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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

लोंगेवाला की ऐतिहासिक जंग की ४९ वीं वर्षगांठ

 पाक ने लोंगेवाला चेकपोस्ट पर किया था अटैक

1971 में ये दिन भारत-पाक में छिड़ी पूरी जंग का आखिरी दिन था। 4 दिसंबर की रात को भारत पाकिस्तान के रहीमयार खान डिस्ट्रिक्ट क्वार्टर पर अटैक करने वाला था। किन्हीं वजहों से भारत अटैक नहीं कर पाया, पर बीपी 638 पिलर की तरफ से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तान ने भारत की लोंगेवाला चेकपोस्ट पर अटैक कर दिया। यहां से उनका जैसलमेर जाने का प्लान था।
 
उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट पंजाब रेजीमेंट की 23वीं बटालियन के सिर्फ़ 90 जवानों की निगरानी में थी, और कमान थी मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के हाथों में | कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट धर्मवीर इंटरनेशनल बॉर्डर की पैट्रोलिंग पर थे। देर शाम उन्हें जानकारी मिली कि दुश्मन के बहुत सारे टैंक एक पूरी ब्रिगेड के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। उस ब्रिगेड में 2 हजार से ज्यादा जवान रहे होंगे। कुछ ही पलों बाद लश्कर का सामना भारत की सेना की छोटी सी टुकड़ी के साथ करना था। न जमीनी न हवाई किसी तरह की मदद उस दौरान मिलना संभव नहीं था।

भारतीय सेना के जवान मुंहतोड़ जवाब के लिए तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए भारतीय पोस्ट को घेर लिया। वे आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना। भारतीय सेना ने जीप पर लगी रिकॉयललैस राइफल और 81एमएम मोर्टार से जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। शुरुआती कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तानी सेना ने कुछ दूरी पर रुककर जंग लड़ने का फैसला किया। पाकिस्तानी दो हज़ार से ज्यादा थे और भारतीय 100 से भी कम। वो रात इम्तिहान की रात थी। शैलिंग के थमते कुछ सुनाई दे रहा था तो गूंज रहे शब्द ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल।’

पाकिस्तानी सेना के इरादे के मुताबिक वह चेकपोस्ट पर कब्जा कर रामगढ़ से होते हुए जैसलमेर तक जाना चाहते थे। पर भारतीय सेना के इरादे भी फौलादी थे, जो दीवार बन कर उनके समाने खड़े थे। रात होते होते  भारत की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। रातभर गोलीबारी जारी थी और तड़के ही  भारतीय वायु सेना से भी मदद मिल गई। दो हंटर विमानों ने पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। वे बौखलाए टैंक लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे। सुबह के बाद तक हम पाकिस्तानी सेना को उन्हीं की हद में 8 किलोमीटर अंदर तक खदेड़ चुके थे। 
जैसलमेर एयरबेस पर उस वक्त सिर्फ 4 हंटर एयरक्राफ्ट और सेना के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के दो विमान थे। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे। अब इंतजार सुबह का था। अल सुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम इतना मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी।ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़े थे और धूल के गुबार में छिपे पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाया था।
 
अगर  मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का कुशल नेतृत्व और जवानों का रण कौशल न होता तो हमें यह दृश्य कभी न दिखते दुश्मन के टैंक पर चढ़ विजयी भारतीय जवान भांगड़ा कर रहे हैं | इसी बहादुरी के लिए मेजर (बाद में ब्रिगेडियर) चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
 
 
जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर लोंगेवाला की लड़ाई पर आधारित थी। इसमें सनी देओल ने ब्रिगेडियर चांदपुरी का रोल निभाया था। तब वे मेजर थे। लोंगेवाला में ब्रिगेडियर चांदपुरी ने करीब 120 जवानों की मदद से पाकिस्‍तान के 2000 सैनिकों और दुश्मन के 40 टैंकों को रोके रखा था और हरा दिया था।



इस ऐतिहासिक विजय की ४९ वीं वर्षगांठ के अवसर पर हम सब की ओर से पंजाब रेजीमेंट की 23 वीं बटालियन के उन 120 जवानों और ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी जी को शत शत नमन | 

जय हिन्द !!!

जय हिन्द की सेना !!!

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी की द्वितीय पुण्यतिथि


ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी, महावीर चक्र, (22 नवम्बर1940 - 17 नवम्बर 2018)  

आज ही के दिन दो साल पहले 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लोंगेवाला पोस्ट पर हुई जंग के हीरो ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी नहीं रहे थे । वे 77 साल के थे। चांदपुरी ने मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में अंतिम सांस ली थी उनका कैंसर का इलाज चल रहा था। राजस्थान के लोंगेवाला में भारत-पाक बॉर्डर पर बहादुरी के लिए ब्रिगेडियर चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।


जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर लोंगेवाला की लड़ाई पर आधारित थी। इसमें सनी देओल ने ब्रिगेडियर चांदपुरी का रोल निभाया था। तब वे मेजर थे। लोंगेवाला में ब्रिगेडियर चांदपुरी ने करीब 120 जवानों की मदद से पाकिस्‍तान के 2000 सैनिकों और दुश्मन के 40 टैंकों को रोके रखा था और हरा दिया था। 


पंजाब में चांदपुरी का पैतृक गांव 
कुलदीप सिंह का जन्म 22 नवंबर 1940 को अविभाजित भारत के पंजाब क्षेत्र में हुआ था। उसके बाद परिवार पैतृक गांव चांदपुर रुड़की आ गया था, जो पंजाब के बलचौर में है। चांदपुरी माता-पिता की इकलौती संतान थे। उन्होंने 1962 में होशियारपुर कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इस दौरान एनसीसी के सक्रिय सदस्य भी रहे।


