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रविवार, 25 अप्रैल 2010

शब्दों को पिरो दिलों को जोड़ने का प्रयास


जब देश में भाषा व क्षेत्र के नाम पर अलगाववाद की राजनीति कर एकता व अखंडता को क्षति पहुंचाई जा रही हो ऐसे में 95 भाषाओं के शब्दों को एक माला में पिरोना निश्चित ही सराहनीय प्रयास है। यह प्रयास किया है हिंदी के प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने। यह प्रयास भाषाओं ही नहीं बल्कि दिलों को भी जोड़ रहा है।

भाषा विद्वानों के अनुसार अब तक 16 भाषाओं का समेकित शब्द कोष ही उपलब्ध है। वर्ष 1961 में विश्वनाथ दिनकर नरवणे ने 'भारतीय व्यवहार कोष' संपादित किया था। केंद्रीय हिंदी निदेशालय आगरा की ओर से अधिकतम 14 भाषाओं का समेकित शब्द कोष निर्माण किया गया था।

डा राजेंद्र ने अंग्रेजी से लेकर झारखंड के सिंहभूमि की जनजातियों की भाषा 'हो' का भी शब्द संग्रह किया है। कोष में 11 विदेशी [चीनी, चेक, जर्मन, नेपाली, जापानी, फ्रांसीसी, अरबी, वर्मी, रूसी, स्पेनी, इंडोनेशियाई] भाषाओं के साथ चड संयुक्त राष्ट्र, 22 भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची व 17 हिंदी की बोलियों को भी शामिल किया है।

समाहित की गयीं 95 भाषाओं में अंगामी, अंग्रेजी, अरबी, अवधि, असमिया, आदी, आपातानी, इंडोनेशियाई, इदू, उड़िया, उर्दू, एनाल, कन्नौजी, कन्नड, कर्बी, कश्मीरी, काबुई, कुर्की, कुडुख, कुमाऊनी, कोंकणी, कोन्यक, कौरवी, खासी, खेजा, गाइते, गारो, गुजराती, गोंडी, चकमा, चांग, चीनी, चेक, छत्तीसगढ़ी, जर्मन, जापानी, जेलियांग, डोगरी, तमिल, तरांव, तांगखुल, तेलुगू, त्रिपुरी, दिमासा, नागामी, निमाड़ी, निर्शा, नेपाली, नोक्ते, पंजाबी, पाइते, पालि, पोचुरी, प्राकृत, फ्रांसीसी, फारसी, फोम, बंगला, बघेली, बर्मी, बुंदेली, बोडो, ब्रजभाषा, भोजपुरी, भोटी, मगही, मणिपुरी, मराठी, मरिंग, मलयालम, माओ, मिजो, मिरी, मुंडारी, मेम्बा, मैथिली, थिमचुंगर, राजस्थानी, रियांग, रूसी, रेगमा, लिम्बु, लोचा, लोथा, वाइफे, संथाली, संस्कृत, सांगतम, सिंधी, सिंहली, सिम्ते, स्पेनी, हमार, हिंदी व हो को शामिल हैं। कोष में फिलहाल 7695 शब्द हैं।

स्थानीय शांति प्रसाद जैन कालेज के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के प्रोफेसर डा सिंह के अनुसार समेकित पर्याय शब्दकोष की कच्ची रूपरेखा में भाषाओं की संख्या 16 थी, फिर 34 हुई, बाद में 44, उसके बाद 77 और अब 95 हो गई है।

उनका कहना है कि कौन सी भाषा का कोष ग्रंथ कहां से प्रकाशित हुआ है, इसे पता करना मुश्किल था। कुछ भाषाएं ऐसी भी हैं, जिनके कोष ग्रंथ तैयार नहीं हैं। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ी, अवधि, बघेली, कन्नौजी, निमाड़ी, ब्रजभाषा व बंगला आदि। कोंकणी और डोगरी के लिए भी काफी परेशानी हुई। बहुत से शब्दों का पर्याय सभी भाषाओं में न होने से सर्वनिष्ठ शब्दों को ही शब्द कोष में शामिल किया गया है।

उदाहरण के लिए इस शब्द कोष में रोटी शब्द नहीं है। क्योंकि जापानी भाषा में यह कनसेप्ट नहीं है। समानांतर कोष, शब्देश्वरी, पेंगुइन इंग्लिश-हिन्दी, व हिंन्दी-इंग्लिश थिसा रस एंड डिक्शनरी के संपादक डा अरविंद कुमार मानते हैं कि शब्दकोष का निर्माण कार्य 'टीम वर्क' के बिना संभव नहीं है। कुमार इसे सशक्त शुरुआत मानते हैं। इससे पहले डा सिंह भोजपुरी व्याकरण, शब्द कोष और अनुवाद की समस्या, भाषा का समाजशास्त्र, भारत में नाग परिवार की भाषाएं, भोजपुरी भाषा शास्त्र, दलित साहित्य की रचना कर चुके हैं।


रिपोर्ट :- सतीश कुमार

6 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तम और उपयोगी पोस्ट लगाने के लिए शुक्रिया!

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  2. ब्लौगर बंधु, हिंदी में हजारों ब्लौग बन चुके हैं और एग्रीगेटरों द्वारा रोज़ सैकड़ों पोस्टें दिखाई जा रही हैं. लेकिन इनमें से कितनी पोस्टें वाकई पढने लायक हैं?
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    कृपया हिंदीब्लौगजगत को एक बार ज़रूर देखें : http://hindiblogjagat.blogspot.com/

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  3. बढ़िया पोस्ट .... अच्छी जानकारी. शुक्रिया !

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  4. बहुत उपयोगी जानकारी । शुक्रिया !

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  5. बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने धन्यवाद

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