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बुधवार, 17 मार्च 2021

भारत के दो नायाब नगीनों की जयंती का दिन - १७ मार्च

 आज १७ मार्च है ... आज का दिन जुड़ा हुआ है भारत के दो नायाब नगीनों से ... एक हैं ... भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच और दूसरी हैं ... कल्पना चावला , पहली महिला भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ |

आज इन दोनों की ही जयंती है | आइये थोड़ा जानते हैं इन दोनों ही के बारे में ...

 
भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच का जन्म 17 मार्च 1913 को कोमिली जिले के धमती गांव में जन्म हुआ। यह गांव अब बांग्लादेश में है।
 
बचपन से ही रेसलिंग और वेट लिफ्टिंग जैसे खेलों में रुचि रखने वाले मनोहर को 12 साल की उम्र में बीमारी ने घेर लिया और उनकी सेहत काफी खराब हो गई। सेहत वापस पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत और एक्सरसाइज की। तभी उन्होंने बॉडी बिल्डिंग एक्सरसाइज (जैसे पुश अप्स, सिट अप्स) करनी शुरू की।

फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग कहे जाने वाले मनोहर 1952 में मिस्टर यूनिवर्स बने थे। छोटे कद (4 फीट 11 इंच) के कारण उन्हें ‘पॉकेट हर्क्युलिस’ भी कहा जाता था । इन्होंने एशियन गेम्स में तीन बार गोल्ड मेडल (1951, 1954 और 1958) भी जीता था|

५ जून २०१६ को १०२ वर्ष की आयु मे इन का देहांत हो गया | 

इन के बारे के और अधिक जानने के लिए यहाँ पढ़ें
 
कल्पना चावला (पंजाबी: ਕਲਪਨਾ ਚਾਵਲਾ) (१७ मार्च , १९६२ - १ फ़रवरी २००३), एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे १ फ़रवरी २००३ को हुए कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।

उनका जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे एक भारतीय परिवार मे हुआ था। उन के पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला तथा और माता का नाम संजयोती था | वह अपने परिवार के चार भाई बहनो मे सबसे छोटी थी | कल्पना की प्रारंभिक पढाई लिखाई “टैगोर बाल निकेतन” मे हुई | कलपना जब आठवी कक्षा मे पहुची तो उसने इंजिनयर बनने की इच्छा प्रकट की | उसकी माँ ने अपनी बेटी की भावनाओ को समझा और आगे बढने मे मदद की | पिता उसे चिकित्सक या शिक्षिका बनाना चाहते थे । किंतु कल्पना बचपन से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी ।कल्पना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण था - उसकी लगन और जुझार प्रवृति | कलपना न तो काम करने मे आलसी थी और न असफलता मे घबराने वाली थी | उनकी उड़ान में दिलचस्पी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा, से प्रेरित थी जो एक अग्रणी भारतीय विमान चालक और उद्योगपति थे।
 

भारत के इन दो नायाब नगीनों की जयंती के दिन हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं |

रविवार, 17 मार्च 2019

१७ मार्च - भारत के दो नायाब नगीनों की जयंती का दिन

आज १७ मार्च है ... आज का दिन जुड़ा हुआ है भारत के दो नायाब नगीनों से ... एक हैं ... भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच और दूसरी हैं ... कल्पना चावला , पहली महिला भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ |

आज इन दोनों की ही जयंती है | आइये थोड़ा जानते हैं इन दोनों ही के बारे में ... 

 
भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच का जन्म 17 मार्च 1913 को कोमिली जिले के धमती गांव में जन्म हुआ। यह गांव अब बांग्लादेश में है।
 
बचपन से ही रेसलिंग और वेट लिफ्टिंग जैसे खेलों में रुचि रखने वाले मनोहर को 12 साल की उम्र में बीमारी ने घेर लिया और उनकी सेहत काफी खराब हो गई। सेहत वापस पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत और एक्सरसाइज की। तभी उन्होंने बॉडी बिल्डिंग एक्सरसाइज (जैसे पुश अप्स, सिट अप्स) करनी शुरू की।

फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग कहे जाने वाले मनोहर 1952 में मिस्टर यूनिवर्स बने थे। छोटे कद (4 फीट 11 इंच) के कारण उन्हें ‘पॉकेट हर्क्युलिस’ भी कहा जाता था । इन्होंने एशियन गेम्स में तीन बार गोल्ड मेडल (1951, 1954 और 1958) भी जीता था|

५ जून २०१६ को १०२ वर्ष की आयु मे इन का देहांत हो गया | 

इन के बारे के और अधिक जानने के लिए यहाँ पढ़ें
कल्पना चावला (पंजाबी: ਕਲਪਨਾ ਚਾਵਲਾ) (१७ मार्च , १९६२ - १ फ़रवरी २००३), एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे १ फ़रवरी २००३ को हुए कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।

उनका जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे एक भारतीय परिवार मे हुआ था। उन के पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला तथा और माता का नाम संजयोती था | वह अपने परिवार के चार भाई बहनो मे सबसे छोटी थी | कल्पना की प्रारंभिक पढाई लिखाई “टैगोर बाल निकेतन” मे हुई | कलपना जब आठवी कक्षा मे पहुची तो उसने इंजिनयर बनने की इच्छा प्रकट की | उसकी माँ ने अपनी बेटी की भावनाओ को समझा और आगे बढने मे मदद की | पिता उसे चिकित्सक या शिक्षिका बनाना चाहते थे । किंतु कल्पना बचपन से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी ।कल्पना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण था - उसकी लगन और जुझार प्रवृति | कलपना न तो काम करने मे आलसी थी और न असफलता मे घबराने वाली थी | उनकी उड़ान में दिलचस्पी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा, से प्रेरित थी जो एक अग्रणी भारतीय विमान चालक और उद्योगपति थे।
 

भारत के इन दो नायाब नगीनों की जयंती के दिन हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं |

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

कल्पना चावला की १६ वीं पुण्यतिथि

कल्पना चावला (पंजाबी: ਕਲਪਨਾ ਚਾਵਲਾ) (१७ मार्च , १९६२ - १ फ़रवरी २००३), एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।

