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मंगलवार, 4 अगस्त 2009

दिल दिया है जान भी देगे ऐ कुर्सी तेरे लिए


कांग्रेस द्वारा बूटा सिंह को पार्टी अधिकारी के बजाय संवैधानिक अधिकारी बताए जाने के एक दिन बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग के अध्यक्ष ने मंगलवार को कहा कि वह अपना बचाव करने में सक्षम हैं। उन्हें कांग्रेस की हिमायत की जरूरत नहीं है। खुद को दलितों का रक्षक बताते हुए बूटा ने दावा किया कि उन्होंने जिंदगी भर समुदाय की सेवा की। उन्होंने धमकी दी कि अगर उनसे इस्तीफा देने के लिए कहा गया तो वह अपनी जान दे देंगे। बूटा ने पत्रकारों से कहा कि मैं नहीं समझता कि मुझे मामले में अपने बचाव के लिए कांग्रेस की सहायता की जरूरत है। मैं अपना बचाव करने में सक्षम हूं क्योंकि मैं सच के साथ हूं।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह ने भले ही प्रधानमंत्री के समक्ष अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी हो और यह दावा कर रहे हों कि उनके स्पष्टीकरण पर प्रधानमंत्री ने सकारात्मक रवैया अपनाया, लेकिन इस सबसे आम जनता संतुष्ट होने वाली नहीं है। इसलिए नहीं होने वाली, क्योंकि सीबीआई का स्पष्ट रूप से कहना है कि उसके पास उनके बेटे के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं कि उसने अनुसूचित जाति आयोग में चल रहे एक मामले को रफा-दफा करने के लिए एक शख्स रामाराव आदिक से एक करोड़ रुपये की मांग की। चूंकि सीबीआई का भी यह दावा है कि उसने बूटा सिंह के बेटे के आवास से अवैध हथियार बरामद किए और उसके हवाला संबंधों की भी जांच की जा रही है इसलिए पिता-पुत्र को संदेह का लाभ नहीं दिया जा सकता। इसका एक कारण यह भी है कि विगत में बूटा सिंह के बेटे संदिग्ध गतिविधियों में शामिल रहे हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि बूटा सिंह जब बिहार के राज्यपाल थे तो उनके बेटों पर कैसे-कैसे संगीन आरोप लगे थे। फिलहाल यह कहना कठिन है कि बूटा सिंह के बेटे पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई है और कितनी नहीं, लेकिन अब तक का उसका आचरण उसे राजनेताओं के उन परिजनों की जमात में शामिल करता है जो अपने पिता के पद और प्रभाव का हरसंभव दुरुपयोग करते हैं। बूटा सिंह ने अपने बेटे पर लगे संगीन आरोपों पर जैसी सफाई दी उस पर यकीन करने का कोई कारण नहीं, क्योंकि यह तथ्य सामने आ रहा है कि रामाराव आदिक मामले की फाइल के प्रति उन्होंने आवश्यकता से अधिक दिलचस्पी दिखाई। नि:संदेह यह महज एक संयोग नहीं हो सकता कि जिस मामले में बूटा सिंह ने अनावश्यक दिलचस्पी दिखाई उसी मामले से जुड़े शख्स से उनके बेटे ने कथित रूप से एक करोड़ रुपये मांगे।

बूटा सिंह चाहे जैसा दावा क्यों न करें, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष के रूप में वह कोई छाप नहीं छोड़ सके हैं। वह भले ही एक संवैधानिक आयोग के अध्यक्ष हों, लेकिन उनका आचरण दलगत हितों से ऊपर न उठ पाने वाले राजनेताओं सरीखा ही रहा है। उन्होंने रही-सही कसर अपने इस बयान से पूरी कर दी कि वह नैतिकतावादी नहीं हैं और उनके इस्तीफे का प्रश्न ही नहीं उठता। यह संभव है कि बूटा सिंह की ओर से खुद को सताए जाने का शोर मचाने के बाद केंद्र सरकार उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पद से हटाने का साहस न जुटा सके, लेकिन उचित यह होगा कि अब इस तरह के आयोगों की सार्थकता पर विचार-विमर्श हो। इस तरह के आयोग सेवानिवृत्त नेताओं और नौकरशाहों को सुख-सुविधा प्रदान करने और संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करने का माध्यम ही अधिक बन गए हैं। बात चाहे राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की हो अथवा अल्पसंख्यक आयोग की या फिर महिला आयोग की-ये सभी आयोग दल विशेष के सहयोगी संगठन की तरह कार्य करते हैं। अभी तक का अनुभव यह बताता है कि ज्यादातर मामलों में ये आयोग दल विशेष के अनुकूल रवैया ही अपनाते हैं। इसका ताजा उदाहरण है मध्य प्रदेश में कथित गर्भ परीक्षण मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा राज्य सरकार को दोषी ठहराना और मध्य प्रदेश के महिला आयोग की ओर से सभी आरोपों को खारिज किया जाना।

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