिनेता महाबली दारा सिंह जी जिंदगी और मौत से लड़ने के बाद गुरुवार १२ जुलाई २०१२ की सुबह 7.30 बजे दुनिया से चल बसे। वह काफी दिनों तक मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में भर्ती थे। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कई दिनों तक उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। डाक्टरों ने बताया था कि उनके खून में ऑक्सीजन की भारी कमी थी। उनके गांव के गुरुद्वारे में उनकी सलामती की अरदास की जा रही थी। पूरे देश ने उनकी सलामती की दुआएं मांगी। रामायण में हनुमान बनकर भगवान लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लाने वाले दारा सिंह जी अपने असल जिंदगी में मौत से नहीं लड़ पाए। ताकत के इस प्रतीक को जो बीमारी हुई थी उसे क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डेमीलीटेटिंग पॉलीन्यूरोपैथी के नाम से जाना जाता है। कुश्ती की दुनिया में देश विदेश में अपनी कामयाबी का लोहा मनवाने वाले दारा सिंह जी ने 1962 में हिंदी फिल्मों से अभिनय की दुनिया में कदम रखा। पहलवानी से पहचान तो मिली ही थी, लेकिन रामायण सीरियल में हनुमान के किरदार ने दारा सिंह जी को हिंदुस्तान के दिलों में बसा दिया था।
 
अखाड़े से फिल्मी दुनिया का सफर
 
अखाड़े से फिल्मी दुनिया तक का सफर दारा सिंह जी के लिए काफी चुनौती भरा रहा। दारा सिंह रंधावा का जन्म 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर के धरमूचक गांव में बलवंत कौर और सूरत सिंह रंधावा के घर हुआ था।

जार्ज गारडियांको को हराकर बने विश्व चैंपियन
 
दारा सिंह जी अपने जमाने के विश्व प्रसिद्ध फ्रीस्टाइल पहलवान थे। उन्होंने 1959 में विश्व चैंपियन जार्ज गारडियांको को कोलकाता में कामनवेल्थ खेल में हराकर विश्व चैंपियनशिप का खिताब हासिल किया। साठ के दशक में पूरे भारत में उनकी फ्री स्टाइल कुश्तियों का बोलबाला रहा। दारा सिंह जी ने अपने घर से ही कुश्ती की शुरूआत की थी।
 
भारतीय कुश्ती को दिलाई पहचान
 
दारा सिंह जी और उनके छोटे भाई सरदारा सिंह ने मिलकर पहलवानी शुरू कर दी और धीरे-धीरे गांव के दंगलों से लेकर शहरों में कुश्तियां जीतकर अपने गांव का नाम रोशन करना शुरू कर दिया और भारत में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश में जुट गए थे।
 
सिंगापुर से लौटकर बने चैंपियन
 
1947 में दारा सिंह जी सिंगापुर चले गए। वहां रहते हुए उन्होंने भारतीय स्टाइल की कुश्ती में मलेशियाई चैंपियन तरलोक सिंह को पराजित कर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैंपियनशिप जीती थी। उसके बाद उनका विजयी रथ अन्य देशों की ओर चल पड़ा और एक पेशेवर पहलवान के रूप में सभी देशों में अपनी धाक जमाकर वे 1952 में भारत लौट आए। भारत आकर सन 1954 में वे भारतीय कुश्ती चैंपियन बने थे।
 
अपराजेय रहे दारा सिंह जी
 
उसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैंपियन किंगकाग को परास्त कर दिया था। दारा सिंह जी ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहां फ्रीस्टाइल कुश्तियां लड़ी जाती थीं। आखिरकार अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैंपियन बन गए। 1983 में उन्होंने अपराजेय पहलवान के रूप में कुश्ती से संन्यास ले लिया।
 
दारा सिंह जी का प्रेम
 
जब दारा सिंह जी ने पहलवानी के क्षेत्र में अपार लोकप्रियता प्राप्त कर ली तभी उन्हें अपनी पसंद की लड़की सुरजीत कौर मिल गई। आज दारा सिंह जी के भरे-पूरे परिवार में तीन बेटियां और दो बेटे हैं। दारा सिंह ने अपने समय की मशहूर अदाकारा मुमताज के साथ हिंदी की स्टंट फिल्मों में प्रवेश किया और कई फिल्मों में अभिनेता बने। यही नहीं कई फिल्मों में वह निर्देशक व निर्माता भी बने।
 
हनुमान बन बटोरी लोकप्रियता
उन्हें टीवी धारावाहिक रामायण में हनुमानजी के अभिनय से अपार लोकप्रियता मिली जिसके परिणाम स्वरूप भाजपा ने उन्हें राज्यसभा की सदस्यता भी प्रदान की। उन्होंने कई फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए थे। वर्ष 2007 में आई जब वी मेट उनकी आखिरी फिल्म थी। वर्ष 2002 में शरारत, 2001 में फर्ज, 2000 में दुल्हन हम ले जाएंगे, कल हो ना हो, 1999 में ज़ुल्मी, 1999 में दिल्लगी और इस तरह से अन्य कई फिल्में। लेकिन वर्ष 1976 में आई रामायण में जय बजरंग बली, हनुमानजी का किरदार निभाकर लाखों दिलों को जीत लिया था।

'रुस्तम ए हिन्द' स्व ॰ दारा सिंह जी को सभी की ओर से शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि |

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