1962 में हुए थे सेना में भर्ती 
कुलदीप सिंह 1962 में भारतीय सेना में शामिल हुए। उन्होंने चेन्‍नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से कमीशन प्राप्त किया और पंजाब रेजीमेंट की 23वीं बटालियन का हिस्सा बने। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध में भाग लिया। जंग में उनकी वीरता को काफी सराहना मिली। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र के आपातकालीन बल में सालभर तक गाजा में सेवाएं दीं। दो बार मध्‍यप्रदेश के महू इन्फैंट्री स्कूल में इन्स्ट्रक्टर भी रहे।


पाक ने लोंगेवाला चेकपोस्ट पर किया अटैक
1971 में ये दिन भारत-पाक में छिड़ी पूरी जंग का आखिरी दिन था। 4 दिसंबर की रात को भारत पाकिस्तान के रहीमयार खान डिस्ट्रिक्ट क्वार्टर पर अटैक करने वाला था। किन्हीं वजहों से भारत अटैक नहीं कर पाया, पर बीपी 638 पिलर की तरफ से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तान ने भारत की लोंगेवाला चेकपोस्ट पर अटैक कर दिया। यहां से उनका जैसलमेर जाने का प्लान था।

उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट सिर्फ 90 जवानों की निगरानी में थी। कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट धर्मवीर इंटरनेशनल बॉर्डर की पैट्रोलिंग पर थे। देर शाम उन्हें जानकारी मिली कि दुश्मन के बहुत सारे टैंक एक पूरी ब्रिगेड के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। उस ब्रिगेड में 2 हजार से ज्यादा जवान रहे होंगे। कुछ ही पलों बाद लश्कर का सामना भारत की सेना की छोटी सी टुकड़ी के साथ करना था। न जमीनी न हवाई किसी तरह की मदद उस दौरान मिलना संभव नहीं था।



भारतीय सेना के जवान मुंहतोड़ जवाब के लिए तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए भारतीय पोस्ट को घेर लिया। वे आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना। भारतीय सेना ने जीप पर लगी रिकॉयललैस राइफल और 81एमएम मोर्टार से जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। शुरुआती कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तानी सेना ने कुछ दूरी पर रुककर जंग लड़ने का फैसला किया। पाकिस्तानी दो हज़ार से ज्यादा थे और भारतीय 100 से भी कम। वो रात इम्तिहान की रात थी। शैलिंग के थमते कुछ सुनाई दे रहा था तो गूंज रहे शब्द ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल।’



पाकिस्तानी सेना के इरादे के मुताबिक वह चेकपोस्ट पर कब्जा कर रामगढ़ से होते हुए जैसलमेर तक जाना चाहते थे। पर भारतीय सेना के इरादे भी फौलादी थे, जो दीवार बन कर उनके समाने खड़े थे। रात होते होते  भारत की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। रातभर गोलीबारी जारी थी और तड़के ही  भारतीय वायु सेना से भी मदद मिल गई। दो हंटर विमानों ने पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। वे बौखलाए टैंक लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे। सुबह के बाद तक हम पाकिस्तानी सेना को उन्हीं की हद में 8 किलोमीटर अंदर तक खदेड़ चुके थे। 


जैसलमेर एयरबेस पर उस वक्त सिर्फ 4 हंटर एयरक्राफ्ट और सेना के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के दो विमान थे। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे। अब इंतजार सुबह का था। अल सुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम इतना मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी।ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़े थे और धूल के गुबार में छिपे पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाया था।

अगर  ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का कुशल नेतृत्व और जवानों का रण कौशल न होता तो हमें यह दृश्य कभी न दिखते दुश्मन के टैंक पर चढ़ विजयी भारतीय जवान भांगड़ा कर रहे हैं |


द्वितीय पुण्यतिथि पर हम सब की ओर से ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी जी को हार्दिक श्रद्धांजलि और शत शत नमन |

