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Wednesday, September 2, 2009

जी हाँ 'बुद्धा मुस्कुराये' थे - इस में कोई शक नहीं है !!



भारत के परमाणु अस्त्र कार्यक्रम के पूर्व समन्वयक के. संथानम ने पोखरण-2 के बारे में अपने बयान से जैसे एक और अणु विस्फोट सा कर दिया है। संथानम की निंदा और उनके बयानों के खंडन का दौर जारी है। उनके बयान को हमारे राष्ट्र गौरव के एक प्रतीक पर हमले के रूप में लिया जा रहा है, लेकिन कई दशकों तक भारत के परमाणु कार्यक्रम की सेवा करने वाले एक वैज्ञानिक को सिर्फ इसीलिए 'खलनायक' के रूप में देखने का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि उन्होंने पोखरण-2 के पहले हाइड्रोजन बम परीक्षण के बारे में 'सच' बोलने का साहस दिखाया। जरूरत उनके बयान को 'असत्य' करार देने में पूरी शक्ति लगा देने की नहीं है। जरूरत है असलियत का पता लगाने और उसके अनुसार आगे कदम उठाने की। क्या हमें संथानम के मंसूबों पर संदेह करना चाहिए? शायद नहीं। एक सामान्य वैज्ञानिक बड़े स्तर पर प्रतिवाद के बावजूद अपने बयान पर कायम है तो ऐसा अकारण नहीं हो सकता।

वैसे, संथानम सामान्य वैज्ञानिक नहीं हैं, बल्कि लंबे समय तक भारत के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े रहे हैं और पोखरण-2 के दौरान परीक्षण स्थल के निदेशक थे। संथानम के बयान के बाद मीडिया और आम लोगों के बीच ऐसी धारणा बन रही है कि पोखरण-2 के दौरान 11 और 13 मई 1998 को हुए परमाणु परीक्षण उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। ऐसा नहीं है। संथानम उस समय हुए पाच परीक्षणों में से सिर्फ पहले परीक्षण के बारे में कह रहे हैं। उसे भी उन्होंने नाकाम नहीं बताया है। उसे उम्मीदों से कम माना है। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत के परमाणु अस्त्र कार्यक्रम के बारे में किसी तरह की शका नहीं है। हमारी परमाणु क्षमता को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं है। संथानम, परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डा. पीके आयंगर और कुछ अन्य वैज्ञानिकों का संकेत पहले परमाणु परीक्षण की ओर है, जो एक थर्मो-न्युक्लियर परीक्षण था। इसे आम भाषा में हाइड्रोजन बम कहा जाता है। यदि संथानम और इन वैज्ञानिकों की बात सही है तब भी हम इस बात को लेकर आश्वस्त हो सकते हैं कि भारत के पास 'हाइड्रोजन बम भले ही हो, परमाणु बम तो मौजूद है। देश की सुरक्षा के लिए वह पर्याप्त है। अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम ही गिराया था। हाइड्रोजन बम परमाणु बम से आगे की चीज है। उसका विस्फोट करने के लिए पहले परमाणु विस्फोट की क्षमता होना अनिवार्य है, क्योंकि हाइड्रोजन बम विस्फोट के लिए अत्यधिक ऊर्जा की जरूरत होती है। इस विस्फोट की ऊर्जा का इस्तेमाल हाइड्रोजन बम के विस्फोट के लिए किया जाता है, जो दूसरे स्तर का परमाणु हथियार है। संथानम और अन्य वैज्ञानिकों ने परमाणु विस्फोट की हमारी क्षमता पर कोई संदेह नहीं उठाया है। उन्होंने दूसरे स्तर के विस्फोट की गहनता को उम्मीद से कम बताया है। इसे लेकर बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि परमाणु बम की विनाशलीला भी कोई कम नहीं होती वैसे भी इन बमों को इस्तेमाल करने की स्थिति शायद कभी न आए। इनका वास्तविक उपयोग शत्रु को यह दिखाने में है कि यदि हम युद्ध में कमजोर पड़े तो इस विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं।

संथानम का तर्क है कि थर्मोन्युक्लियर युक्ति का सफलतापूर्वक परीक्षण पहले ही प्रयास में हो जाए, यह कतई जरूरी नहीं है। इसमें लज्जा जैसी कोई बात नहीं है। इंग्लैंड ने अपने हाइड्रोजन बम के परीक्षण के लिए तीन परमाणु विस्फोट किए थे और फ्रांस को 29 परीक्षण करने पड़े थे। हमने सिर्फ एक हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया है। अमेरिका , रूस और चीन ने यदि आज इसमें दक्षता प्राप्त कर ली है तो इसलिए कि उन्होंने लंबे समय तक ऐसे सैंकड़ों परीक्षण किए हैं। हमारा एकमात्र हाइड्रोजन बम परीक्षण यदि हमें उनके स्तर पर नहीं ले जा सकता तो इसमें प्रतिष्ठा से जुड़ी क्या बात है? जरूरत है तो शायद पुन: परमाणु परीक्षण करने के हमारे एकतरफा संकल्प पर पुनर्विचार करने की।संभवत: यही संथानम के बयानों का उद्देश्य भी है। आम तौर पर यह माना जाता है कि आज तकनीक जिस स्तर पर है उसमें बार-बार परमाणु परीक्षण करने की जरूरत नहीं होती। भारत के बहुत से वैज्ञानिक भी यही कहते हैं कि अब हमें परीक्षण करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हमारे पास पर्याप्त डेटा मौजूद है। संथानम के बयान को यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो संभवत: वह सिर्फ इतना कहना चाहते हैं कि हमारे पास पर्याप्त डेटा नहीं है, क्योंकि हमारा पहला हाइड्रोजन बम परीक्षण उन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं था जो उससे की गई थीं। यानी भारत को सीटीबीटी पर दस्तखत नहीं करने चाहिए और भविष्य में परमाणु परीक्षणों करने के लिए रास्ता खुला रखना चाहिए।

2 comments:

  1. विचारणीय आलेख.

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  2. नमस्कार, आप ने सारी बात खोल कर लिखी, वेसे तो मुझे भारत के बारे इतना पता नही, लेकिन यह खबर आज कल मै मेने कही पढी थी, ओर हेरानगी भी हुयी कि... लेकिन आप का लेख पढ कर सारी बात पता चली, आप के इन शब्दो ने "उसे उम्मीदों से कम माना है। इसका अर्थ यह हुआ कि भारत के परमाणु अस्त्र कार्यक्रम के बारे में किसी तरह की शका नहीं है। हमारी परमाणु क्षमता को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं है।" सारी बात से पर्दा हटा दिया.
    आप ने बहुत अच्छा लिखा.
    धन्यवाद

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