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Tuesday, December 27, 2011

जन-गण-मन के 100 साल


यह धुन सुनते ही हम सभी रोमाचित हो जाते हैं और शरीर खुद-ब-खुद सावधान की मुद्रा में आ जाता है। दोस्तों, हम बात कर रहे हैं देश के राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' की।  आज यानी 27 दिसबर को इस रचना के सौ साल पूरे हो रहे हैं। इस मौके पर आइए जानें इसके बारे में कुछ दिलचस्प बातें..
दोस्तों, क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि स्कूल में आपके दिन की शुरुआत किस खास तरीके से होती है? वह तरीका, जो हर दिन आप सभी के भीतर राष्ट्रप्रेम और देश के लिए कुछ करने का जज्बा जगाता है। हम बात कर रहे हैं अपने देश के राष्ट्रगान जन-गण-मन की, जिससे स्कूल में आपके सुबह की शुरुआत होती है। देश के सभी स्कूलों में प्रार्थना और राष्ट्रगान के बाद ही कक्षाएं आरंभ होती हैं। राष्ट्रीय और प्रमुख सरकारी समारोहों की शुरुआत भी राष्ट्रगान से ही होती है।

क्या है राष्ट्रगान

देश के प्रति सम्मान व राष्ट्रप्रेम की भावना जताने के लिए जनता में लोकप्रिय खास गीत को ही शासकीय तौर पर राष्ट्रगान का दर्जा दिया जाता है। अन्य गीतों की तुलना में राष्ट्रगान की भावना अलग होती है। इसमें मुख्य भाव राष्ट्रभक्ति की भावना है।

राष्ट्रगान रचे जाने की कहानी

वैसे तो 1911 में ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पचम के भारत आने पर उनके स्वागत के लिए रवींद्रनाथ टैगोर से यह गीत लिखवाया गया था [टैगोर ने यह बात खुद अपने एक मित्र पुलिन बिहारी सेन को पत्र लिखकर बताई थी], लेकिन एक सच्चे देशभक्त होने के कारण टैगोर ने इसमें अपने देश के महत्व का वर्णन किया। यह गीत कुछ ही साल में आजादी के लिए लड़ रहे स्वतत्रता सेनानियों में जोश भरने लगा। इस गीत की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए ही इसे 27 दिसबर, 1911 को भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाया गया। इसके बाद आजादी के आदोलन से जुड़े हर आयोजन में इसकी गूंज सुनाई देनी लगी। रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा मूल रूप से बगला में रचित और सगीतबद्ध जन-गण-मन के हिंदी सस्करण को सविधान सभा ने भारत के राष्ट्रगान के रूप में 24 जनवरी, 1950 को अपना लिया। इस तरह देखा जाए तो 'जन-गण-मन' चार दिन बाद यानी 27 दिसबर को अपनी रचना के सौ साल पूरे कर रहा है। अगले ही महीने यानी 24 जनवरी, 2012 को इसे राष्ट्रगान के रूप में भी 61 वर्ष हो जाएंगे।

गायन का सही तरीका

राष्ट्रगान के रूप में 'जन-गण-मन' के गायन की अवधि लगभग 52 सेकेंड है। कुछ अवसरों पर इसे सक्षिप्त रूप में भी गाया जाता है। इसके तहत इसकी प्रथम तथा अंतिम पक्तिया ही बोलते हैं, जिसमें करीब 20 सेकेंड का समय लगता है।

जरूरी नियम

राष्ट्रगान की गरिमा को बनाये रखने के लिए इसे गाये या बजाये जाने पर श्रोताओं को सावधान की मुद्रा में खड़े रहना चाहिए। हालाकि किसी मूवी या डाक्यूमेंट्री के हिस्से के रूप में बजाने पर श्रोताओं से अपेक्षित नहीं होता कि वे खड़े हो जाएं।

कब गायें-बजायें

राष्ट्रगान के सही सस्करण के बारे में समय-समय पर सरकार द्वारा अनुदेश जारी किए जाते हैं। इसके पूर्ण सस्करण को विभिन्न अवसरों पर सामूहिक गान के रूप में गाया-बजाया जाता है। राष्ट्रीय ध्वज फहराने, सास्कृतिक कार्यक्रमों, परेड, सरकारी कार्यक्रम में राष्ट्रपति के आगमन और वहा से उनके जाने के समय, ऑल इंडिया रेडियो पर राष्ट्र के नाम राष्ट्रपति के सबोधन, राज्यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर के औपचारिक राज्य कार्यक्रमों में आने-जाने, राष्ट्रीय ध्वज को परेड में लाए जाने आदि के समय इसे गाया-बजाया जाता है। विद्यालयों में सामूहिक रूप से गाकर शुरुआत की जा सकती है।