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

मंडेला = गाँधी + बोस


दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की घृणित प्रथा के खात्मे के लिए चले निर्णायक आंदोलन के अगुवा नेल्सन मंडेला के जीवन में महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के रूप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अलग-अलग विचारधाराओं वाले दो पुरोधाओं की सोच का अनोखा संगम देखा जा सकता है।
मंडेला ने महात्मा गांधी के नक्शेकदम पर चलते हुए जहां सरकार के विरुद्ध अवज्ञा आंदोलन शुरू किया वहीं भेदभाव की नीति से मुक्ति के लिए नेताजी बोस की तरह सरकार के खिलाफ युद्ध का सहारा भी लिया था। वह अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस [एएनसी] की सशस्त्र इकाई 'उमखोंतो वे सिजवे' के प्रमुख रहे और उन्हें देशद्रोह तथा अन्य आरोपों में करीब 17 साल जेल में गुजारने पड़े।
यह सम्भवत: गांधी जी की नीतियों का ही असर था कि मंडेला देश में रंगभेद की नीति के विरोध में खड़े हुए नई पीढ़ी के कार्यकताओं को एकजुट कर सके। महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह आंदोलन के रूप में की गई शुरुआत के वर्ष 1947 में भारत की आजादी के रूप में मंजिल तक पहुंचने से दक्षिण अफ्रीका में वांछित परिवर्तन की उम्मीद पैदा हुई। मंडेला को महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए उपनिवेश विरोधी आंदोलन को सम्पन्न करने वाला नेता भी कहा जाता है।
रंगभेद की नीति के खिलाफ नरम और गरम रवैया अपनाने वाले मंडेला पर हालांकि अहिंसा का ज्यादा गहरा असर था और उन्होंने बाद में माना था कि रंगभेद के खिलाफ उनकी पार्टी द्वारा हिंसा का रास्ता अपनाया जाना कई मायनों में गलत था।
मंडेला से जुडे तथ्यों से पता चलता है कि रंगभेद नीति के प्रतीक स्थलों को बम से उड़ाकर विरोध दर्ज कराने का मकसद किसी की जान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं था। मंडेला की नजर में युद्ध किसी बात का विरोध करने का आखिरी रास्ता है।
18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका के ट्रांस्की में जन्मे नेल्सन मंडेला ने अपने साहस, दृढ़ संकल्प और प्रेरणादाई व्यक्तित्व के बलबूते रंगभेद की नीति को खत्म करने के बाद देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होकर अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज कराया।
मंडेला के जीवन से जुड़े दस्तावेजों पर नजर डालने से पता चलता है कि वह अपने परिवार में स्कूल जाने वाले पहले शख्स थे और उनकी शिक्षिका दिनगाना गावे ने उन्हें 'नेल्सन' नाम दिया था। मंडेला मेधावी छात्र थे लेकिन राजनीति में सक्रियता से उनकी शिक्षा पर असर पड़ा था। फोर्ट हेयर यूनीवर्सिटी में अध्ययन के दौरान विश्वविद्यालय की नीतियों के खिलाफ छात्रसंघ की मुहिम में शामिल होने की वजह से उन्हें यूनीवर्सिटी से निकाल दिया गया था।
देश में रंगभेद नीति की समर्थक नेशनल पार्टी की वर्ष 1948 में जीत के बाद मंडेला राजनीति के मैदान में आ गए। मंडेला ने वर्ष 1952 में एएनसी के अवज्ञा आंदोलन की अगुवाई की।
मंडेला ने महात्मा गांधी के पदचिन्हों पर चलकर देश के अश्वेत लोगों में नई चेतना पैदा की, वहीं दासता के प्रतीक स्थलों तथा सरकारी भवनों पर हमले के अभियान की भी अगुवाई की। उन्हें देश में हिंसा फैलाने तथा कई अन्य गम्भीर आरोपों में पांच अगस्त 1962 को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर मुकदमा चला और 12 जून 1964 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। मंडेला को रॉबेन द्वीप पर बनी जेल में रखा गया। आजीवन कारावास की सजा मिलने के बावजूद मंडेला का रंगभेद नीति के खिलाफ आंदोलन का जुनून कम नहीं हुआ। उन्होंने जेल में बंद अश्वेत लोगों को लामबंद करना शुरू किया। उनकी इस कोशिश की वजह से इस जेल को 'मंडेला यूनीवर्सिटी' कहा जाने लगा।
फरवरी 1985 में तत्कालीन राष्ट्रपति पी डब्ल्यू बोथा ने मंडेला को आंदोलन का रास्ता छोड़ने की कीमत पर रिहाई की पेशकश की जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। दक्षिण अफ्रीकी सरकार पर मंडेला को मुक्त करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने पर मंडेला को 11 फरवरी 1990 को रिहा कर दिया गया। उन्हें वर्ष 1993 में नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। 27 अप्रैल 1994 को देश में पहली बार श्वेत और अश्वेत लोगों की भागीदारी वाले चुनाव में एएनसी की जोरदार जीत के बाद मंडेला ने 10 मई 1994 को दक्षिण अफ्रीका का पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनने की उपलब्धि हासिल कर ली। 
 
सभी मैनपुरी वासियों की ओर से नेल्सन मंडेला को उनकी जयंती पर शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि !

बुधवार, 30 जनवरी 2019

प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की १०६ वीं जयंती


अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१)

अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१) भारत के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक थीं। उनका जन्म बुडापेस्ट (हंगरी) में हुआ था। कला, संगीत व अभिनय बचपन से ही उनके साथी बन गए। २०वीं सदी की इस प्रतिभावान कलाकार को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने १९७६ और १९७९ में भारत के नौ सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में शामिल किया है। सिख पिता उमराव सिंह शेरगिल (संस्कृत-फारसी के विद्वान व नौकरशाह) और हंगरी मूल की यहूदी ओपेरा गायिका मां मेरी एंटोनी गोट्समन की यह संतान ८ वर्ष की आयु में पियानो-वायलिन बजाने के साथ-साथ कैनवस पर भी हाथ आजमाने लगी थी।
१९२१ में अमृता का परिवार समर हिल शिमला में आ बसा। बाद में अमृता की मां उन्हें लेकर इटली चली गई व फ्लोरेंस के सांता अनुंज़ियाता आर्ट स्कूल में उनका दाखिला करा दिया। पहले उन्होंने ग्रैंड चाऊमीअर में पीअरे वेलण्ट के और इकोल डेस बीउक्स-आर्टस में ल्यूसियन सायमन के मार्गदर्शन में अभ्यास किया। सन १९३४ के अंत में वह भारत लौटी। बाईस साल से भी कम उम्र में वह तकनीकी तौर पर चित्रकार बन चुकी थी और असामान्य प्रतिभाशाली कलाकार के लिए आवश्यक सारे गुण उनमें आ चुके थे। 
पूरी तरह भारतीय न होने के बावजूद वह भारतीय संस्कृति को जानने के लिए बड़ी उत्सुक थी। उनकी प्रारंभिक कलाकृतियों में पेरिस के कुछ कलाकारों का पाश्चात्य प्रभाव प्रभाव साफ झलकता है। जल्दी ही वे भारत लौटीं और अपनी मृत्यु तक भारतीय कला परंपरा की पुन: खोज में जुटी रहीं। उन्हें मुगल व पहाडी कला सहित अजंता की विश्वविख्यात कला ने भी प्रेरित-प्रभावित किया। भले ही उनकी शिक्षा पेरिस में हुई पर अंततः उनकी तूलिका भारतीय रंग में ही रंगी गई। उनमें छिपी भारतीयता का जीवंत रंग हैं उनके चित्र।

