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शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

हो सके तो समझ लेना क्या कहना चाहता हूँ |


'इस' मुद्दे पर क्या लिखू समझ नहीं पाता हूँ ,
अपनी एक पुरानी पोस्ट का लिंक दिए जाता हूँ ,

हो सके तो समझ लेना क्या कहना चाहता हूँ |
हूँ हिन्दू.....गर्व है मुझ को, पर मुस्लिम को भी गले लगता हूँ , 
हो सके तो समझ लेना क्या कहना चाहता हूँ |
खून चाहे तेरा हो, चाहे मेरा हो...क्यों बहे बेकार, नहीं समझ पाता हूँ ,  
हो सके तो समझ लेना क्या कहना चाहता हूँ | 
रास्ते चलते चलते आये मंदिर, मज्जिद, गुरद्वारा या हो चर्च...सब पर ही शीश झुकता हूँ , 
हो सके तो समझ लेना क्या कहना चाहता हूँ |

7 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति..अपनी सुंदर बात समझाने का..
    धन्यवाद शिवम जी

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  2. शिवम भाई,
    ह से हिंदू...म से मुसलमान...
    ह और म को मिला दो तो बनता है हम...
    जय हिंद...

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  3. समझ गये बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है

    उत्तर देंहटाएं
  4. हम तो समझ गए जी....लेकिन हो सकता है कि कुछ लोगों को शायद ये बात समझ में न ही आए !

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  5. समझने वाले समझ गए हैं ना समझे ....

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