प्रारंभिक जीवन

भारत की बेटी-कल्पना चावला करनाल, हरियाणा, भारत. में एक हिंदू भारतीय परिवार में पैदा हुई थीं। उनका जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे एक भारतीय परिवार मे हुआ था। उसके पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला तथा और माता का नाम संजयोती था | वह अपने परिवार के चार भाई बहनो मे सबसे छोटी थी | घर मे सब उसे प्यार से मोंटू कहते थे | कल्पना की प्रारंभिक पढाई लिखाई “टैगोर बाल निकेतन” मे हुई | कलपना जब आठवी कक्षा मे पहुची तो उसने इंजिनयर बनने की इच्छा प्रकट की | उसकी माँ ने अपनी बेटी की भावनाओ को समझा और आगे बढने मे मदद की | पिता उसे चिकित्सक या शिक्षिका बनाना चाहते थे । किंतु कल्पना बचपन से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी ।कल्पना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण था - उसकी लगन और जुझार प्रवृति | कलपना न तो काम करने मे आलसी थी और न असफलता मे घबराने वाली थी | उनकी उड़ान में दिलचस्पी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा, से प्रेरित थी जो एक अग्रणी भारतीय विमान चालक और उद्योगपति थे।

शिक्षा

कल्पना चावला ने प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल से प्राप्त की। आगे की शिक्षा वैमानिक अभियान्त्रिकी में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ ,भारत से करते हुए १९८२ में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए १९८२ में चली गईं और वैमानिक अभियान्त्रिकी में विज्ञान निष्णात की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की (१९८४)। कल्पना जी ने १९८६ में दूसरी विज्ञान निष्णात की उपाधि पाई और १९८८ में कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से वैमानिक अभियंत्रिकी में विद्या वाचस्पति की उपाधि पाई। कल्पना जी को हवाईजहाज़ों, ग्लाइडरों व व्यावसायिक विमानचालन के लाइसेंसों के लिए प्रमाणित उड़ान प्रशिक्षक का दर्ज़ा हासिल था। उन्हें एकल व बहु इंजन वायुयानों के लिए व्यावसायिक विमानचालक के लाइसेंस भी प्राप्त थे। अन्तरिक्ष यात्री बनने से पहले वो एक सुप्रसिध नासा कि वैज्ञानिक थी।


एम्स अनुसंधान केंद्र

१९८८ के अंत में उन्होंने नासा के एम्स अनुसंधान केंद्र के लिए ओवेर्सेट मेथड्स इंक के उपाध्यक्ष के रूप में काम करना शुरू किया, उन्होंने वहाँ वी/एसटीओएल में सीएफ़डी पर अनुसंधान किया। 

नासा कार्यकाल

कल्पना जी मार्च १९९५ में नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुईं और उन्हें १९९८ में अपनी पहली उड़ान के लिए चुना गया था। उनका पहला अंतरिक्ष मिशन १९ नवम्बर, १९९७ को छह अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-८७ से शुरू हुआ। कल्पना जी अंतरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मी महिला थीं और अंतरिक्ष में उड़ाने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थीं। राकेश शर्मा ने १९८४ में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थी। कल्पना जी अपने पहले मिशन में १.०४ करोड़ मील का सफ़र तय कर के पृथ्वी की २५२ परिक्रमाएँ कीं, और अंतरिक्ष में ३६० से अधिक घंटे बिताए। एसटीएस-८७ के दौरान स्पार्टन उपग्रह को तैनात करने के लिए भी ज़िम्मेदार थीं, इस खराब हुए उपग्रह को पकड़ने के लिए विंस्टन स्कॉट और तकाओ दोई को अंतरिक्ष में चलना पड़ा था। पाँच महीने की तफ़्तीश के बाद नासा ने कल्पना चावला को इस मामले में पूर्णतया दोषमुक्त पाया, त्रुटियाँ तंत्रांश अंतरापृष्ठों व यान कर्मचारियों तथा ज़मीनी नियंत्रकों के लिए परिभाषित विधियों में मिलीं।

एसटीएस-८७ की उड़ानोपरांत गतिविधियों के पूरा होने पर कल्पना जी ने अंतरिक्ष यात्री कार्यालय में, तकनीकी पदों पर काम किया, उनके यहाँ के कार्यकलाप को उनके साथियों ने विशेष पुरस्कार दे के सम्मानित किया।
१९८३ में वे एक उड़ान प्रशिक्षक और विमानन लेखक, जीन पियरे हैरीसन से मिलीं और शादी की, और १९९० में एक देशीयकृत संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिक बनीं।
भारत के लिए चावला की आखिरी यात्रा १९९१-१९९२ के नए साल की छुट्टी के दौरान थी जब वे और उनके पति, परिवार के साथ समय बिताने गए थे। २००० में उन्हें एसटीएस-१०७ में अपनी दूसरी उड़ान के कर्मचारी के तौर पर चुना गया। यह अभियान लगातार पीछे सरकता रहा, क्योंकि विभिन्न कार्यों के नियोजित समय में टकराव होता रहा और कुछ तकनीकी समस्याएँ भी आईं, जैसे कि शटल इंजन बहाव अस्तरों में दरारें। 

१६ जनवरी २००३ को कल्पना जी ने अंततः कोलंबिया पर चढ़ के विनाशरत एसटीएस-१०७ मिशन का आरंभ किया। उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल थे स्पेसहैब/बल्ले-बल्ले/फ़्रीस्टार लघुगुरुत्व प्रयोग जिसके लिए कर्मचारी दल ने ८० प्रयोग किए, जिनके जरिए पृथ्वी व अंतरिक्ष विज्ञान, उन्नत तकनीक विकास व अंतरिक्ष यात्री स्वास्थ्य व सुरक्षा का अध्ययन हुआ। कोलंबिया अन्तरिक्ष यान में उनके साथ अन्य यात्री थे-• कमांडर रिक डी . हुसबंद • पायलट विलियम स. मैकूल • कमांडर माइकल प . एंडरसन • इलान रामों • डेविड म . ब्राउन • लौरेल बी .क्लार्क

अंतरिक्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा साबित हुई। सभी तरह के अनुसंधान तथा विचार - विमर्श के उपरांत वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल मे अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय जिस तरह की भयंकर घटना घटी वह अब इतिहास की बात हो गई | नासा तथा विश्व के लिये यह एक दर्दनाक घटना थी | १ फ़रवरी २००३ को कोलंबिया अंतरिक्षयान पृथ्वी की कक्षा मे प्रवेश करते ही टूटकर बिखर गया । देखते ही देखते अंतरिक्ष यान और उसमें सवार सातों यात्रियों के अवशेष टेक्सास नामक शहर पर बरसने लगे और सफ़ल कहलया जाने वाला अभियान भीषण सत्य बन गया ।
ये अंतरिक्ष यात्री तो सितारों की दुनिया में विलीन हो गए लेकिन इनके अनुसंधानों का लाभ पूरे विश्व को अवश्य मिलेगा । इस तरह कल्पना चावला के यह शब्द सत्य हो गए, 

"मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूँ ।प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूँगी |"
 

