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शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

बेशरम मुशर्रफ !!!!



परवेज मुशर्रफ पब्लिसिटी लेने में माहिर है , हाल ही में एक सेमीनार में मौलाना मादिनी से बकायेदा मुंह की खाने के बाद भी उन्होंने फ़िर अपनी भड़ास निकली है और वोह भी एक एसे मुद्दे पर जो हर एक हिन्दुस्तानी के दिल के जख्मो को फ़िर से हरा कर दे | मुशर्रफ अब की बार कारगिल पर बोले है |

समझ नहीं आता कोई इतना बेशरम कैसे हो सकता है ???

आप ख़ुद देखे कितनी बेशर्मी से कारगिल का क्रेडिट ले रहे है परवेज मुशर्रफ |

"कारगिल को एक 'बड़ी सफलता' करार देते हुए पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने कहा है कि भारत 1999 के कारगिल युद्ध की वजह से ही कश्मीर पर बातचीत करने को तैयार हुआ।

करन थापर को उनके कार्यक्रम डेविल्स एडवोकेट में दिए गए साक्षात्कार में मुशर्रफ ने कहा कि हां वास्तव में यह एक बहुत बड़ी सफलता थी क्योंकि इसका एक प्रभाव पड़ा, यहां तक कि भारतीय पक्ष पर भी। हमने कश्मीर विवाद पर किस तरह चर्चा शुरू की ? यह कैसे हुआ कि भारतीय कश्मीर पर चर्चा करने पर सहमत हो गए तथा इस बात पर भी सहमत हो गए कि इसका हर हाल में समझौते के जरिए समाधान होना चाहिए। इससे पहले ऐसा हरगिज नहीं था। विवादास्पद कारगिल अभियान का जबर्दस्त बचाव करते हुए मुशर्रफ ने कहा कि इससे पहले कश्मीर मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हो सकती थी। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र में भी हमारे नेताओं के भाषण में कश्मीर का उल्लेख नहीं होता था। यह भारतीय पक्ष था, इसलिए किस तरह कश्मीर पर भारतीय बातचीत की मेज पर आए? यह पूछे जाने पर कि क्या वह यह जानकर भी कारगिल को दोहराना चाहेंगे कि यह उनके व्यक्तित्व पर सवालिया निशान लगाकर समाप्त हुआ था, मुशर्रफ ने कहा कि मैं टिप्पणी नहीं करना चाहता। पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख ने इस बात को भी स्वीकारा कि कारगिल अभियान में पाकिस्तानी सेना की रावलपिंडी कॉ‌र्प्स तथा फोर्स कमांड नार्दर्न एरिया [एफसीएनए] शामिल थी जिससे पूर्व के उन दावों का खंडन होता है कि कारगिल को कथित स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा अंजाम दिया गया और पाक सेना इसमें शामिल नहीं थी।

उन्होंने कहा कि वह अपनी पुस्तक 'लाइन ऑफ फायर' में लिख चुके हैं कि वे 'दूसरी पंक्ति के बल' थे, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें सेना की रावलपिंडी कॉ‌र्प्स और एफसीएनए द्वारा दिशा निर्देशित किया गया। मुशर्रफ ने कहा कि जो मैंने लिखा है, वह अंतिम है। मैं इसके विवरण में नहीं जा रहा। यह दावा करते हुए कि कारगिल अभियान पाकिस्तानी बलों के लिए अत्यंत अनुकूल स्थिति में समाप्त हुआ। मुशर्रफ ने कहा कि इसी की वजह से आप भारत पाकिस्तान के बारे में बात कर रहे हैं। भारतीयों ने अपने सभी बल कारगिल की ओर भेज दिए और वहां [परिणामस्वरूप] हर जगह कमजोरी दिखी।

उन्होंने कहा कि इसकी वजह से हमें पता चला कि भारतीय बल कितने सक्षम हैं और हम कितने सक्षम है कारगिल में, कश्मीर में और समूची सीमा पर स्थिति बहुत माकूल थी। हम भारत की किसी भी कार्रवाई का जवाब देने में सक्षम थे।

यह पूछे जाने पर कि उन्होंने फैसला नवाज शरीफ के ऊपर क्यों छोड़ दिया और युद्धविराम के विरोध में तर्क क्यों नहीं दिया तो मुशर्रफ ने कहा कि इसका एक कारण सेना की जमीनी स्थिति थी, दूसरा कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रहीं घटनाएं थीं। अंतररराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी तत्व सरकार पर लड़ाई रोकने का भारी दबाव बनाए हुए थे।"

२६ जुलाई के विजय दिवस से ठीक पहेले परवेज मुशर्रफ के इन बयानों को सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए और आगे आने वाले समय में परवेज मुशर्रफ के भारत आने पर रोक लगनी चाहिए | नहीं चाहिए हमे एसी डिप्लोमसी जो हमारे शहीदों का मजाक बनाये | मैं सलाम करता हूँ भूतपूर्व वायुसेना प्रमुख्य श्री टिपनिस को जिन्होंने प्रोटोकॉल को न मानते हुए परवेज मुशर्रफ को सलामी देने से साफ़ माना किया था कि मैं उसको सलामी कैसे दू जिसने मेरे जवानों का खून बहाया हो | ज्ञात हो यह तब की बात है जब परवेज मुशर्रफ पहेली बार भारत आए थे पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में | हमारी मौजूदा सरकार को भी कुछ एसा ही रुख अपनाना चाहिए और मुशर्रफ को यह समझा देना चाहिए कि भारत में या भारत के बाहर भी भारत का या भारतीयों का अपमान करना बहुत महँगा पड़ सकता है |

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