भारतीय उद्योग परिसंघ [सीआईआई] और बार एसोसिएशन आफ इंडिया द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में वर्मा ने कहा, 'अगर न्यायपालिका किसी राज्य में अनुच्छेद 356 लागू करने के कैबिनेट के फैसले [एस आर बोम्मई मामले में] में दखल दे सकती है और संविधान में संशोधन की न्यायिक समीक्षा कर सकती है तो मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि मूर्ति मामले में उत्तर प्रदेश कैबिनेट के फैसले की समीक्षा क्यों नहीं की जा सकती।'
दस जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि उत्तर प्रदेश में मायावती और बसपा के प्रतीक चिह्न हाथी की मूर्तियां लगाने के सरकारी फैसले के बारे में वह कुछ नहीं कर सकता। अदालत ने इसके लिए दलील दी थी कि इस फैसले को राज्य मंत्रिपरिषद की मंजूरी है। वर्मा ने इस फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत को कैबिनेट के निर्णयों की समीक्षा करने और उसमें दखल देने का पूरा अधिकार है।
वर्मा ने इस सोच के लिए नेताओं को भी आड़े हाथों लिया कि सत्ता में रहते वे कुछ भी कर सकते हैं।

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