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गुरुवार, 19 नवंबर 2009

इंदिरा गांधी के फैसलों में होती थी हिम्मत !!


पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक निडर नेता थीं जिन्होंने परिणामों की परवाह किए बिना कई बार ऐसे साहसी फैसले किए जिनका पूरे देश को लाभ मिला और उनके कुछ ऐसे भी निर्णय रहे जिनका उन्हें राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ा लेकिन उनके प्रशंसक और विरोधी, सभी यह मानते हैं कि वह कभी फैसले लेने में पीछे नहीं रहती थीं और जनता की नब्ज समझने की उनमें विलक्षण क्षमता थी।

उनके समकालीन नेताओं के अनुसार बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पूर्व रजवाड़ों के प्रिवी पर्स समाप्त करना, कांग्रेस सिंडिकेट से विरोध मोल लेना, बांग्लादेश के गठन में मदद देना और अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को राजनयिक दांव पेंच में मात देने जैसे तमाम फैसले और कदम इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व में मौजूद निडरता के परिचायक थे।

साथ ही आपातकाल की घोषणा, लोकनायक जयप्रकाश नारायण तथा प्रमुख विपक्षी नेताओं को जेल में डालना, आपरेशन ब्लू स्टार जैसे कुछ निर्णयों के कारण उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।

लाल बहादुर शास्त्री के बाद प्रधानमंत्री बनी इंदिरा को शुरू में गूंगी गुड़िया की उपाधि दी गई थी। लेकिन 1966-77 और 1980-84 के दौरान प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा ने अपने साहसी फैसलों के कारण साबित कर दिया कि वह एक बुलंद शख्सियत की मालिक हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री वसंत साठे ने कहा कि इंदिरा गांधी का यह विलक्षण गुण था कि वह लोगों की भीड़, भले ही वह नाराज ही क्यों न हो, में जाने से बिल्कुल नहीं घबराती थीं। भीड़ की नब्ज पहचानने की उनमें जबर्दस्त क्षमता थी। उन्होंने बताया कि एक बार इंदिरा ने मुझसे कहा था कि वह भीड़ के बीच जाकर ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं क्योंकि भीड़ ही उनका सुरक्षा कवच बन जाती है।

उन्होंने बताया कि जनता पार्टी सरकार के शासनकाल में इंदिरा की सुरक्षा बिल्कुल हटा ली गई थी। लेकिन वह उस दौरान लगभग पूरे देश में घूमी। साठे ने उड़ीसा में श्रीमती गांधी के साथ हुई एक घटना को याद करते हुए बताया कि कुछ लोगों ने एक जनसभा में उन पर पथराव किया। एक पत्थर उनकी नाक पर लगा और खून बहने लगा।

इस घटना के बावजूद इंदिरा गांधी का हौसला कम नहीं हुआ। वह वापस दिल्ली आईं। नाक का उपचार करवाया और तीन चार दिन बाद वह अपनी चोटिल नाक के साथ फिर चुनाव प्रचार के लिए उड़ीसा पहुंच गईं। उनके इस हौसले के कारण कांग्रेस को उड़ीसा के चुनाव में काफी लाभ मिला।

पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यप्रकाश मालवीय कहते हैं कि इंदिराजी के हर फैसले में हिम्मत और बेबाकी झलकती थी। वह भीड़ में जनता के बीच यूं ही चली जाया करती थीं। वह जब तक रहीं उन्होंने यह परवाह नहीं की कि उनके किसी कदम से उनकी जान को खतरा हो सकता है।

मालवीय कहते हैं कि वर्ष 1959-60 में इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनी थीं। उस दौरान वह एक बार आम सभा के लिए इलाहाबाद आईं। कई लोग उनसे मिलने के इच्छुक थे। उन्होंने इसका ध्यान रखा और आम सभा के बाद अचानक लोगों के बीच चली गईं। उन्हें इसकी कभी हिचक नहीं रही और न ही उन्होंने अपनी जान की कभी परवाह की।

मालवीय ने कहा कि एक और वाकया 1973 का है। इंदिराजी कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन में भाग लेने शहर आई थीं। उनकी सभा के दौरान विपक्षी नेताओं ने जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन किया और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। लेकिन उस जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन से इंदिराजी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। अपने संबोधन में विरोधियों को शांत करते हुए उन्होंने सबसे पहले कहा कि मैं जानती हूं कि आप यहां इसलिए हैं क्योंकि जनता को कुछ तकलीफें हैं। लेकिन हमारी सरकार इस दिशा में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि इंदिराजी खामियाजे की परवाह किए बगैर फैसले करती थीं। आपातकाल लगाने का काफी विरोध हुआ और उन्हें नुकसान उठाना पड़ा लेकिन चुनाव में वह फिर चुनकर आई। वह ही ऐसा कर सकती थीं।

प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुत्री इंदिरा का जन्म इलाहाबाद में 19 नवंबर 1917 को हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने अपनी वानर सेना बनाई और सेनानियों के साथ काम किया। जब वह लंदन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं तो वहां आजादी समर्थक इंडिया लीग की सदस्य बनीं।

भारत लौटने पर उनका विवाह फिरोज गांधी से हुआ। वर्ष 1959 में ही उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। नेहरू के निधन के बाद जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो इंदिरा ने उनके अनुरोध पर चुनाव लड़ा और सूचना तथा प्रसारण मंत्री बनीं। वह वर्ष 1966-77 और 1980-84 के बीच प्रधानमंत्री रहीं। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद वह सिख अलगाववादियों के निशाने पर थीं। 31 अक्टूबर 1984 को उनके दो अंगरक्षकों ने ही उनकी हत्या कर दी।

सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को शत शत नमन !


7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर आलेख है इस महान राज नायिका को शत शत नमन काश्! कि आज उन जैसा कोई नेता होता। धन्यवाद आपका

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  2. बिलकुल, इन आज के बिना रीढ़ की हड्डी वाले नेतावो से तो लाख बेहतर थी !

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  3. इंदिरा गांधी का व्‍यक्तित्‍व बिल्‍कुल अलग था .. काश आज के नेता इनसे सीख लेते !!

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  4. इंदिरा गांधी एक साहसी महिला थीं । उन्‍होंने कई निर्णायक फैसले किए देश में, जिनका आपने ऊपर जिक्र किया है ।
    जनता पार्टी सरकार की विफलता और इंदिरा का फिर से भारी बहुमत से चुनकर आना उनकी लोकप्रियता साबित करता है । यह इंदिरा का विलक्षण व्‍यक्तित्‍व ही था कि सिंडिकेट के जाल को तहसनहस करके खुद स्‍थापित हो सकीं ।

    इंदिरा के फैसले इस पार या उस पार की तर्ज पर होते थे । आज तो रीढविहीनता की स्थिति है ।

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  5. बहुत सुंदर लेख, मनमोहन को दिखाई जाये की वो ओरत हो कर भी केसे राज करती थी, केसे बोलती थी? ओर तुम ही ही ही.....

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