१६ वीं पुण्यतिथि पर भारत की इस महान बेटी को हम सब का शत शत नमन |

मंगलवार, 5 जून 2018

‘पॉकेट हर्क्युलिस’ मनोहर आइच की द्वितीय पुण्यतिथि

 
भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच का ०५ जून २०१६ को कोलकाता मे निधन हो गया | वे १०२ वर्ष के थे |

फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग कहे जाने वाले मनोहर 1952 में मिस्टर यूनिवर्स बने थे। छोटे कद (4 फीट 11 इंच) के कारण उन्हें ‘पॉकेट हर्क्युलिस’ भी कहा जाता था । इन्होंने एशियन गेम्स में तीन बार गोल्ड मेडल (1951, 1954 और 1958) भी जीता था| 


मनोहर आइच का शुरुआती जीवनः
 
*17 मार्च 1913 को कोमिली जिले के धमती गांव में जन्म हुआ। यह गांव अब बांग्लादेश में है।
*बचपन से ही रेसलिंग और वेट लिफ्टिंग जैसे खेलों में रुचि रखने वाले मनोहर को 12 साल की उम्र में बीमारी ने घेर लिया और उनकी सेहत काफी खराब हो गई।
*सेहत वापस पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत और एक्सरसाइज की। तभी उन्होंने बॉडी बिल्डिंग एक्सरसाइज (जैसे पुश अप्स, सिट अप्स) करनी शुरू की।
*ढाका में स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने मशहूर जादूगर पीसी सरकार सीनियर के साथ शोज में प्रदर्शन करना शुरू किया।
 
पेशेवर जीवन :
 
*1942 में रॉयल एयरफोर्स ज्वाइन किया। साथ ही बॉडी बिल्डिंग भी करते रहे।
*रॉयल एयरफोर्स में रहते हुए एक ब्रिटिश ऑफिसर रियूब मार्टिन ने उन्हें सराहा औऱ इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
*तभी एक ब्रिटिश अफसर को चांटा मारने के कारण मनोहर आइच को जेल हो गई। तब जेल में ही उन्होंने वेट ट्रेनिंग शुरू की। इसे देखते हुए जेल स्टाफ ने उनके लिए खास डाइट की भी व्यवस्था की थी।
*1950 में 37 साल की उम्र में मनोहर ने मिस्टर हर्क्युलिस कॉन्टेस्ट जीता। 1951 में हुए मिस्टर यूनिवर्स कॉन्टेस्ट में वो दूसरे स्थान पर रहे और 1952 में मिस्टर यूनिवर्स का खिताब जीत लिया।
*वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीतने के बाद 1955 में हुई मिस्टर यूनिवर्स प्रतियोगिता में तीसरे स्थान पर रहे और 1960 में हुए इसी कॉन्टेस्ट में चौथे नंबर पर। तब उनकी उम्र 47 साल थी।
*1960 के बाद से मनोहर ऐच ने कई बॉडी बिल्डिंग शोज किए। उन्होंने अपना आखिरी शो साल 2003 में 90 साल की उम्र में किया था।
 
 
व्यक्तिगत जीवन : 

*उनकी पत्नी का नाम ज्यूथिका आइच था। 2002 में उनका निधन हो गया|
*मनोहर आइच के दो बेटे और दो बेटियां हैं। उनका एक बेटा अखाड़ा चलाता है तो दूसरा फिटनेस हेल्थ सेंटर।
 
हम सब श्री मनोहर आइच जी को अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि देते है और सादर नमन करते हैं |

शनिवार, 17 मार्च 2018

भारत के दो नायाब नगीनों की जयंती का दिन - १७ मार्च

आज १७ मार्च है ... आज का दिन जुड़ा हुआ है भारत के दो नायाब नगीनों से ... एक हैं ... भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच और दूसरी हैं ... कल्पना चावला , पहली महिला भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ |

आज इन दोनों की ही जयंती है | आइये थोड़ा जानते हैं इन दोनों ही के बारे में ... 

 
भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच का जन्म 17 मार्च 1913 को कोमिली जिले के धमती गांव में जन्म हुआ। यह गांव अब बांग्लादेश में है।
 
बचपन से ही रेसलिंग और वेट लिफ्टिंग जैसे खेलों में रुचि रखने वाले मनोहर को 12 साल की उम्र में बीमारी ने घेर लिया और उनकी सेहत काफी खराब हो गई। सेहत वापस पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत और एक्सरसाइज की। तभी उन्होंने बॉडी बिल्डिंग एक्सरसाइज (जैसे पुश अप्स, सिट अप्स) करनी शुरू की।

फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग कहे जाने वाले मनोहर 1952 में मिस्टर यूनिवर्स बने थे। छोटे कद (4 फीट 11 इंच) के कारण उन्हें ‘पॉकेट हर्क्युलिस’ भी कहा जाता था । इन्होंने एशियन गेम्स में तीन बार गोल्ड मेडल (1951, 1954 और 1958) भी जीता था|

५ जून २०१६ को १०२ वर्ष की आयु मे इन का देहांत हो गया | 

इन के बारे के और अधिक जानने के लिए यहाँ पढ़ें

कल्पना चावला (पंजाबी: ਕਲਪਨਾ ਚਾਵਲਾ) (१७ मार्च , १९६२ - १ फ़रवरी २००३), एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे १ फ़रवरी २००३ को हुए कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।

उनका जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे एक भारतीय परिवार मे हुआ था। उन के पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला तथा और माता का नाम संजयोती था | वह अपने परिवार के चार भाई बहनो मे सबसे छोटी थी | कल्पना की प्रारंभिक पढाई लिखाई “टैगोर बाल निकेतन” मे हुई | कलपना जब आठवी कक्षा मे पहुची तो उसने इंजिनयर बनने की इच्छा प्रकट की | उसकी माँ ने अपनी बेटी की भावनाओ को समझा और आगे बढने मे मदद की | पिता उसे चिकित्सक या शिक्षिका बनाना चाहते थे । किंतु कल्पना बचपन से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी ।कल्पना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण था - उसकी लगन और जुझार प्रवृति | कलपना न तो काम करने मे आलसी थी और न असफलता मे घबराने वाली थी | उनकी उड़ान में दिलचस्पी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा, से प्रेरित थी जो एक अग्रणी भारतीय विमान चालक और उद्योगपति थे।
 

भारत के इन दो नायाब नगीनों की जयंती के दिन हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं |

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

कल्पना चावला की १५ वीं पुण्यतिथि



कल्पना चावला (पंजाबी: ਕਲਪਨਾ ਚਾਵਲਾ) (१७ मार्च , १९६२ - १ फ़रवरी २००३), एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।