अमृता ने अपने हंगेरियन चचेरे भाई से १९३८ में विवाह किया, फिर वे अपने पुश्तैनी घर गोरखपुर में आ बसीं। १९४१ में अमृता अपने पति के साथ लाहौर चली गई, वहाँ उनकी पहली बडी एकल प्रदर्शनी होनी थी, किंतु एकाएक वह गंभीर रूप से बीमार पडीं और मात्र २८ वर्ष की आयु में शून्य में विलीन हो गई।
अमृता शेरगिल जी की १०३ वीं जंयती के अवसर पर सन २०१६ में गूगल ने अपना डूडल उनको समर्पित किया था |
स्व॰ अमृता शेरगिल जी की १०६ वीं जंयती के अवसर पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं !!

बुधवार, 5 दिसंबर 2018

प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की ७७ वीं पुण्यतिथि

अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१)
अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१) भारत के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक थीं। उनका जन्म बुडापेस्ट (हंगरी) में हुआ था। कला, संगीत व अभिनय बचपन से ही उनके साथी बन गए। २०वीं सदी की इस प्रतिभावान कलाकार को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने १९७६ और १९७९ में भारत के नौ सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में शामिल किया है। सिख पिता उमराव सिंह शेरगिल (संस्कृत-फारसी के विद्वान व नौकरशाह) और हंगरी मूल की यहूदी ओपेरा गायिका मां मेरी एंटोनी गोट्समन की यह संतान ८ वर्ष की आयु में पियानो-वायलिन बजाने के साथ-साथ कैनवस पर भी हाथ आजमाने लगी थी।
१९२१ में अमृता का परिवार समर हिल शिमला में आ बसा। बाद में अमृता की मां उन्हें लेकर इटली चली गई व फ्लोरेंस के सांता अनुंज़ियाता आर्ट स्कूल में उनका दाखिला करा दिया। पहले उन्होंने ग्रैंड चाऊमीअर में पीअरे वेलण्ट के और इकोल डेस बीउक्स-आर्टस में ल्यूसियन सायमन के मार्गदर्शन में अभ्यास किया। सन १९३४ के अंत में वह भारत लौटी। बाईस साल से भी कम उम्र में वह तकनीकी तौर पर चित्रकार बन चुकी थी और असामान्य प्रतिभाशाली कलाकार के लिए आवश्यक सारे गुण उनमें आ चुके थे। 
पूरी तरह भारतीय न होने के बावजूद वह भारतीय संस्कृति को जानने के लिए बड़ी उत्सुक थी। उनकी प्रारंभिक कलाकृतियों में पेरिस के कुछ कलाकारों का पाश्चात्य प्रभाव प्रभाव साफ झलकता है। जल्दी ही वे भारत लौटीं और अपनी मृत्यु तक भारतीय कला परंपरा की पुन: खोज में जुटी रहीं। उन्हें मुगल व पहाडी कला सहित अजंता की विश्वविख्यात कला ने भी प्रेरित-प्रभावित किया। भले ही उनकी शिक्षा पेरिस में हुई पर अंततः उनकी तूलिका भारतीय रंग में ही रंगी गई। उनमें छिपी भारतीयता का जीवंत रंग हैं उनके चित्र।
 
अमृता ने अपने हंगेरियन चचेरे भाई से १९३८ में विवाह किया, फिर वे अपने पुश्तैनी घर गोरखपुर में आ बसीं। १९४१ में अमृता अपने पति के साथ लाहौर चली गई, वहाँ उनकी पहली बडी एकल प्रदर्शनी होनी थी, किंतु एकाएक वह गंभीर रूप से बीमार पडीं और मात्र २८ वर्ष की आयु में शून्य में विलीन हो गई।
अमृता शेरगिल जी की १०३ वीं जंयती के अवसर पर गूगल ने भी अपना डूडल उनको समर्पित किया था|
स्व॰ अमृता शेरगिल जी की ७७ वीं पुण्यतिथि के अवसर पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं !!

मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

विजयगाथा - लोंगेवाला की ऐतिहासिक जंग की ४७ वीं वर्षगांठ

पाक ने लोंगेवाला चेकपोस्ट पर किया अटैक
 
1971 में ये दिन भारत-पाक में छिड़ी पूरी जंग का आखिरी दिन था। 4 दिसंबर की रात को भारत पाकिस्तान के रहीमयार खान डिस्ट्रिक्ट क्वार्टर पर अटैक करने वाला था। किन्हीं वजहों से भारत अटैक नहीं कर पाया, पर बीपी 638 पिलर की तरफ से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तान ने भारत की लोंगेवाला चेकपोस्ट पर अटैक कर दिया। यहां से उनका जैसलमेर जाने का प्लान था।
 
उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट पंजाब रेजीमेंट की 23वीं बटालियन के सिर्फ़ 90 जवानों की निगरानी में थी, और कमान थी मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के हाथों में | कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट धर्मवीर इंटरनेशनल बॉर्डर की पैट्रोलिंग पर थे। देर शाम उन्हें जानकारी मिली कि दुश्मन के बहुत सारे टैंक एक पूरी ब्रिगेड के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। उस ब्रिगेड में 2 हजार से ज्यादा जवान रहे होंगे। कुछ ही पलों बाद लश्कर का सामना भारत की सेना की छोटी सी टुकड़ी के साथ करना था। न जमीनी न हवाई किसी तरह की मदद उस दौरान मिलना संभव नहीं था।

