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गुरुवार, 29 अगस्त 2019

'हॉकी के जादूगर' दद्दा ध्यानचंद की ११४ वीं जयंती

'हॉकी के जादूगर' ध्यानचंद के जन्म दिन पर 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल भी है। आइये  कुछ बातें करें हॉकी की ... और हॉकी के जादूगर की  ...
 
पुराना है इतिहास
 
ओलंपिक खेलों से भी काफी पुराना है हॉकी का खेल। दुनिया की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में इस खेल का प्रमाण मिलता है। अरब, ग्रीक, रोमन, परसियन, सभी किसी न किसी रूप में अपने तरीके से हॉकी खेलते थे। बेशक वह इस खेल का पुराना रूप था। धीरे-धीरे विकसित होते हुए यह आधुनिक रूप में आया। आधुनिक हॉकी यानी फील्ड हॉकी का विकास किया था ब्रिटेन के लोगों ने। यह समय था 19वीं सदी के आसपास का।
 
भारत में हॉकी
 
भारत में हॉकी लाने वाले ब्रिटिशर्स ही थे। उस समय स्कूलों मे यह छात्रों का फेवरेट गेम हुआ करता था। धीरे-धीरे इस गेम की लोकप्रियता बढ़ने लगी। भारत में पहला हॉकी क्लब कोलकाता में बना। इसके बाद मुंबई और पंजाब में। पहली बार एम्सटर्डम ओलंपिक गेम में भारत की हॉकी की प्रतिभा सामने आई। इसमें भारतीय हॉकी टीम ने ओलंपिक का पहला स्वर्ण पदक जीता। पूरा एम्सटर्डम स्टेडियम भारतीय हॉकी टीम की वाहवाही कर रहा था और विशेष रूप से उस शख्स का, जिसे हम कहते हैं 'हॉकी के जादूगर' मेजर ध्यानचंद सिंह।
 
बलबीर का करिश्मा
 
वर्ष 1928-1956 की अवधि को भारतीय हॉकी का स्वर्णकाल माना जाता है। ध्यानचंद के अलावा एक और नाम इस दौरान सबकी जुबान पर था। यह नाम था बलबीर सिंह। तीन दशक तक यह सितारा भारतीय हॉकी टीम में चमकता रहा। महज यह संयोग कहा जा सकता है कि अलग-अलग पांच खिलाड़ियों का नाम बलबीर सिंह था। बलबीर सिंह ने भारतीय हॉकी टीम की जीत में अपना अहम रोल निभाया था। आज भी हॉकी के दिग्गज और संभावनाशील खिलाड़ी हैं, जो भारत का नाम रोशन कर रहे हैं। इनमें धनराज पिल्लई, दिलीप टर्की, प्रबोध टर्की, बलजीत सिंह, तुषार खांडेकर जैसे कई खिलाड़ियों का नाम लिया जा सकता है।
 
दद्दा की जादूगरी 'हॉकी के जादूगर' मेजर ध्यानचंद सिंह को लोग प्यार और सम्मान से कहते थे-दद्दा। जबकि उनके नाम में चंद शब्द जोड़ा था उनके कोच पंकज गुप्ता ने। उनकी प्रतिभा देखकर उन्हें यह आभास हो चुका था कि हॉकी के आसमान पर सितारों के बीच अगर कोई चांद बनने की काबिलियत रखता है, तो वह ध्यान सिंह ही हैं। 


और हां, लेजेंड क्रिकेटर सर डॉन ब्रैडमैन ने उनका खेल देखकर कहा था कि वे हॉकी से गोल ऐसे दागते हैं, जैसे कि वे क्रिकेट के बल्ले से रन बना रहे हों।
 
हॉकी के इस बादशाह का जन्म 29 अगस्त, 1905 को हुआ था। उन्होंने आर्मी से अपना करियर शुरू किया। यहीं उनकी प्रतिभा की पहचान हुई। वे सेंटर फॉरवर्ड पोजीशन पर खेलते थे। उनके गोल करने के जादुई कारनामे को देखकर पूरा खेल जगत हतप्रभ रह जाता था। कहते हैं कि उनकी प्रतिभा की भनक हिटलर को लगी, तो उसने ध्यानचंद को जर्मन आर्मी ज्वाइन करने का ऑफर दे दिया था। दद्दा की जादूगरी कमाल की थी। उनकी कैप्टनशिप में भारत ने ओलंपिक में तीन बार गोल्ड मेडल जीता था। उन्हें पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया। 


दद्दा को सम्मान देने के खातिर ही देश में कई जगह उनकी हॉकी खेलने की मुद्रा में मूर्तियां लगाई गई हैं। जैसे, इंडिया गेट के नजदीक नेशनल स्टेडियम में और आंध्र प्रदेश के मेडक में। विदेशों में भी हॉकी बॉल पर स्टिक की मास्टरी प्रदर्शित करते हुए स्टेचू लगाए गए हैं। वियाना और ऑस्ट्रिया रेजिडेंट्स ने भी उन्हें इस सम्मान से नवाजा है।

११४ वीं जयंती पर दद्दा ध्यानचंद को हम सभी का शत शत नमन |

शनिवार, 24 अगस्त 2019

अमर शहीद राजगुरु जी की १११ वीं जयंती

 
शिवराम हरि राजगुरु (मराठी: शिवराम हरी राजगुरू, जन्म:२४ अगस्त १९०८ - मृत्यु: २३ मार्च १९३१) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे । इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ २३ मार्च १९३१ को फाँसी पर लटका दिया गया था । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजगुरु की शहादत एक महत्वपूर्ण घटना थी ।

शिवराम हरि राजगुरु का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् १९६५ (विक्रमी) तदनुसार सन् १९०८ में पुणेजिला के खेडा गाँव में हुआ था । ६ वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे । इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदो का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बडे प्रशंसक थे ।

वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ । चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं। पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी।

२३ मार्च १९३१ को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया ।
 
आज अमर शहीद राजगुरु जी की १११ वीं जयंती के मौके पर हम सब उनको शत शत नमन करते है ! 
 
इंकलाब ज़िंदाबाद !!

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