प्रारंभिक जीवन

भारत की बेटी-कल्पना चावला करनाल, हरियाणा, भारत. में एक हिंदू भारतीय परिवार में पैदा हुई थीं। उनका जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे एक भारतीय परिवार मे हुआ था। उसके पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला तथा और माता का नाम संजयोती था | वह अपने परिवार के चार भाई बहनो मे सबसे छोटी थी | घर मे सब उसे प्यार से मोंटू कहते थे | कल्पना की प्रारंभिक पढाई लिखाई “टैगोर बाल निकेतन” मे हुई | कलपना जब आठवी कक्षा मे पहुची तो उसने इंजिनयर बनने की इच्छा प्रकट की | उसकी माँ ने अपनी बेटी की भावनाओ को समझा और आगे बढने मे मदद की | पिता उसे चिकित्सक या शिक्षिका बनाना चाहते थे । किंतु कल्पना बचपन से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी ।कल्पना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण था - उसकी लगन और जुझार प्रवृति | कलपना न तो काम करने मे आलसी थी और न असफलता मे घबराने वाली थी | उनकी उड़ान में दिलचस्पी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा, से प्रेरित थी जो एक अग्रणी भारतीय विमान चालक और उद्योगपति थे।

शिक्षा

कल्पना चावला ने प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल से प्राप्त की। आगे की शिक्षा वैमानिक अभियान्त्रिकी में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ ,भारत से करते हुए १९८२ में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए १९८२ में चली गईं और वैमानिक अभियान्त्रिकी में विज्ञान निष्णात की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की (१९८४)। कल्पना जी ने १९८६ में दूसरी विज्ञान निष्णात की उपाधि पाई और १९८८ में कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से वैमानिक अभियंत्रिकी में विद्या वाचस्पति की उपाधि पाई। कल्पना जी को हवाईजहाज़ों, ग्लाइडरों व व्यावसायिक विमानचालन के लाइसेंसों के लिए प्रमाणित उड़ान प्रशिक्षक का दर्ज़ा हासिल था। उन्हें एकल व बहु इंजन वायुयानों के लिए व्यावसायिक विमानचालक के लाइसेंस भी प्राप्त थे। अन्तरिक्ष यात्री बनने से पहले वो एक सुप्रसिध नासा कि वैज्ञानिक थी।


एम्स अनुसंधान केंद्र

१९८८ के अंत में उन्होंने नासा के एम्स अनुसंधान केंद्र के लिए ओवेर्सेट मेथड्स इंक के उपाध्यक्ष के रूप में काम करना शुरू किया, उन्होंने वहाँ वी/एसटीओएल में सीएफ़डी पर अनुसंधान किया। 

नासा कार्यकाल

कल्पना जी मार्च १९९५ में नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुईं और उन्हें १९९८ में अपनी पहली उड़ान के लिए चुना गया था। उनका पहला अंतरिक्ष मिशन १९ नवम्बर, १९९७ को छह अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-८७ से शुरू हुआ। कल्पना जी अंतरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मी महिला थीं और अंतरिक्ष में उड़ाने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थीं। राकेश शर्मा ने १९८४ में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थी। कल्पना जी अपने पहले मिशन में १.०४ करोड़ मील का सफ़र तय कर के पृथ्वी की २५२ परिक्रमाएँ कीं, और अंतरिक्ष में ३६० से अधिक घंटे बिताए। एसटीएस-८७ के दौरान स्पार्टन उपग्रह को तैनात करने के लिए भी ज़िम्मेदार थीं, इस खराब हुए उपग्रह को पकड़ने के लिए विंस्टन स्कॉट और तकाओ दोई को अंतरिक्ष में चलना पड़ा था। पाँच महीने की तफ़्तीश के बाद नासा ने कल्पना चावला को इस मामले में पूर्णतया दोषमुक्त पाया, त्रुटियाँ तंत्रांश अंतरापृष्ठों व यान कर्मचारियों तथा ज़मीनी नियंत्रकों के लिए परिभाषित विधियों में मिलीं।

एसटीएस-८७ की उड़ानोपरांत गतिविधियों के पूरा होने पर कल्पना जी ने अंतरिक्ष यात्री कार्यालय में, तकनीकी पदों पर काम किया, उनके यहाँ के कार्यकलाप को उनके साथियों ने विशेष पुरस्कार दे के सम्मानित किया।
१९८३ में वे एक उड़ान प्रशिक्षक और विमानन लेखक, जीन पियरे हैरीसन से मिलीं और शादी की, और १९९० में एक देशीयकृत संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिक बनीं।
भारत के लिए चावला की आखिरी यात्रा १९९१-१९९२ के नए साल की छुट्टी के दौरान थी जब वे और उनके पति, परिवार के साथ समय बिताने गए थे। २००० में उन्हें एसटीएस-१०७ में अपनी दूसरी उड़ान के कर्मचारी के तौर पर चुना गया। यह अभियान लगातार पीछे सरकता रहा, क्योंकि विभिन्न कार्यों के नियोजित समय में टकराव होता रहा और कुछ तकनीकी समस्याएँ भी आईं, जैसे कि शटल इंजन बहाव अस्तरों में दरारें। 

१६ जनवरी २००३ को कल्पना जी ने अंततः कोलंबिया पर चढ़ के विनाशरत एसटीएस-१०७ मिशन का आरंभ किया। उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल थे स्पेसहैब/बल्ले-बल्ले/फ़्रीस्टार लघुगुरुत्व प्रयोग जिसके लिए कर्मचारी दल ने ८० प्रयोग किए, जिनके जरिए पृथ्वी व अंतरिक्ष विज्ञान, उन्नत तकनीक विकास व अंतरिक्ष यात्री स्वास्थ्य व सुरक्षा का अध्ययन हुआ। कोलंबिया अन्तरिक्ष यान में उनके साथ अन्य यात्री थे-• कमांडर रिक डी . हुसबंद • पायलट विलियम स. मैकूल • कमांडर माइकल प . एंडरसन • इलान रामों • डेविड म . ब्राउन • लौरेल बी .क्लार्क

अंतरिक्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा साबित हुई। सभी तरह के अनुसंधान तथा विचार - विमर्श के उपरांत वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल मे अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय जिस तरह की भयंकर घटना घटी वह अब इतिहास की बात हो गई | नासा तथा विश्व के लिये यह एक दर्दनाक घटना थी | १ फ़रवरी २००३ को कोलंबिया अंतरिक्षयान पृथ्वी की कक्षा मे प्रवेश करते ही टूटकर बिखर गया । देखते ही देखते अंतरिक्ष यान और उसमें सवार सातों यात्रियों के अवशेष टेक्सास नामक शहर पर बरसने लगे और सफ़ल कहलया जाने वाला अभियान भीषण सत्य बन गया ।
ये अंतरिक्ष यात्री तो सितारों की दुनिया में विलीन हो गए लेकिन इनके अनुसंधानों का लाभ पूरे विश्व को अवश्य मिलेगा । इस तरह कल्पना चावला के यह शब्द सत्य हो गए, 

"मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूँ ।प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूँगी |"

१५ वीं पुण्यतिथि पर भारत की इस महान बेटी को हम सब का शत शत नमन |

सोमवार, 5 जून 2017

‘पॉकेट हर्क्युलिस’ मनोहर आइच की प्रथम पुण्यतिथि

भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच का ०५ जून २०१६ को कोलकाता मे निधन हो गया | वे १०२ वर्ष के थे |

फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग कहे जाने वाले मनोहर 1952 में मिस्टर यूनिवर्स बने थे। छोटे कद (4 फीट 11 इंच) के कारण उन्हें ‘पॉकेट हर्क्युलिस’ भी कहा जाता था । इन्होंने एशियन गेम्स में तीन बार गोल्ड मेडल (1951, 1954 और 1958) भी जीता था| 


मनोहर आइच का शुरुआती जीवनः
 
*17 मार्च 1913 को कोमिली जिले के धमती गांव में जन्म हुआ। यह गांव अब बांग्लादेश में है।
*बचपन से ही रेसलिंग और वेट लिफ्टिंग जैसे खेलों में रुचि रखने वाले मनोहर को 12 साल की उम्र में बीमारी ने घेर लिया और उनकी सेहत काफी खराब हो गई।
*सेहत वापस पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत और एक्सरसाइज की। तभी उन्होंने बॉडी बिल्डिंग एक्सरसाइज (जैसे पुश अप्स, सिट अप्स) करनी शुरू की।
*ढाका में स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने मशहूर जादूगर पीसी सरकार सीनियर के साथ शोज में प्रदर्शन करना शुरू किया।
 
पेशेवर जीवन :
 
*1942 में रॉयल एयरफोर्स ज्वाइन किया। साथ ही बॉडी बिल्डिंग भी करते रहे।
*रॉयल एयरफोर्स में रहते हुए एक ब्रिटिश ऑफिसर रियूब मार्टिन ने उन्हें सराहा औऱ इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
*तभी एक ब्रिटिश अफसर को चांटा मारने के कारण मनोहर आइच को जेल हो गई। तब जेल में ही उन्होंने वेट ट्रेनिंग शुरू की। इसे देखते हुए जेल स्टाफ ने उनके लिए खास डाइट की भी व्यवस्था की थी।
*1950 में 37 साल की उम्र में मनोहर ने मिस्टर हर्क्युलिस कॉन्टेस्ट जीता। 1951 में हुए मिस्टर यूनिवर्स कॉन्टेस्ट में वो दूसरे स्थान पर रहे और 1952 में मिस्टर यूनिवर्स का खिताब जीत लिया।
*वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीतने के बाद 1955 में हुई मिस्टर यूनिवर्स प्रतियोगिता में तीसरे स्थान पर रहे और 1960 में हुए इसी कॉन्टेस्ट में चौथे नंबर पर। तब उनकी उम्र 47 साल थी।
*1960 के बाद से मनोहर ऐच ने कई बॉडी बिल्डिंग शोज किए। उन्होंने अपना आखिरी शो साल 2003 में 90 साल की उम्र में किया था।
 
 
व्यक्तिगत जीवन : 

*उनकी पत्नी का नाम ज्यूथिका आइच था। 2002 में उनका निधन हो गया|
*मनोहर आइच के दो बेटे और दो बेटियां हैं। उनका एक बेटा अखाड़ा चलाता है तो दूसरा फिटनेस हेल्थ सेंटर।
हम सब श्री मनोहर आइच जी को अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि देते है और सादर नमन करते हैं |

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

१७ मार्च - भारत के दो नायाब नगीनों की जयंती का दिन

आज १७ मार्च है ... आज का दिन जुड़ा हुआ है भारत के दो नायाब नगीनों से ... एक हैं ... भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच और दूसरी हैं ... कल्पना चावला , पहली महिला भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ |

आज इन दोनों की ही जयंती है | आइये थोड़ा जानते हैं इन दोनों ही के बारे में ... 

 
भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच का जन्म 17 मार्च 1913 को कोमिली जिले के धमती गांव में जन्म हुआ। यह गांव अब बांग्लादेश में है।
 
बचपन से ही रेसलिंग और वेट लिफ्टिंग जैसे खेलों में रुचि रखने वाले मनोहर को 12 साल की उम्र में बीमारी ने घेर लिया और उनकी सेहत काफी खराब हो गई। सेहत वापस पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत और एक्सरसाइज की। तभी उन्होंने बॉडी बिल्डिंग एक्सरसाइज (जैसे पुश अप्स, सिट अप्स) करनी शुरू की।

फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग कहे जाने वाले मनोहर 1952 में मिस्टर यूनिवर्स बने थे। छोटे कद (4 फीट 11 इंच) के कारण उन्हें ‘पॉकेट हर्क्युलिस’ भी कहा जाता था । इन्होंने एशियन गेम्स में तीन बार गोल्ड मेडल (1951, 1954 और 1958) भी जीता था|

५ जून २०१६ को १०२ वर्ष की आयु मे इन का देहांत हो गया |

इन के बारे के और अधिक जानने के लिए यहाँ पढ़ें

कल्पना चावला (पंजाबी: ਕਲਪਨਾ ਚਾਵਲਾ) (१७ मार्च , १९६२ - १ फ़रवरी २००३), एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे १ फ़रवरी २००३ को हुए कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।

उनका जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे एक भारतीय परिवार मे हुआ था। उन के पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला तथा और माता का नाम संजयोती था | वह अपने परिवार के चार भाई बहनो मे सबसे छोटी थी | कल्पना की प्रारंभिक पढाई लिखाई “टैगोर बाल निकेतन” मे हुई | कलपना जब आठवी कक्षा मे पहुची तो उसने इंजिनयर बनने की इच्छा प्रकट की | उसकी माँ ने अपनी बेटी की भावनाओ को समझा और आगे बढने मे मदद की | पिता उसे चिकित्सक या शिक्षिका बनाना चाहते थे । किंतु कल्पना बचपन से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी ।कल्पना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण था - उसकी लगन और जुझार प्रवृति | कलपना न तो काम करने मे आलसी थी और न असफलता मे घबराने वाली थी | उनकी उड़ान में दिलचस्पी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा, से प्रेरित थी जो एक अग्रणी भारतीय विमान चालक और उद्योगपति थे।
 