भारतीय सेना के जवान मुंहतोड़ जवाब के लिए तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए भारतीय पोस्ट को घेर लिया। वे आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना। भारतीय सेना ने जीप पर लगी रिकॉयललैस राइफल और 81एमएम मोर्टार से जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। शुरुआती कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तानी सेना ने कुछ दूरी पर रुककर जंग लड़ने का फैसला किया। पाकिस्तानी दो हज़ार से ज्यादा थे और भारतीय 100 से भी कम। वो रात इम्तिहान की रात थी। शैलिंग के थमते कुछ सुनाई दे रहा था तो गूंज रहे शब्द ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल।’

पाकिस्तानी सेना के इरादे के मुताबिक वह चेकपोस्ट पर कब्जा कर रामगढ़ से होते हुए जैसलमेर तक जाना चाहते थे। पर भारतीय सेना के इरादे भी फौलादी थे, जो दीवार बन कर उनके समाने खड़े थे। रात होते होते  भारत की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। रातभर गोलीबारी जारी थी और तड़के ही  भारतीय वायु सेना से भी मदद मिल गई। दो हंटर विमानों ने पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। वे बौखलाए टैंक लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे। सुबह के बाद तक हम पाकिस्तानी सेना को उन्हीं की हद में 8 किलोमीटर अंदर तक खदेड़ चुके थे। 
जैसलमेर एयरबेस पर उस वक्त सिर्फ 4 हंटर एयरक्राफ्ट और सेना के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के दो विमान थे। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे। अब इंतजार सुबह का था। अल सुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम इतना मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी।ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़े थे और धूल के गुबार में छिपे पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाया था।
 
अगर  मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का कुशल नेतृत्व और जवानों का रण कौशल न होता तो हमें यह दृश्य कभी न दिखते दुश्मन के टैंक पर चढ़ विजयी भारतीय जवान भांगड़ा कर रहे हैं | इसी बहादुरी के लिए मेजर (बाद में ब्रिगेडियर) चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
 
 
जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर लोंगेवाला की लड़ाई पर आधारित थी। इसमें सनी देओल ने ब्रिगेडियर चांदपुरी का रोल निभाया था। तब वे मेजर थे। लोंगेवाला में ब्रिगेडियर चांदपुरी ने करीब 120 जवानों की मदद से पाकिस्‍तान के 2000 सैनिकों और दुश्मन के 40 टैंकों को रोके रखा था और हरा दिया था।



हम सब की ओर से पंजाब रेजीमेंट की 23 वीं बटालियन के 120 जवानों और ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी जी को शत शत नमन | 

जय हिन्द !!!

जय हिन्द की सेना !!!

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी की ७८ वीं जयंती

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी, महावीर चक्र, (22 नवम्बर1940 - 17 नवम्बर 2018)  
आज 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लोंगेवाला पोस्ट पर हुई जंग के हीरो ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी जी की ७८ वीं जयंती है । चांदपुरी का शनिवार, १७ नवम्बर २०१८ को मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में निधन हो गया था | उनका कैंसर का इलाज चल रहा था। राजस्थान के लोंगेवाला में भारत-पाक बॉर्डर पर बहादुरी के लिए ब्रिगेडियर चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर लोंगेवाला की लड़ाई पर आधारित थी। इसमें सनी देओल ने ब्रिगेडियर चांदपुरी का रोल निभाया था। तब वे मेजर थे। लोंगेवाला में ब्रिगेडियर चांदपुरी ने करीब 120 जवानों की मदद से पाकिस्‍तान के 2000 सैनिकों और दुश्मन के 40 टैंकों को रोके रखा था और हरा दिया था। 
पंजाब में चांदपुरी का पैतृक गांव 
कुलदीप सिंह का जन्म 22 नवंबर 1940 को अविभाजित भारत के पंजाब क्षेत्र में हुआ था। उसके बाद परिवार पैतृक गांव चांदपुर रुड़की आ गया था, जो पंजाब के बलचौर में है। चांदपुरी माता-पिता की इकलौती संतान थे। उन्होंने 1962 में होशियारपुर कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इस दौरान एनसीसी के सक्रिय सदस्य भी रहे।
1962 में हुए थे सेना में भर्ती 
कुलदीप सिंह 1962 में भारतीय सेना में शामिल हुए। उन्होंने चेन्‍नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से कमीशन प्राप्त किया और पंजाब रेजीमेंट की 23वीं बटालियन का हिस्सा बने। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध में भाग लिया। जंग में उनकी वीरता को काफी सराहना मिली। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र के आपातकालीन बल में सालभर तक गाजा में सेवाएं दीं। दो बार मध्‍यप्रदेश के महू इन्फैंट्री स्कूल में इन्स्ट्रक्टर भी रहे।
पाक ने लोंगेवाला चेकपोस्ट पर किया अटैक
1971 में ये दिन भारत-पाक में छिड़ी पूरी जंग का आखिरी दिन था। 4 दिसंबर की रात को भारत पाकिस्तान के रहीमयार खान डिस्ट्रिक्ट क्वार्टर पर अटैक करने वाला था। किन्हीं वजहों से भारत अटैक नहीं कर पाया, पर बीपी 638 पिलर की तरफ से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तान ने भारत की लोंगेवाला चेकपोस्ट पर अटैक कर दिया। यहां से उनका जैसलमेर जाने का प्लान था।
उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट सिर्फ 90 जवानों की निगरानी में थी। कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट धर्मवीर इंटरनेशनल बॉर्डर की पैट्रोलिंग पर थे। देर शाम उन्हें जानकारी मिली कि दुश्मन के बहुत सारे टैंक एक पूरी ब्रिगेड के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। उस ब्रिगेड में 2 हजार से ज्यादा जवान रहे होंगे। कुछ ही पलों बाद लश्कर का सामना भारत की सेना की छोटी सी टुकड़ी के साथ करना था। न जमीनी न हवाई किसी तरह की मदद उस दौरान मिलना संभव नहीं था।


