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बुधवार, 9 सितंबर 2009

देर आमद,दुरुस्त आमद - उप्र में स्मारक और स्थलों के निर्माण पर रोक

उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार को मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा। स्मारकों और स्थलों के निर्माण में हजारों करोड़ रुपये फिजूलखर्च करने पर राज्य सरकार को फटकार तो सुननी ही पड़ी, साथ ही परियोजनाओं पर चल रहा काम भी रुक गया है। अदालत ने लखनऊ में डा. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल, मान्यवर श्री कांशीराम जी स्मारक स्थल, स्मृति उपवन तथा रामाबाई अंबेडकर मैदान में चल रहे निर्माण कार्य पर रोक लगा दी है।
न्यायमूर्ति बीएन अग्रवाल व न्यायमूर्ति आफताब आलम की पीठ ने स्मारक और स्थलों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने को फिजूलखर्ची बताते हुए कहा कि जिस राज्य की विकास दर दो फीसदी हो, वहां इसे कैसे न्यायोचित ठहराया जा सकता है। अगर इसी तरह केंद्र सरकार सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के स्मारक बनाने का निर्णय कर ले और हजारों करोड़ रुपये खर्च करे, तो क्या वह उचित होगा। इस पर राज्य सरकार के वकील सतीश चंद्र मिश्रा ने कहा कि कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्रियों के स्मारक पर खर्च किया है। राजघाट, तीनमूर्ति भवन पर करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन तब किसी ने कुछ नहीं कहा। एक ही परिवार के पांच लोगों के नाम परियोजनाएं शुरू की गई पर कभी जनहित याचिका दाखिल नहीं हुई। कोर्ट ने सवाल किया-'अगर केंद्र सरकार सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों या कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों के स्मारक बनवाने लगे तो।' मिश्रा ने कहा 'हां बने हैं'। जस्टिस अग्रवाल ने पूछा-'नरसिंह राव और एचडी देवेगौड़ा का कौन सा स्थल है।' राज्य सरकार जिस याचिका को राजनैतिक कह रही है उसमें जनहित शामिल है। उनकी राय में याचिका में बड़ा कानूनी प्रश्न है जिस पर कोर्ट विचार कर सकता है। निर्माण लिए विधानसभा से बजट पास होने की मिश्रा की दलील पर कोर्ट ने कहा कि वे बजट भी मंगा कर देख सकते हैं। इस तरह की फिजूलखर्ची पर कोर्ट विचार कर सकता है। इसे कानूनी मुद्दा मानकर ही कोर्ट ने नोटिस जारी किया था। पीठ ने मिश्रा से कहा कि या तो वे सरकार की ओर से भरोसा दिलाएं कि आगे निर्माण जारी नहीं रखा जाएगा वरना कोर्ट रोक लगा देगा। इस पर मिश्रा ने निर्माण जारी नहीं रखने की बात कही। कोर्ट ने उनका बयान दर्ज कर लिया और कहा कि राज्य सरकार की अंडरटेकिंग के बाद अंतरिम आदेश पारित करने की जरूरत नहीं है।
इससे पहले अर्जीकर्ता मिथलेश कुमार सिंह की ओर से पेश अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि कोर्ट ने गत 27 फरवरी को याचिका में लंबित इमारतों को ढहाने पर रोक लगा दी थी। इस आदेश के बाद भी सरकार ढहाई गई जगहों पर जोर-शोर से स्मारकों स्थलों और मूर्तियों का निर्माण कराने में लगी है। ऐसे में याचिका में उठाया गया मुद्दा ही महत्वहीन हो जाएगा। उन्होंने चल रहे निर्माण कार्य पर रोक लगाने का अनुरोध किया। जब राज्य सरकार ने कहा कि सभी परियोजनाओं पर काम पूरा हो चुका है और सिर्फ फिनिशिंग चल रही है, तो कोर्ट ने कहा कि जब इमारतों को 27 फरवरी के आदेश के पहले ही ढहाया जा चुका था तो सरकार ने उसी समय कोर्ट को यह बात क्यों नहीं बताई थी। वे महत्वहीन आदेश क्यों देते। ऐसे तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी मामले महत्वहीन हो चुके हैं। आठ-दस महीने में काम पूरा हो जाने पर आश्चर्य जताते हुए कोर्ट ने कहा कि सरकार के पास इतनी मशीनरी है इसका मतलब है कि रात-दिन काम हुआ है। कोर्ट ने राज्य सरकार को 24 सितंबर तक और अर्जीकर्ता को 27 सितंबर तक प्रतिउत्तर देने की छूट देते हुए अगली सुनवाई 29 सितंबर तय कर दी।

3 टिप्‍पणियां:

  1. चलो अच्छा ही हुआ।
    आखिर कोर्ट ने सफेद हाथियों पर संज्ञान तो लिया!

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  2. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! बेहद सुंदर प्रस्तुती!

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