भारत के इन दो नायाब नगीनों की जयंती के दिन हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं |

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

कल्पना चावला की १४ वीं पुण्यतिथि

कल्पना चावला (पंजाबी: ਕਲਪਨਾ ਚਾਵਲਾ) (१७ मार्च , १९६२ - १ फ़रवरी २००३), एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।

प्रारंभिक जीवन

भारत की बेटी-कल्पना चावला करनाल, हरियाणा, भारत. में एक हिंदू भारतीय परिवार में पैदा हुई थीं। उनका जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे एक भारतीय परिवार मे हुआ था। उसके पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला तथा और माता का नाम संजयोती था | वह अपने परिवार के चार भाई बहनो मे सबसे छोटी थी | घर मे सब उसे प्यार से मोंटू कहते थे | कल्पना की प्रारंभिक पढाई लिखाई “टैगोर बाल निकेतन” मे हुई | कलपना जब आठवी कक्षा मे पहुची तो उसने इंजिनयर बनने की इच्छा प्रकट की | उसकी माँ ने अपनी बेटी की भावनाओ को समझा और आगे बढने मे मदद की | पिता उसे चिकित्सक या शिक्षिका बनाना चाहते थे । किंतु कल्पना बचपन से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी ।कल्पना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण था - उसकी लगन और जुझार प्रवृति | कलपना न तो काम करने मे आलसी थी और न असफलता मे घबराने वाली थी | उनकी उड़ान में दिलचस्पी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा, से प्रेरित थी जो एक अग्रणी भारतीय विमान चालक और उद्योगपति थे।

शिक्षा

कल्पना चावला ने प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल से प्राप्त की। आगे की शिक्षा वैमानिक अभियान्त्रिकी में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ ,भारत से करते हुए १९८२ में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए १९८२ में चली गईं और वैमानिक अभियान्त्रिकी में विज्ञान निष्णात की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की (१९८४)। कल्पना जी ने १९८६ में दूसरी विज्ञान निष्णात की उपाधि पाई और १९८८ में कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से वैमानिक अभियंत्रिकी में विद्या वाचस्पति की उपाधि पाई। कल्पना जी को हवाईजहाज़ों, ग्लाइडरों व व्यावसायिक विमानचालन के लाइसेंसों के लिए प्रमाणित उड़ान प्रशिक्षक का दर्ज़ा हासिल था। उन्हें एकल व बहु इंजन वायुयानों के लिए व्यावसायिक विमानचालक के लाइसेंस भी प्राप्त थे। अन्तरिक्ष यात्री बनने से पहले वो एक सुप्रसिध नासा कि वैज्ञानिक थी।


एम्स अनुसंधान केंद्र

१९८८ के अंत में उन्होंने नासा के एम्स अनुसंधान केंद्र के लिए ओवेर्सेट मेथड्स इंक के उपाध्यक्ष के रूप में काम करना शुरू किया, उन्होंने वहाँ वी/एसटीओएल में सीएफ़डी पर अनुसंधान किया। 

नासा कार्यकाल

अंतरिक्ष शटल सिम्युलेटर में चावला

कल्पना जी मार्च १९९५ में नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुईं और उन्हें १९९८ में अपनी पहली उड़ान के लिए चुना गया था। उनका पहला अंतरिक्ष मिशन १९ नवम्बर, १९९७ को छह अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-८७ से शुरू हुआ। कल्पना जी अंतरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मी महिला थीं और अंतरिक्ष में उड़ाने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थीं। राकेश शर्मा ने १९८४ में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थी। कल्पना जी अपने पहले मिशन में १.०४ करोड़ मील का सफ़र तय कर के पृथ्वी की २५२ परिक्रमाएँ कीं, और अंतरिक्ष में ३६० से अधिक घंटे बिताए। एसटीएस-८७ के दौरान स्पार्टन उपग्रह को तैनात करने के लिए भी ज़िम्मेदार थीं, इस खराब हुए उपग्रह को पकड़ने के लिए विंस्टन स्कॉट और तकाओ दोई को अंतरिक्ष में चलना पड़ा था। पाँच महीने की तफ़्तीश के बाद नासा ने कल्पना चावला को इस मामले में पूर्णतया दोषमुक्त पाया, त्रुटियाँ तंत्रांश अंतरापृष्ठों व यान कर्मचारियों तथा ज़मीनी नियंत्रकों के लिए परिभाषित विधियों में मिलीं।

एसटीएस-८७ की उड़ानोपरांत गतिविधियों के पूरा होने पर कल्पना जी ने अंतरिक्ष यात्री कार्यालय में, तकनीकी पदों पर काम किया, उनके यहाँ के कार्यकलाप को उनके साथियों ने विशेष पुरस्कार दे के सम्मानित किया।
१९८३ में वे एक उड़ान प्रशिक्षक और विमानन लेखक, जीन पियरे हैरीसन से मिलीं और शादी की, और १९९० में एक देशीयकृत संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिक बनीं।
भारत के लिए चावला की आखिरी यात्रा १९९१-१९९२ के नए साल की छुट्टी के दौरान थी जब वे और उनके पति, परिवार के साथ समय बिताने गए थे। २००० में उन्हें एसटीएस-१०७ में अपनी दूसरी उड़ान के कर्मचारी के तौर पर चुना गया। यह अभियान लगातार पीछे सरकता रहा, क्योंकि विभिन्न कार्यों के नियोजित समय में टकराव होता रहा और कुछ तकनीकी समस्याएँ भी आईं, जैसे कि शटल इंजन बहाव अस्तरों में दरारें। 

१६ जनवरी २००३ को कल्पना जी ने अंततः कोलंबिया पर चढ़ के विनाशरत एसटीएस-१०७ मिशन का आरंभ किया। उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल थे स्पेसहैब/बल्ले-बल्ले/फ़्रीस्टार लघुगुरुत्व प्रयोग जिसके लिए कर्मचारी दल ने ८० प्रयोग किए, जिनके जरिए पृथ्वी व अंतरिक्ष विज्ञान, उन्नत तकनीक विकास व अंतरिक्ष यात्री स्वास्थ्य व सुरक्षा का अध्ययन हुआ। कोलंबिया अन्तरिक्ष यान में उनके साथ अन्य यात्री थे-• कमांडर रिक डी . हुसबंद • पायलट विलियम स. मैकूल • कमांडर माइकल प . एंडरसन • इलान रामों • डेविड म . ब्राउन • लौरेल बी .क्लार्क