भारतीय सेना के जवान मुंहतोड़ जवाब के लिए तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए भारतीय पोस्ट को घेर लिया। वे आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना। भारतीय सेना ने जीप पर लगी रिकॉयललैस राइफल और 81एमएम मोर्टार से जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। शुरुआती कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तानी सेना ने कुछ दूरी पर रुककर जंग लड़ने का फैसला किया। पाकिस्तानी दो हज़ार से ज्यादा थे और भारतीय 100 से भी कम। वो रात इम्तिहान की रात थी। शैलिंग के थमते कुछ सुनाई दे रहा था तो गूंज रहे शब्द ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल।’

पाकिस्तानी सेना के इरादे के मुताबिक वह चेकपोस्ट पर कब्जा कर रामगढ़ से होते हुए जैसलमेर तक जाना चाहते थे। पर भारतीय सेना के इरादे भी फौलादी थे, जो दीवार बन कर उनके समाने खड़े थे। रात होते होते  भारत की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। रातभर गोलीबारी जारी थी और तड़के ही  भारतीय वायु सेना से भी मदद मिल गई। दो हंटर विमानों ने पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। वे बौखलाए टैंक लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे। सुबह के बाद तक हम पाकिस्तानी सेना को उन्हीं की हद में 8 किलोमीटर अंदर तक खदेड़ चुके थे। 
जैसलमेर एयरबेस पर उस वक्त सिर्फ 4 हंटर एयरक्राफ्ट और सेना के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के दो विमान थे। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे। अब इंतजार सुबह का था। अल सुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम इतना मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी।ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़े थे और धूल के गुबार में छिपे पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाया था।
अगर  ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का कुशल नेतृत्व और जवानों का रण कौशल न होता तो हमें यह दृश्य कभी न दिखते दुश्मन के टैंक पर चढ़ विजयी भारतीय जवान भांगड़ा कर रहे हैं |
हम सब की ओर से ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी जी को हार्दिक श्रद्धांजलि और शत शत नमन |

शनिवार, 17 नवंबर 2018

महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का निधन

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी, महावीर चक्र, (22 नवम्बर1940 - 17 नवम्बर 2018)  

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लोंगेवाला पोस्ट पर हुई जंग के हीरो ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी नहीं रहे। वे 77 साल के थे। चांदपुरी ने शनिवार को मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनका कैंसर का इलाज चल रहा था। राजस्थान के लोंगेवाला में भारत-पाक बॉर्डर पर बहादुरी के लिए ब्रिगेडियर चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।


जेपी दत्ता की फिल्म बॉर्डर लोंगेवाला की लड़ाई पर आधारित थी। इसमें सनी देओल ने ब्रिगेडियर चांदपुरी का रोल निभाया था। तब वे मेजर थे। लोंगेवाला में ब्रिगेडियर चांदपुरी ने करीब 120 जवानों की मदद से पाकिस्‍तान के 2000 सैनिकों और दुश्मन के 40 टैंकों को रोके रखा था और हरा दिया था। 


पंजाब में चांदपुरी का पैतृक गांव 
कुलदीप सिंह का जन्म 22 नवंबर 1940 को अविभाजित भारत के पंजाब क्षेत्र में हुआ था। उसके बाद परिवार पैतृक गांव चांदपुर रुड़की आ गया था, जो पंजाब के बलचौर में है। चांदपुरी माता-पिता की इकलौती संतान थे। उन्होंने 1962 में होशियारपुर कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। इस दौरान एनसीसी के सक्रिय सदस्य भी रहे।


1962 में हुए थे सेना में भर्ती 
कुलदीप सिंह 1962 में भारतीय सेना में शामिल हुए। उन्होंने चेन्‍नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी से कमीशन प्राप्त किया और पंजाब रेजीमेंट की 23वीं बटालियन का हिस्सा बने। उन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध में भाग लिया। जंग में उनकी वीरता को काफी सराहना मिली। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र के आपातकालीन बल में सालभर तक गाजा में सेवाएं दीं। दो बार मध्‍यप्रदेश के महू इन्फैंट्री स्कूल में इन्स्ट्रक्टर भी रहे।


पाक ने लोंगेवाला चेकपोस्ट पर किया अटैक
1971 में ये दिन भारत-पाक में छिड़ी पूरी जंग का आखिरी दिन था। 4 दिसंबर की रात को भारत पाकिस्तान के रहीमयार खान डिस्ट्रिक्ट क्वार्टर पर अटैक करने वाला था। किन्हीं वजहों से भारत अटैक नहीं कर पाया, पर बीपी 638 पिलर की तरफ से आगे बढ़ते हुए पाकिस्तान ने भारत की लोंगेवाला चेकपोस्ट पर अटैक कर दिया। यहां से उनका जैसलमेर जाने का प्लान था।

उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट सिर्फ 90 जवानों की निगरानी में थी। कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट धर्मवीर इंटरनेशनल बॉर्डर की पैट्रोलिंग पर थे। देर शाम उन्हें जानकारी मिली कि दुश्मन के बहुत सारे टैंक एक पूरी ब्रिगेड के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। उस ब्रिगेड में 2 हजार से ज्यादा जवान रहे होंगे। कुछ ही पलों बाद लश्कर का सामना भारत की सेना की छोटी सी टुकड़ी के साथ करना था। न जमीनी न हवाई किसी तरह की मदद उस दौरान मिलना संभव नहीं था।



