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शनिवार, 25 जुलाई 2009

उत्तर प्रदेश के कारगिल शहीदों की भुला दी गई यादें



रविवार को कारगिल विजय दिवस की दसवीं वर्षगांठ है। सीमावर्ती कारगिल सेक्टर में करीब ढाई महीने तक चले युद्ध में विजयश्री हासिल करने के लिए लखनऊ शहर के पांच जांबाज शहीद हुए थे। जिन जांबाजों ने प्राणों की आहुति देकर देश की रक्षा की, उनकी स्मृतियां मिटा दी गई और उनको भुला दिया गया।

कारगिल युद्ध के नायक शहीद कैप्टन मनोज पांडेय [परमवीर चक्र] ने अपने प्लाटून नंबर पांच का नेतृत्व करते हुए तीन जुलाई 1999 को खालूबार पोस्ट पर दुश्मनों के चार बंकरों को तबाह कर दिया था। कैप्टन पाडेय सीने पर गोलियां खाने के बाद शहीद हो गए थे। इस युद्ध में राजधानी के सबसे पहले शहीद होने वाले 1/11 गोरखा रेजीमेंट के राइफलमैन सुनील जंग महत ने 15 मई 1999 को 25 बम फोड़कर दुश्मन देश की चौकी को ध्वस्त कर दिया था। इसी बीच उनके सिर में एक गोली लगी और वह शहीद हो गए। शहीद लांसनायक केवलानंद द्विवेदी [सेना मेडल] ने छह जून 1999 को कारगिल सेक्टर में वीरता से दुश्मनों का मुकाबला करते हुए प्राणों की आहूति दी थी। राजपूताना रेजीमेंट के शहीद मेजर विवेक गुप्ता [महावीर चक्र] ने 11 जून 1999 की रात में तोलोलिंग चोटी पर हमलों के दौरान कई ठिकानों पर कब्जा किया। दुश्मन द्वारा की गई फायरिंग में मेजर विवेक गुप्ता शहीद हो गए थे। कैप्टन आदित्य मिश्रा ने 25 जून 1999 को बटालिक सेक्टर के प्वाइंट 5203 पर आक्रमण कर दुश्मनों के पिकेट पर कब्जा किया था। पिकेट में संचार लाइन बिछाते समय दुश्मनों की गोलीबारी में वह शहीद हो गए।

ऐसे वीर सपूतों की शहादत से प्रेरणा लेने के लिए वन विभाग ने 1999 में अपने मुख्यालय के सामने कारगिल उपवन बनाया था। शहीदों की याद में कुछ पौधे लगाकर उनके सामने शहीदों के नाम की पट्टिका लगायी गई थी। पौधे लगाने के बाद तो कारगिल उपवन की देखभाल नहीं की गई। इस कारण उपवन के सामने स्थानीय दुकानदारों ने अतिक्रमण कर लिया। अतिक्रमण से घिरे उपवन को वन विभाग दुरुस्त तो नहीं कर सका अलबत्ता यहां शहीदों के नामों की पट्टिका उखाड़कर उनका वजूद ही समाप्त कर दिया गया। अब यहां की टूटी रेलिंग शहीदों की याद में बने उपवन की दुर्दशा बयां करती हैं।

इसी तरह तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने 10 सितम्बर 1999 को स्मृति उपवन में कारगिल पुष्करिणी [छोटे जलाशय] का शिलान्यास किया था। कुछ साल बाद जलाशय की जगह पर दीवार खड़ी कर दूसरे निर्माण कर दिए गए। यहां जलाशय का निर्माण दस साल में भी शुरू न हो सका अलबत्ता शिलान्यास किए गए पत्थर आज भी जर्जर हालत में कारगिल शहीदों की याद जरूर दिलाते हैं।

भुला दिए गए परिवारीजन

कारगिल युद्ध में सबसे पहले शहीद होने वाले राइफलमैन सुनील जंग के नाम पर छावनी में स्टेडियम बनाने और उनके एक आश्रित को नौकरी देने के वादे आज तक पूरी नहीं हुए। सुनील जंग के नाम पर गोसाईगंज में गैस एजेंसी तो मिली लेकिन दबंगों के कारण इस शहीद का परिवार वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। पुलिस इस शहीद परिवार की रक्षा के प्रति उदासीन है।

लखनऊ शहर के एकमात्र परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन मनोज पांडेय के भाई मनमोहन पांडेय को विधानसभा में सहायक मार्शल की नौकरी तो मिली। वह डिप्टी मार्शल का काम करते हैं लेकिन आज तक उनको इस पद पर नियुक्त कर स्थायी नहीं किया गया।

शहीद लांसनायक केवलानंद द्विवेदी के घर आज तक कोई सरकारी प्रतिनिधि यह जानने नहीं पहुंचा कि उनका परिवार कैसे अपना जीवन बीता रहा है। पेंशन से ही उनकी पत्‍‌नी कमला देवी परिवार चला रही हैं।

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