अंतरिक्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा साबित हुई। सभी तरह के अनुसंधान तथा विचार - विमर्श के उपरांत वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल मे अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय जिस तरह की भयंकर घटना घटी वह अब इतिहास की बात हो गई | नासा तथा विश्व के लिये यह एक दर्दनाक घटना थी | १ फ़रवरी २००३ को कोलंबिया अंतरिक्षयान पृथ्वी की कक्षा मे प्रवेश करते ही टूटकर बिखर गया । देखते ही देखते अंतरिक्ष यान और उसमें सवार सातों यात्रियों के अवशेष टेक्सास नामक शहर पर बरसने लगे और सफ़ल कहलया जाने वाला अभियान भीषण सत्य बन गया ।
ये अंतरिक्ष यात्री तो सितारों की दुनिया में विलीन हो गए लेकिन इनके अनुसंधानों का लाभ पूरे विश्व को अवश्य मिलेगा । इस तरह कल्पना चावला के यह शब्द सत्य हो गए, 

"मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूँ ।प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूँगी |"

१४ वीं पुण्यतिथि पर भारत की इस महान बेटी को हम सब का शत शत नमन |

रविवार, 5 जून 2016

नहीं रहे ‘पॉकेट हर्क्युलिस’ मनोहर आइच

भारतीय बॉडी बिल्डिंग जगत में 'फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग' के नाम से पहचाने जाने वाले स्वतंत्र भारत के पहले मिस्टर यूनिवर्स ख़िताब के विजेता मनोहर आइच का आज कोलकाता मे निधन हो गया | वे १०२ वर्ष के थे |

फादर ऑफ इंडियन बॉडी बिल्डिंग कहे जाने वाले मनोहर 1952 में मिस्टर यूनिवर्स बने थे। छोटे कद (4 फीट 11 इंच) के कारण उन्हें ‘पॉकेट हर्क्युलिस’ भी कहा जाता था । इन्होंने एशियन गेम्स में तीन बार गोल्ड मेडल (1951, 1954 और 1958) भी जीता था| 


मनोहर आइच का शुरुआती जीवनः
 
*17 मार्च 1913 को कोमिली जिले के धमती गांव में जन्म हुआ। यह गांव अब बांग्लादेश में है।
*बचपन से ही रेसलिंग और वेट लिफ्टिंग जैसे खेलों में रुचि रखने वाले मनोहर को 12 साल की उम्र में बीमारी ने घेर लिया और उनकी सेहत काफी खराब हो गई।
*सेहत वापस पाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत और एक्सरसाइज की। तभी उन्होंने बॉडी बिल्डिंग एक्सरसाइज (जैसे पुश अप्स, सिट अप्स) करनी शुरू की।
*ढाका में स्कूल में पढ़ते हुए उन्होंने मशहूर जादूगर पीसी सरकार सीनियर के साथ शोज में प्रदर्शन करना शुरू किया।
 
पेशेवर जीवन :
 
*1942 में रॉयल एयरफोर्स ज्वाइन किया। साथ ही बॉडी बिल्डिंग भी करते रहे।
*रॉयल एयरफोर्स में रहते हुए एक ब्रिटिश ऑफिसर रियूब मार्टिन ने उन्हें सराहा औऱ इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
*तभी एक ब्रिटिश अफसर को चांटा मारने के कारण मनोहर आइच को जेल हो गई। तब जेल में ही उन्होंने वेट ट्रेनिंग शुरू की। इसे देखते हुए जेल स्टाफ ने उनके लिए खास डाइट की भी व्यवस्था की थी।
*1950 में 37 साल की उम्र में मनोहर ने मिस्टर हर्क्युलिस कॉन्टेस्ट जीता। 1951 में हुए मिस्टर यूनिवर्स कॉन्टेस्ट में वो दूसरे स्थान पर रहे और 1952 में मिस्टर यूनिवर्स का खिताब जीत लिया।
*वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीतने के बाद 1955 में हुई मिस्टर यूनिवर्स प्रतियोगिता में तीसरे स्थान पर रहे और 1960 में हुए इसी कॉन्टेस्ट में चौथे नंबर पर। तब उनकी उम्र 47 साल थी।
*1960 के बाद से मनोहर ऐच ने कई बॉडी बिल्डिंग शोज किए। उन्होंने अपना आखिरी शो साल 2003 में 90 साल की उम्र में किया था।
 
 
व्यक्तिगत जीवन : 

*उनकी पत्नी का नाम ज्यूथिका आइच था। 2002 में उनका निधन हो गया|
*मनोहर आइच के दो बेटे और दो बेटियां हैं। उनका एक बेटा अखाड़ा चलाता है तो दूसरा फिटनेस हेल्थ सेंटर।


हम सब श्री मनोहर आइच जी को अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि देते है और सादर नमन करते हैं |

गुरुवार, 17 मार्च 2016

कल्पना चावला की ५४ वीं जयंती

कल्पना चावला (पंजाबी: ਕਲਪਨਾ ਚਾਵਲਾ) (१७ मार्च , १९६२ - १ फ़रवरी २००३), एक भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और अंतरिक्ष शटल मिशन विशेषज्ञ थी। वे कोलंबिया अन्तरिक्ष यान आपदा में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं।
प्रारंभिक जीवन
भारत की बेटी-कल्पना चावला करनाल, हरियाणा, भारत. में एक हिंदू भारतीय परिवार में पैदा हुई थीं। उनका जन्म १ जुलाई सन् १९६१ मे एक भारतीय परिवार मे हुआ था। उसके पिता का नाम श्री बनारसी लाल चावला तथा और माता का नाम संजयोती था | वह अपने परिवार के चार भाई बहनो मे सबसे छोटी थी | घर मे सब उसे प्यार से मोंटू कहते थे | कल्पना की प्रारंभिक पढाई लिखाई “टैगोर बाल निकेतन” मे हुई | कलपना जब आठवी कक्षा मे पहुची तो उसने इंजिनयर बनने की इच्छा प्रकट की | उसकी माँ ने अपनी बेटी की भावनाओ को समझा और आगे बढने मे मदद की | पिता उसे चिकित्सक या शिक्षिका बनाना चाहते थे । किंतु कल्पना बचपन से ही अंतरिक्ष में घूमने की कल्पना करती थी ।कल्पना का सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण था - उसकी लगन और जुझार प्रवृति | कलपना न तो काम करने मे आलसी थी और न असफलता मे घबराने वाली थी | उनकी उड़ान में दिलचस्पी जहाँगीर रतनजी दादाभाई टाटा, से प्रेरित थी जो एक अग्रणी भारतीय विमान चालक और उद्योगपति थे।
शिक्षा
कल्पना चावला ने प्रारंभिक शिक्षा टैगोर पब्लिक स्कूल करनाल से प्राप्त की। आगे की शिक्षा वैमानिक अभियान्त्रिकी में पंजाब इंजिनियरिंग कॉलेज, चंडीगढ़ ,भारत से करते हुए १९८२ में अभियांत्रिकी स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वे संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए १९८२ में चली गईं और वैमानिक अभियान्त्रिकी में विज्ञान निष्णात की उपाधि टेक्सास विश्वविद्यालय आर्लिंगटन से प्राप्त की (१९८४)। कल्पना जी ने १९८६ में दूसरी विज्ञान निष्णात की उपाधि पाई और १९८८ में कोलोराडो विश्वविद्यालय बोल्डर से वैमानिक अभियंत्रिकी में विद्या वाचस्पति की उपाधि पाई। कल्पना जी को हवाईजहाज़ों, ग्लाइडरों व व्यावसायिक विमानचालन के लाइसेंसों के लिए प्रमाणित उड़ान प्रशिक्षक का दर्ज़ा हासिल था। उन्हें एकल व बहु इंजन वायुयानों के लिए व्यावसायिक विमानचालक के लाइसेंस भी प्राप्त थे। अन्तरिक्ष यात्री बनने से पहले वो एक सुप्रसिध नासा कि वैज्ञानिक थी।