भारतीय सेना के जवान मुंहतोड़ जवाब के लिए तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए भारतीय पोस्ट को घेर लिया। वे आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना। भारतीय सेना ने जीप पर लगी रिकॉयललैस राइफल और 81एमएम मोर्टार से जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। शुरुआती कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तानी सेना ने कुछ दूरी पर रुककर जंग लड़ने का फैसला किया। पाकिस्तानी दो हज़ार से ज्यादा थे और भारतीय 100 से भी कम। वो रात इम्तिहान की रात थी। शैलिंग के थमते कुछ सुनाई दे रहा था तो गूंज रहे शब्द ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल।’



पाकिस्तानी सेना के इरादे के मुताबिक वह चेकपोस्ट पर कब्जा कर रामगढ़ से होते हुए जैसलमेर तक जाना चाहते थे। पर भारतीय सेना के इरादे भी फौलादी थे, जो दीवार बन कर उनके समाने खड़े थे। रात होते होते  भारत की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। रातभर गोलीबारी जारी थी और तड़के ही  भारतीय वायु सेना से भी मदद मिल गई। दो हंटर विमानों ने पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। वे बौखलाए टैंक लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे। सुबह के बाद तक हम पाकिस्तानी सेना को उन्हीं की हद में 8 किलोमीटर अंदर तक खदेड़ चुके थे। 


जैसलमेर एयरबेस पर उस वक्त सिर्फ 4 हंटर एयरक्राफ्ट और सेना के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के दो विमान थे। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे। अब इंतजार सुबह का था। अल सुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम इतना मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी।ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़े थे और धूल के गुबार में छिपे पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाया था।

अगर  ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी का कुशल नेतृत्व और जवानों का रण कौशल न होता तो हमें यह दृश्य कभी न दिखते दुश्मन के टैंक पर चढ़ विजयी भारतीय जवान भांगड़ा कर रहे हैं |


हम सब की ओर से ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी जी को हार्दिक श्रद्धांजलि और शत शत नमन |

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की १०५ वीं जयंती


अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१)

अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१) भारत के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक थीं। उनका जन्म बुडापेस्ट (हंगरी) में हुआ था। कला, संगीत व अभिनय बचपन से ही उनके साथी बन गए। २०वीं सदी की इस प्रतिभावान कलाकार को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने १९७६ और १९७९ में भारत के नौ सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में शामिल किया है। सिख पिता उमराव सिंह शेरगिल (संस्कृत-फारसी के विद्वान व नौकरशाह) और हंगरी मूल की यहूदी ओपेरा गायिका मां मेरी एंटोनी गोट्समन की यह संतान ८ वर्ष की आयु में पियानो-वायलिन बजाने के साथ-साथ कैनवस पर भी हाथ आजमाने लगी थी।

१९२१ में अमृता का परिवार समर हिल शिमला में आ बसा। बाद में अमृता की मां उन्हें लेकर इटली चली गई व फ्लोरेंस के सांता अनुंज़ियाता आर्ट स्कूल में उनका दाखिला करा दिया। पहले उन्होंने ग्रैंड चाऊमीअर में पीअरे वेलण्ट के और इकोल डेस बीउक्स-आर्टस में ल्यूसियन सायमन के मार्गदर्शन में अभ्यास किया। सन १९३४ के अंत में वह भारत लौटी। बाईस साल से भी कम उम्र में वह तकनीकी तौर पर चित्रकार बन चुकी थी और असामान्य प्रतिभाशाली कलाकार के लिए आवश्यक सारे गुण उनमें आ चुके थे। 

पूरी तरह भारतीय न होने के बावजूद वह भारतीय संस्कृति को जानने के लिए बड़ी उत्सुक थी। उनकी प्रारंभिक कलाकृतियों में पेरिस के कुछ कलाकारों का पाश्चात्य प्रभाव प्रभाव साफ झलकता है। जल्दी ही वे भारत लौटीं और अपनी मृत्यु तक भारतीय कला परंपरा की पुन: खोज में जुटी रहीं। उन्हें मुगल व पहाडी कला सहित अजंता की विश्वविख्यात कला ने भी प्रेरित-प्रभावित किया। भले ही उनकी शिक्षा पेरिस में हुई पर अंततः उनकी तूलिका भारतीय रंग में ही रंगी गई। उनमें छिपी भारतीयता का जीवंत रंग हैं उनके चित्र।

 
अमृता ने अपने हंगेरियन चचेरे भाई से १९३८ में विवाह किया, फिर वे अपने पुश्तैनी घर गोरखपुर में आ बसीं। १९४१ में अमृता अपने पति के साथ लाहौर चली गई, वहाँ उनकी पहली बडी एकल प्रदर्शनी होनी थी, किंतु एकाएक वह गंभीर रूप से बीमार पडीं और मात्र २८ वर्ष की आयु में शून्य में विलीन हो गई।


अमृता शेरगिल जी की १०३ वीं जंयती के अवसर पर सन २०१६ में गूगल ने अपना डूडल उनको समर्पित किया था |

स्व॰ अमृता शेरगिल जी की १०५ वीं जंयती के अवसर पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं !!

