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सोमवार, 9 अगस्त 2010

एक रिपोस्ट - काकोरी कांड - ०९ / ०८ / १९२५ - ८५ वी वर्षगाँठ पर विशेष

काकोरी कांड - ०९ / ०८ / १९२५




भारतीय स्वाधीनता संग्राम में काकोरी कांड एक ऐसी घटना है जिसने अंग्रेजों की नींव झकझोर कर रख दी थी। अंग्रेजों ने आजादी के दीवानों द्वारा अंजाम दी गई इस घटना को काकोरी डकैती का नाम दिया और इसके लिए कई स्वतंत्रता सेनानियों को 19 दिसंबर 1927 को फांसी के फंदे पर लटका दिया।
फांसी की सजा से आजादी के दीवाने जरा भी विचलित नहीं हुए और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए। बात 9 अगस्त 1925 की है जब चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह सहित 10 क्रांतिकारियों ने मिलकर लखनऊ से 14 मील दूर काकोरी और आलमनगर के बीच ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया।
दरअसल क्रांतिकारियों ने जो खजाना लूटा उसे जालिम अंग्रेजों ने हिंदुस्तान के लोगों से ही छीना था। लूटे गए धन का इस्तेमाल क्रांतिकारी हथियार खरीदने और आजादी के आंदोलन को जारी रखने में करना चाहते थे।
इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के नाम से जानी गई, जिससे गोरी हुकूमत बुरी तरह तिलमिला उठी। उसने अपना दमन चक्र और भी तेज कर दिया।
अपनों की ही गद्दारी के चलते काकोरी की घटना में शामिल सभी क्रांतिकारी पकडे़ गए, सिर्फ चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के 45 सदस्यों पर मुकदमा चलाया गया जिनमें से राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।
ब्रिटिश हुकूमत ने पक्षपातपूर्ण ढंग से मुकदमा चलाया जिसकी बड़े पैमाने पर निंदा हुई क्योंकि डकैती जैसे मामले में फांसी की सजा सुनाना अपने आप में एक अनोखी घटना थी। फांसी की सजा के लिए 19 दिसंबर 1927 की तारीख मुकर्रर की गई लेकिन राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले 17 दिसंबर को ही गोंडा जेल में फांसी पर लटका दिया गया। राम प्रसाद बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल और अशफाक उल्ला खान को इसी दिन फैजाबाद जेल में फांसी की सजा दी गई।
फांसी पर चढ़ते समय इन क्रांतिकारियों के चेहरे पर डर की कोई लकीर तक मौजूद नहीं थी और वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़ गए।
काकोरी की घटना को अंजाम देने वाले आजादी के सभी दीवाने उच्च शिक्षित थे। राम प्रसाद बिस्मिल प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही भाषायी ज्ञान में भी निपुण थे। उन्हें अंग्रेजी, हिंदुस्तानी, उर्दू और बांग्ला भाषा का अच्छा ज्ञान था।
अशफाक उल्ला खान इंजीनियर थे। काकोरी की घटना को क्रांतिकारियों ने काफी चतुराई से अंजाम दिया था। इसके लिए उन्होंने अपने नाम तक बदल लिए। राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने चार अलग-अलग नाम रखे और अशफाक उल्ला ने अपना नाम कुमार जी रख लिया।
खजाने को लूटते समय क्रान्तिकारियों को ट्रेन में एक जान पहचान वाला रेलवे का भारतीय कर्मचारी मिल गया। क्रांतिकारी यदि चाहते तो सबूत मिटाने के लिए उसे मार सकते थे लेकिन उन्होंने किसी की हत्या करना उचित नहीं समझा।
उस रेलवे कर्मचारी ने भी वायदा किया था कि वह किसी को कुछ नहीं बताएगा लेकिन बाद में इनाम के लालच में उसने ही पुलिस को सब कुछ बता दिया। इस तरह अपने ही देश के एक गद्दार की वजह से काकोरी की घटना में शामिल सभी जांबाज स्वतंत्रता सेनानी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।
 
सभी जांबाज क्रांतिकारियों को मैनपुरी वासीयों का शत शत नमन |

(नीचे दी हुयी पोस्ट भी जरूर देखे)

 

सरफरोशी की तमन्ना


इंक़लाब जिंदाबाद !!

