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रविवार, 26 जुलाई 2009

बस इतना याद रहे ....एक साथी और भी था ||







खामोश है जो यह वो सदा है, वो जो नहीं है वो कह रहा है ,
साथी
यु तुम को मिले जीत ही जीत सदा |
बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


जाओ
जो लौट के तुम, घर हो खुशी से भरा,
बस
इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


कल
पर्वतो पे कही बरसी थी जब गोलियां ,
हम
लोग थे साथ में और हौसले थे जवां |
अब
तक चट्टानों पे है अपने लहू के निशां ,
साथी
मुबारक तुम्हे यह जश्न हो जीत का ,
बस
इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||


कल
तुम से बिछडी हुयी ममता जो फ़िर से मिले ,
कल
फूल चहेरा कोई जब मिल के तुम से खिले ,
पाओ
तुम इतनी खुशी , मिट जाए सारे गिले,
है
प्यार जिन से तुम्हे , साथ रहे वो सदा ,
बस
इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||

जब
अमन की बासुरी गूजे गगन के तले,
जब
दोस्ती का दिया इन सरहद पे जले ,
जब
भूल के दुश्मनी लग जाए कोई गले ,
जब
सारे इंसानों का एक ही हो काफिला ,
बस
इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||

बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||

- जावेद अख्तर

2 टिप्‍पणियां:

  1. जब अमन की बासुरी गूजे गगन के तले,
    जब दोस्ती का दिया इन सरहद पे जले ,
    जब भूल के दुश्मनी लग जाए कोई गले ,
    जब सारे इंसानों का एक ही हो काफिला ,

    बहुत बढ़िया राष्ट्रिय भावना से लबरेज रचना . उम्दा आभार . कारगिल के शहीदों को शत शत नमन

    उत्तर देंहटाएं
  2. बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||
    बहुत सुंदर रचना .. देशभक्ति से ओतप्रोत !!

    उत्तर देंहटाएं

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