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की ७५ वीं पुण्यतिथि

अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१)
अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१) भारत के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक थीं। उनका जन्म बुडापेस्ट (हंगरी) में हुआ था। कला, संगीत व अभिनय बचपन से ही उनके साथी बन गए। २०वीं सदी की इस प्रतिभावान कलाकार को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने १९७६ और १९७९ में भारत के नौ सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में शामिल किया है। सिख पिता उमराव सिंह शेरगिल (संस्कृत-फारसी के विद्वान व नौकरशाह) और हंगरी मूल की यहूदी ओपेरा गायिका मां मेरी एंटोनी गोट्समन की यह संतान ८ वर्ष की आयु में पियानो-वायलिन बजाने के साथ-साथ कैनवस पर भी हाथ आजमाने लगी थी।
१९२१ में अमृता का परिवार समर हिल शिमला में आ बसा। बाद में अमृता की मां उन्हें लेकर इटली चली गई व फ्लोरेंस के सांता अनुंज़ियाता आर्ट स्कूल में उनका दाखिला करा दिया। पहले उन्होंने ग्रैंड चाऊमीअर में पीअरे वेलण्ट के और इकोल डेस बीउक्स-आर्टस में ल्यूसियन सायमन के मार्गदर्शन में अभ्यास किया। सन १९३४ के अंत में वह भारत लौटी। बाईस साल से भी कम उम्र में वह तकनीकी तौर पर चित्रकार बन चुकी थी और असामान्य प्रतिभाशाली कलाकार के लिए आवश्यक सारे गुण उनमें आ चुके थे। 
पूरी तरह भारतीय न होने के बावजूद वह भारतीय संस्कृति को जानने के लिए बड़ी उत्सुक थी। उनकी प्रारंभिक कलाकृतियों में पेरिस के कुछ कलाकारों का पाश्चात्य प्रभाव प्रभाव साफ झलकता है। जल्दी ही वे भारत लौटीं और अपनी मृत्यु तक भारतीय कला परंपरा की पुन: खोज में जुटी रहीं। उन्हें मुगल व पहाडी कला सहित अजंता की विश्वविख्यात कला ने भी प्रेरित-प्रभावित किया। भले ही उनकी शिक्षा पेरिस में हुई पर अंततः उनकी तूलिका भारतीय रंग में ही रंगी गई। उनमें छिपी भारतीयता का जीवंत रंग हैं उनके चित्र।
 
अमृता ने अपने हंगेरियन चचेरे भाई से १९३८ में विवाह किया, फिर वे अपने पुश्तैनी घर गोरखपुर में आ बसीं। १९४१ में अमृता अपने पति के साथ लाहौर चली गई, वहाँ उनकी पहली बडी एकल प्रदर्शनी होनी थी, किंतु एकाएक वह गंभीर रूप से बीमार पडीं और मात्र २८ वर्ष की आयु में शून्य में विलीन हो गई।
अमृता शेरगिल जी की १०३ वीं जंयती के अवसर पर गूगल ने भी अपना डूडल उनको समर्पित किया था|
स्व॰ अमृता शेरगिल जी की ७५ वीं पुण्यतिथि के अवसर पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं !!

शनिवार, 30 जनवरी 2016

प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार अमृता शेरगिल की १०३ वीं जयंती

अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१)
अमृता शेरगिल (३० जनवरी १९१३ - ५ दिसंबर १९४१) भारत के प्रसिद्ध चित्रकारों में से एक थीं। उनका जन्म बुडापेस्ट (हंगरी) में हुआ था। कला, संगीत व अभिनय बचपन से ही उनके साथी बन गए। २०वीं सदी की इस प्रतिभावान कलाकार को भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने १९७६ और १९७९ में भारत के नौ सर्वश्रेष्ठ कलाकारों में शामिल किया है। सिख पिता उमराव सिंह शेरगिल (संस्कृत-फारसी के विद्वान व नौकरशाह) और हंगरी मूल की यहूदी ओपेरा गायिका मां मेरी एंटोनी गोट्समन की यह संतान ८ वर्ष की आयु में पियानो-वायलिन बजाने के साथ-साथ कैनवस पर भी हाथ आजमाने लगी थी।

१९२१ में अमृता का परिवार समर हिल शिमला में आ बसा। बाद में अमृता की मां उन्हें लेकर इटली चली गई व फ्लोरेंस के सांता अनुंज़ियाता आर्ट स्कूल में उनका दाखिला करा दिया। पहले उन्होंने ग्रैंड चाऊमीअर में पीअरे वेलण्ट के और इकोल डेस बीउक्स-आर्टस में ल्यूसियन सायमन के मार्गदर्शन में अभ्यास किया। सन १९३४ के अंत में वह भारत लौटी। बाईस साल से भी कम उम्र में वह तकनीकी तौर पर चित्रकार बन चुकी थी और असामान्य प्रतिभाशाली कलाकार के लिए आवश्यक सारे गुण उनमें आ चुके थे। 

पूरी तरह भारतीय न होने के बावजूद वह भारतीय संस्कृति को जानने के लिए बड़ी उत्सुक थी। उनकी प्रारंभिक कलाकृतियों में पेरिस के कुछ कलाकारों का पाश्चात्य प्रभाव प्रभाव साफ झलकता है। जल्दी ही वे भारत लौटीं और अपनी मृत्यु तक भारतीय कला परंपरा की पुन: खोज में जुटी रहीं। उन्हें मुगल व पहाडी कला सहित अजंता की विश्वविख्यात कला ने भी प्रेरित-प्रभावित किया। भले ही उनकी शिक्षा पेरिस में हुई पर अंततः उनकी तूलिका भारतीय रंग में ही रंगी गई। उनमें छिपी भारतीयता का जीवंत रंग हैं उनके चित्र।

 
अमृता ने अपने हंगेरियन चचेरे भाई से १९३८ में विवाह किया, फिर वे अपने पुश्तैनी घर गोरखपुर में आ बसीं। १९४१ में अमृता अपने पति के साथ लाहौर चली गई, वहाँ उनकी पहली बडी एकल प्रदर्शनी होनी थी, किंतु एकाएक वह गंभीर रूप से बीमार पडीं और मात्र २८ वर्ष की आयु में शून्य में विलीन हो गई।


आज अमृता शेरगिल जी की १०३ वीं जंयती के अवसर पर गूगल ने अपना डूडल उनको समर्पित किया है |

स्व॰ अमृता शेरगिल जी की १०३ वीं जंयती के अवसर पर हम सब उन्हें शत शत नमन करते हैं !!

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