12 टिप्‍पणियां:

  1. इस पावन पर्व की याद दिलाने का शुक्रिया। डॉ अमर कुमार ने एक ब्लॉग काकोरी कांड पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल की ज़ुबानी काफी जानकारी रखी है। सन्दर्भ के लिये लिंक दे रहा हूँ:
    http://kakorikand.wordpress.com/

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  2. इस पावन पर्व की याद दिलाने का शुक्रिया। डॉ अमर कुमार ने एक ब्लॉग काकोरी कांड पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल की ज़ुबानी काफी जानकारी रखी है। सन्दर्भ के लिये लिंक दे रहा हूँ:
    http://kakorikand.wordpress.com/

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  3. सिवम बाबू! बहुत अच्छा लगा इतिहास का गलियारा में एक सफर... काकोरी काण्ड स्वतंत्रता संग्राम का एक मील का पत्थर है... उन इंक़लाबियों को हमारा नमन!!!

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  4. बेहतरीन पोस्ट, एक यादगार घटना और कुछ जांबाज़ लोगों के बारे में अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद !

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  5. शिवम, बहुत नेक काम. इन्हीं महान आत्माओं की वजह से आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं. इनके सपनों को धूर्त नेताओं ने मिट्टी में मिला दिया है लेकिन इन्हें याद रखना इसलिये जरूरी है कि हमारी नसों में सचाई और बदलाव का लावा बहता रहे. धन्यवाद.

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  6. आज के इस मतलबी दुनिया में जब चारों ओर भागदौड और ऊपर पहुँचने की होड लगी है,शायद हम उन लोगों को भूल गए हैं जिन्होंने अपने जान की कीमत पर इस देश को आज़ादी दिलाई| लेकिन आप जैसे कुछ लोगों को देखकर लगता है कि अभी भी सच्चाई का दमन थाम कर चलने वाले और उसके लिए आवाज़ उठाने वालों के हक में खड़े होने वालों की तादाद काफी माफ़ी ज्यादा है| इस बेहतरीन पोस्ट के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं| धन्यवाद!

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  7. संग्रहणीय प्रस्तुति!
    सभी जांबाज क्रांतिकारियों को शत शत नमन!

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  8. ओर हम आज इन्ही गोरो को सर पर बिठा रहे है..... इन की जुवान बोलते है, इन की नकल करते है? क्या यह उचितह ै? आज भी इन का ब्स चले तो हमे आज भी यह गुलाम बना ले, अमेरिका यही तो कर रहा है.....चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह ओर उन सब क्रांतिकारियों को शत शत नमन! जिन का नामआप यहां नही लिख पाये, ओर उन सभी क्रांतिकारियों को भी शत शत नमन! जिन्हो ने देश की आजादी के लियेअपनी जान की वाजी लगा दी.
    धन्यवाद

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  9. इनके साथ ही उन अनगिनत अनाम शहीदों को हमारा नमन जिनकी बलिदान की यशगाथा कहीं लिपिबद्ध न की जा सकी है !

    आज़ादी के मतवाले उन सिरफिरों के स्वयँ की निर्लोभ आहुति को भुलाया नहीं जा सकता, भले ही हमारे कृत्धन इतिहास लेखक राजनैतिक कारणों के चलते उनकी उपेक्षा करते आये हों । पर जन जन के हृदय में बसी उनकी शौर्यकथायें भारत-भूमि को कभी उनसे उऋण न होने देंगी !
    ॐ शान्तिः रः शान्तिः शान्तिऽ !

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  10. That's it !
    visible after approval ?
    It has always been an irksome issue fo me in a comment box !

    I am sorry.. Have we held bondage our own freedom ?

    I apologise the immortal warrior's soul for ourselve being sensitive & intolerant to verbal violence even , whatsoever it may be ?

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  11. नमन है उन वीरों का जिन्‍होनें अपने प्राणों की आहुति दी ।

    पर अफसोस इस बात का है कि 90 प्रतिशत लोग केवल गाँधी को ही देश की आजादी का कारण मानते हैं ।

    और क्‍यूँकि गाँधी इन क्रान्तिकारियों के खिलाफ था अत: ये मूर्ख गाँधी को ही देवता मानते हैं और किसी का नाम तक लेना उचित नहीं समझते ।

    भारतीय इतिहास के दो सबसे बडे कलंक हैं जिनके कुकर्मों का परिणाम हजारों वर्ष तक भोगना पडेगा ।

    उत्तर देंहटाएं

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