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रविवार, 13 मई 2012

|| माँ ||

|| माँ ||

बेसन की सौधी रोटी पर
खट्टी चटनी - जैसी माँ
याद आती है चौका - बासन
चिमटा , फुकनी - जैसी माँ ||

बान की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोयी आधी जागी
थकी दोपहरी - जैसी माँ ||

चिडियों की चहकार में गूँजे
राधा - मोहन , अली - अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुण्डी - जैसी माँ ||

बीवी , बेटी , बहन , पडोसन
थोडी - थोडी सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी - जैसी माँ ||

बाँट के अपना चहेरा , माथा
आँखे जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक एल्बम में
चंचल लड़की - जैसी माँ ||


----- निदा फाजली .



मेरी माँ और हर माँ को समर्पित |



|| वन्दे मातरम ||

शुक्रवार, 11 मई 2012

सआदत हसन मंटो को उनके १०० वे जन्मदिन पर हमारा सलाम

नेट पर खबरे पड़ते हुए जब इस खबर पर नज़र पड़ी तो बड़ा अफसोस हुआ !

कालजयी कहानीकार सआदत हसन मंटो ने लुधियाना के समराला के छोटे से गांव पपड़ौदी का नाम देश-विदेश में रोशन किया। 11 मई, 1912 को जन्में मंटो की आज जन्म शताब्दी है, पर विडंबना यह है कि उनको उनके गांव ने ही भुला दिया है। गांव में उनकी स्मारक के नाम पर सिर्फ एक मंटो यादगारी लाइब्रेरी है।
कुछ बुजुर्गो को छोड़कर गांव का कोई भी व्यक्ति मंटो के बारे में नहीं जानता। सरकार ने भी आज तक इस प्रसिद्ध कहानीकार की यादगारी के लिए कोई कदम नहीं उठाया। यही नहीं, जिस मकान में मंटो का जन्म हुआ, वह वर्ष 1962 में ही नीलाम हो चुका है। अब वहां गांव के पूर्व सरपंच राम सिंह का आशियाना है। राम सिंह बताते हैं कि उनके दादा ने सरकार से यह मकान खरीदा था। गांव में एक भी ऐसी जगह नहीं, जहां पर मंटो का नाम तक लिखा हो। मंटो का जन्म मियां गुलाम हसन के घर हुआ था। विभाजन के बाद मंटो अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए थे। पंजाबी साहित्य सभा [नई दिल्ली] की ओर से गांव के गुरुद्वारा साहिब में मंटों की यादों को सहेजने के लिए बेशक लाइब्रेरी तो बना दी गई है, लेकिन गुरुद्वारा साहिब के ग्रंथी के कमरे की एक शेल्फ पर चलने वाली इस लाइब्रेरी में मंटो की मात्र दो किताबें ही हैं।

 इस उम्मीद के साथ कि देर से ही सही पर अब सरकार अपनी नींद से जागेगी और इस कालजयी कहानीकार की यादों को सहेजने मे कुछ रुचि लेगी ...

सआदत हसन मंटो को उनके १०० वे जन्मदिन पर हमारा सलाम !

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