एम्स अनुसंधान केंद्र
१९८८ के अंत में उन्होंने नासा के एम्स अनुसंधान केंद्र के लिए ओवेर्सेट मेथड्स इंक के उपाध्यक्ष के रूप में काम करना शुरू किया, उन्होंने वहाँ वी/एसटीओएल में सीएफ़डी पर अनुसंधान किया। 
नासा कार्यकाल

अंतरिक्ष शटल सिम्युलेटर में चावला
कल्पना जी मार्च १९९५ में नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुईं और उन्हें १९९८ में अपनी पहली उड़ान के लिए चुना गया था। उनका पहला अंतरिक्ष मिशन १९ नवम्बर, १९९७ को छह अंतरिक्ष यात्री दल के हिस्से के रूप में अंतरिक्ष शटल कोलंबिया की उड़ान एसटीएस-८७ से शुरू हुआ। कल्पना जी अंतरिक्ष में उड़ने वाली प्रथम भारत में जन्मी महिला थीं और अंतरिक्ष में उड़ाने वाली भारतीय मूल की दूसरी व्यक्ति थीं। राकेश शर्मा ने १९८४ में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थी। कल्पना जी अपने पहले मिशन में १.०४ करोड़ मील का सफ़र तय कर के पृथ्वी की २५२ परिक्रमाएँ कीं, और अंतरिक्ष में ३६० से अधिक घंटे बिताए। एसटीएस-८७ के दौरान स्पार्टन उपग्रह को तैनात करने के लिए भी ज़िम्मेदार थीं, इस खराब हुए उपग्रह को पकड़ने के लिए विंस्टन स्कॉट और तकाओ दोई को अंतरिक्ष में चलना पड़ा था। पाँच महीने की तफ़्तीश के बाद नासा ने कल्पना चावला को इस मामले में पूर्णतया दोषमुक्त पाया, त्रुटियाँ तंत्रांश अंतरापृष्ठों व यान कर्मचारियों तथा ज़मीनी नियंत्रकों के लिए परिभाषित विधियों में मिलीं।

एसटीएस-८७ की उड़ानोपरांत गतिविधियों के पूरा होने पर कल्पना जी ने अंतरिक्ष यात्री कार्यालय में, तकनीकी पदों पर काम किया, उनके यहाँ के कार्यकलाप को उनके साथियों ने विशेष पुरस्कार दे के सम्मानित किया।
१९८३ में वे एक उड़ान प्रशिक्षक और विमानन लेखक, जीन पियरे हैरीसन से मिलीं और शादी की, और १९९० में एक देशीयकृत संयुक्त राज्य अमेरिका की नागरिक बनीं।
भारत के लिए चावला की आखिरी यात्रा १९९१-१९९२ के नए साल की छुट्टी के दौरान थी जब वे और उनके पति, परिवार के साथ समय बिताने गए थे। २००० में उन्हें एसटीएस-१०७ में अपनी दूसरी उड़ान के कर्मचारी के तौर पर चुना गया। यह अभियान लगातार पीछे सरकता रहा, क्योंकि विभिन्न कार्यों के नियोजित समय में टकराव होता रहा और कुछ तकनीकी समस्याएँ भी आईं, जैसे कि शटल इंजन बहाव अस्तरों में दरारें। 

१६ जनवरी २००३ को कल्पना जी ने अंततः कोलंबिया पर चढ़ के विनाशरत एसटीएस-१०७ मिशन का आरंभ किया। उनकी ज़िम्मेदारियों में शामिल थे स्पेसहैब/बल्ले-बल्ले/फ़्रीस्टार लघुगुरुत्व प्रयोग जिसके लिए कर्मचारी दल ने ८० प्रयोग किए, जिनके जरिए पृथ्वी व अंतरिक्ष विज्ञान, उन्नत तकनीक विकास व अंतरिक्ष यात्री स्वास्थ्य व सुरक्षा का अध्ययन हुआ। कोलंबिया अन्तरिक्ष यान में उनके साथ अन्य यात्री थे-• कमांडर रिक डी . हुसबंद • पायलट विलियम स. मैकूल • कमांडर माइकल प . एंडरसन • इलान रामों • डेविड म . ब्राउन • लौरेल बी .क्लार्क

अंतरिक्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा साबित हुई। सभी तरह के अनुसंधान तथा विचार - विमर्श के उपरांत वापसी के समय पृथ्वी के वायुमंडल मे अंतरिक्ष यान के प्रवेश के समय जिस तरह की भयंकर घटना घटी वह अब इतिहास की बात हो गई | नासा तथा विश्व के लिये यह एक दर्दनाक घटना थी | १ फ़रवरी २००३ को कोलंबिया अंतरिक्षयान पृथ्वी की कक्षा मे प्रवेश करते ही टूटकर बिखर गया । देखते ही देखते अंतरिक्ष यान और उसमें सवार सातों यात्रियों के अवशेष टेक्सास नामक शहर पर बरसने लगे और सफ़ल कहलया जाने वाला अभियान भीषण सत्य बन गया ।
ये अंतरिक्ष यात्री तो सितारों की दुनिया में विलीन हो गए लेकिन इनके अनुसंधानों का लाभ पूरे विश्व को अवश्य मिलेगा । इस तरह कल्पना चावला के यह शब्द सत्य हो गए, 
 
"मैं अंतरिक्ष के लिए ही बनी हूँ ।प्रत्येक पल अंतरिक्ष के लिए ही बिताया है और इसी के लिए ही मरूँगी |"
 
५४ वीं जयंती पर भारत की इस महान बेटी को हम सब का शत शत नमन |

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