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शनिवार, 19 सितंबर 2009

एल्जाइमर्स डिमेंशिया - इस मर्ज को दे सकते है मात !!


एल्जाइमर्स डिमेंशिया अधेड़ावस्था व बुजुर्गावस्था में होने वाला एक ऐसा रोग है, जिसमें रोगी की स्मरण शक्ति गंभीर रूप से कमजोर हो जाती है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे यह रोग भी बढ़ता जाता है। याददाश्त क्षीण होने के अलावा रोगी की सूझबूझ, भाषा, व्यवहार और उसके व्यक्तित्व पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
 
[लक्षण]

* जरूरत का सामान जैसे चाभी, बटुआ या कपड़े इधर-उधर रखकर भूल जाना।
* लोगों के नाम, पता या नंबर भूल जाना।
* रोग की चरम अवस्था में रोगी खाना खाने के बाद भी भूल जाता है कि उसने खाना खाया है या नहीं। कई बार इस रोग से पीड़ित व्यक्ति अपने ही घर के सामने भटकते रहते हैं, लेकिन वे घर नहीं ढूंढ़ पाते।
 
[दैनिक कार्यो को करने में असमर्थता]

* दैनिक कार्य जैसे खाना बनाना, रिमोट या मोबाइल जैसे घरेलू उपकरणों को चलाने में असमर्थता महसूस करना।
* बैंक के कार्य जैसे पैसे निकालने या जमा करने में गलतियां होना।
* गंभीर रूप से ग्रस्त रोगी नित्य क्रिया के कार्य जैसे- कमीज का बटन लगाना या नाड़ा भी नहीं बांध पाते है।
 
[व्यवहार व व्यक्तित्व में परिवर्तन आना]

* अत्यधिक चिड़चिड़ापन, वेवजह शक करना, अचानक रोने लगना या बेचैनी महसूस करना।
* एक ही काम को अनेक बार करना या एक ही बात को बार-बार पूछते रहना।
 
[भाषा व बातचीत प्रभावित होना]

बात करते समय रोगी को सही शब्द, विषय व नाम ध्यान में नहीं रहते। ऐसे में रोगी की भाषा अत्यंत अटपटी व अधूरी लगती है।
 
[इलाज]

कुछ दवाएं उपलब्ध है, जिनके सेवन से ऐसे रोगियों की याददाश्त और उनकी सूझ-बूझ में सुधार होता है। इन दवाओं को जितना जल्दी शुरू करे उतना ही फायदेमंद होता है क्योंकि ये दवाइयां रोग को आगे बढ़ने से रोकती है। अक्सर परिजन इस रोग के लक्षणों को वृद्धावस्था की स्वाभाविक खामियां मानकर इलाज नहीं करवाते। इस कारण रोग असाध्य हो जाता है।
दवाओं से अधिक कई बार रोगियों और उनके परिजनों को काउंसलिंग की आवश्यकता होती है। काउंसलिंग के तहत रोगी के अलावा उसके परिजनों को मरीज के लक्षणों की सही पहचान कर उनसे निपटने की सटीक व्यावहारिक विधियां बतायी जाती हैं।
- डॉ. उन्नति कुमार

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