विदेशों में राष्ट्रगान

सबसे पुराना राष्ट्रगान ग्रेट ब्रिटेन के 'गॉड सेव द क्वीन' को माना जाता है। इसे वर्ष 1825 में राष्ट्रगान के रूप में वर्णित किया गया। हालाकि यह 18वीं सदी के मध्य से ही देशप्रेम के गीत के रूप में लोकप्रिय था और राजसी समारोहों के दौरान गाया जाता था। 19वीं तथा 20वीं सदी के आरंभ में अधिकाश यूरोपीय देशों ने ब्रिटेन का अनुसरण किया।

राष्ट्रगान के रचयिता

गुरुदेव के नाम से लोकप्रिय और पहले नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म देवेंद्रनाथ टैगोर और शारदा देवी की सतान के रूप में 7 मई, 1861 को हुआ था। बैरिस्टर बनाने के लिए उनके पिता ने 1878 में उनका नाम इंग्लैंड के ब्रिजटोन में कराया। उन्होंने लदन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन भी किया, लेकिन 1880 में डिग्री हासिल किए बिना स्वदेश वापस आ गए। 1883 में मृणालिनी देवी से उनका विवाह हुआ। बचपन से ही कविता, छंद और भाषा पर अद्भुत पकड़ रखने वाले टैगोर ने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी। उन्होंने कविता, गीत, कथा, उपन्यास, नाटक, प्रबध, शिल्पकला-सभी विधाओं में रचना की। इनमें प्रमुख हैं गीताजलि, गीति माल्य, शिशु, खेया, मानसी, सोनार तारी, राजा, डाकघर, गोरा, घरे बहिरे, योगायोग आदि। बचपन से ही प्रकृति को पसद करने वाले टैगोर 1901 में सियालदह छोड़कर शातिनिकेतन आ गए और वहा लाइब्रेरी और विश्वभारती शिक्षा केंद्र बनाया, जो आज एक जाना-माना विश्वविद्यालय है। 1913 में 'गीताजलि' के लिए उन्हें साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय थे। टैगोर ने दो हजार से ज्यादा गीतों की रचना की और उन्हें सगीत भी दिया। उनके नाम पर ही इसका नाम 'रवींद्र सगीत' पड़ गया। जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने चित्र भी बनाने आरंभ कर दिए। टैगोर महात्मा गांधी का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने गाधी जी को महात्मा का विशेषण दिया तो गाधी ने उन्हें गुरुदेव कहकर बुलाया।
* रवींद्रनाथ टैगोर दुनिया के अकेले ऐसे व्यक्ति हैं, जिनकी रचना को एक से अधिक देशों में राष्ट्रगान का दर्जा प्राप्त है। उनकी एक दूसरी कविता 'आमार सोनार बाग्ला' को आज भी बाग्लादेश में राष्ट्रगान का दर्जा मिला हुआ है।
* रवींद्रनाथ टैगोर नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय भी हैं। कविताओं के सग्रह 'गीताजलि' के लिए उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
* 12 दिसबर, 1911 को जॉर्ज पचम ने कोलकाता की बजाय दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने की घोषणा की थी। टैगोर ने इस अवसर के लिए उसी साल 'भारत भाग्य विधाता' गीत की रचना की थी।
* ब्रिटिश सरकार ने रवींद्रनाथ टैगोर को 'सर' की उपाधि दी थी, जिसे 1919 में जलियावाला बाग काड से दुखी होकर उन्होंने लौटा दिया।
* 1911 में जॉर्ज पचम के राज्याभिषेक के अवसर पर कई हिन्दी लेखकों ने भी रचनाएं लिखी थीं। इनमें बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' का 'सौभाग्य समागम', अयोध्या सिह उपाध्याय 'हरिऔध' का 'शुभ स्वागत', श्रीधर पाठक का 'श्री जॉर्ज वदना', नाथूराम शर्मा 'शकर' का 'महेंद्र मगलाष्टक' प्रमुख हैं।
[आलेख : -अरुण श्रीवास्तव]

4 comments:

अजय कुमार झा at: December 27, 2011 12:00 PM said...

आज ये बहुत ही जरूरी हो जाता है कि देश की अगली पीढी को राष्ट्रगान से परिचित कराया जाए न सिर्फ़ परिचय बल्कि उसका महत्व भी याद दिलाया जाए । ये भावना स्वत: जाग्रत हो तो राष्ट्र हित में होगा

डॉ टी एस दराल at: December 27, 2011 2:15 PM said...

बहुत अच्छी जानकारी । आज राष्ट्रगान के सौ साल पूरे हो गए हैं , यह जानकर अच्छा लगा ।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने at: December 27, 2011 10:33 PM said...

अनमोल जानकारी!! आज जहां इस पीढ़ी को राष्ट्र-गान और राष्ट्र-गीत का अंतर नहीं मालूम वहाँ आपने बहुत ही कीमती जानकारी दी है!!

दिगम्बर नासवा at: December 29, 2011 4:17 PM said...

जन गन मन और इसकी जानकारी बहुत अच्छी लगी ... आज की पीड़ी को इसका महत्व और जानकारी जरूर समझनी चाहिए ...

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