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शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

फिर हुआ हाकी खिलाड़ियों का अपमान


राष्ट्रीय नायकों के साथ ऐसा अपमानजनक व्यवहार भारत में ही देखा जा सकता है। कभी हाकी टीम को कोई टूर्नामेंट जीतने के बाद भी स्वदेश वापसी पर स्वागत के लिए कोई अधिकारी नहीं मिलता है तो कई बार उन्हें अपने खर्च पर ही एयरपोर्ट से आटो में बैठकर घर जाना पड़ता है।

इस बार भी अपमानजनक व्यवहार की शिकार बनी भारतीय हाकी टीम। जो खिलाड़ी देश का झंडा ऊंचा करने यूरोपीय टूर पर जाने की तैयारी कर रहे थे, उन्हें यूरोप तो दूर पुणे से दिल्ली तक आने में ही अधिकारियों की लापरवाही के कारण अपमान का कड़वा घूंट पीना पड़ा। भारतीय खेल प्राधिकरण के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार के चलते गुरुवार को यूरोपीय दौरे पर जाने वाली भारतीय हाकी टीम को दिल्ली पहुंचने में दस घंटों से भी ज्यादा का समय लग गया।

टीम के मुख्य कोच जोस ब्रासा व सहायक कोच हरेंद्र ने बताया कि हाकी टीम को रात एक बजे इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से इंग्लैंड के लिए रवाना होना था। रवाना होने से पूर्व उसे पुणे से गुरुवार सुबह सवा छह बजे किंगफिशर की फ्लाइट से दिल्ली पहुंचना था। जिसके लिए उसने पुणे स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण के पदाधिकारियों से खिलाड़ियों को हवाई अड्डे पहुंचाने के लिए रात साढे़ तीन बजे दो बस देने का अनुरोध किया था। मगर पदाधिकारियों ने बस के स्थान पर दो मेटाडोर भेज दीं, जिसमें खिलाड़ियों ने जाने से इन्कार कर दिया। जब बस पहुंची तब तक साढ़े पांच बज चुके थे। ऐसे मे वह पुणे हवाई अड्डे पर देरी से पहुंचे। उन्होंने किंगफिशर एयरलाइंस के अधिकारियों से अनुरोध किया कि खिलाड़ियों को वह सवा छह बजे की फ्लाइट से भेज दें। उनका सामान बाद में किसी अन्य एयरलाइंस के माध्यम से राजधानी पहुंचा दें। मगर न तो भारतीय खेल प्राधिकरण और न ही एयरलाइंस के अधिकारियों ने इस पर कोई ध्यान दिया।

इस कारण सभी खिलाड़ी पुणे एयरपोर्ट पर सुबह सवा छह बजे तक बैठे रहे।

ऐसे में उन्होंने राजधानी पहुंचने के लिए तीन बजे की फ्लाइट ली। तब कहीं जाकर हाकी टीम के यह नेशनल हीरो शाम को पांच बजे दिल्ली पहुंच सके। ब्रासा ने इस घटना पर दुख जताया कि राष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ इस तरह का व्यवहार किया गया। वहीं, हाकी इंडिया के अध्यक्ष एके मटटू ने इस बाबत भारतीय खेल प्राधिकरण तथा एयरलाइंस से शिकायत करने का फैसला किया है।

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