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रविवार, 20 सितंबर 2009

शेयर बाजार में जारी रहेगा उतार चढ़ाव


इस सप्ताह शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव दर्ज किया जा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि डेरिवेटिव्ज खंड में सौदों के निपटान से पहले बाजार उतार-चढ़ाव से भरा रहेगा।
बीते सप्ताह के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही 16 महीने के उच्चतम स्तर को छू गए और इस अवधि में सेंसेक्स और निफ्टी में करीब तीन-तीन फीसदी तक की तेजी देखने को मिली।
बंबई स्टाक एक्सचेंज का सेंसेक्स 16,820.02 अंक और 16,229.95 अंक के दायरे में घूमने के बाद सप्ताहांत में 477 अंक अथवा 2.93 फीसदी की तेजी के साथ 16,741.30 अंक पर बंद हुआ।
इसी तरह, नेशनल स्टाक एक्सचेंज का निफ्टी 5,003.05 अंक की ऊंचाई को छूने के बाद सप्ताहांत में 146.50 अंक अथवा 3.03 फीसदी की तेजी के साथ 4,976.05 अंक पर बंद हुआ।
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस सप्ताह बाजार की धारणा मजबूत रहने की संभावना है, भले ही निवेशक घरेलू डेरिवेटिव्ज खंड में सौदे निपटाने से पूर्व सतर्कता का रुख अपनाएं। इस सप्ताह अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक भी प्रस्तावित है।
आशिका स्टाक ब्रोकर्स रिसर्च के प्रमुख पारस भोथरा ने कहा कि फ्यूचर एंड आप्शन खंड में सौदों का निपटान होने से बाजार कंसोलिडेशन के चरण में होगा, लेकिन तेजी बरकरार रहने की उम्मीद है।
भोथरा ने कहा कि विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार को लेकर काफी उत्साहित हैं और वे घरेलू शेयर बाजारों में निवेश करना जारी रखेंगे। उल्लेखनीय है कि बीते सप्ताह के दौरान एफआईआई ने घरेलू शेयर बाजारों में 5,300 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया।
उधर, एसएमसी ग्लोबल के उपाध्यक्ष राजेश जैन का कहना है कि 22-23 सितंबर को प्रस्तावित अमेरिकी फेडरल की बैठक में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति और वित्तीय नीतियों पर चर्चा की जाएगी। भारतीय बाजारों की इस बैठक पर पैनी नजर होगी।

चीन - तू दोस्त है या रकीब है ??



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस कथन पर यकीन करने के अच्छे-भले आधार हैं कि चीन की ओर से भारतीय सीमा के अतिक्रमण की कथित घटनाओं पर चिंतित होने की जरूरत नहीं। यह अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री के बाद सेना प्रमुख दीपक कपूर ने भी यह विश्वास दिला दिया कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष ऐसी घटनाओं में कतई इजाफा नहीं हुआ है, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होता कि जब मीडिया का एक हिस्सा अतिक्रमण की घटनाओं को तूल दे रहा था तभी सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट कर दी जाती? भारतीय नेतृत्व को इससे अवगत होना ही चाहिए कि आम जनता चीन के इरादों को लेकर सदैव सशंकित बनी रहती है। इन शंकाओं का निवारण इस तरह की सूचनाओं मात्र से नहीं हो सकता कि भारतीय वायुसेना ने वास्तविक नियंत्रण रेखा से महज 23 किमी अंदर एन-32 विमान उतार दिया। नि:संदेह इस उपलब्धि का अपना एक महत्व है और भारत को अपनी रक्षा तैयारियों के प्रति तत्पर रहना ही चाहिए, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि भारत अपने को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त करे। चीन के संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आर्थिक विकास के मामले में भारत उससे पिछड़ता चला जा रहा है। अब विश्व समुदाय को इसमें कोई संदेह नहीं रह गया कि चीन महाशक्ति के रूप में उभरने ही वाला है। इसके विपरीत भारत अभी महाशक्ति बनने का दावा ही करने में लगा है। वर्तमान में कोई भी यह कहने की स्थिति में नहीं कि भारत वास्तव में महाशक्ति का दर्जा कब तक हासिल कर सकेगा? महाशक्ति और विकसित राष्ट्र बनने के सपने देखना अलग बात है और उन्हें हकीकत में बदलना अलग।
यह सही है कि जब चीन के संदर्भ में हमारी तुलना होती है तो हम खास तौर पर यह उल्लेख कर गर्व का अनुभव करते हैं और करना भी चाहिए कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और वह भी विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश, लेकिन क्या यह एक तथ्य नहीं कि एक गैर-लोकतांत्रिक देश होते हुए भी विश्व मंचों पर चीन की अहमियत कहीं अधिक है? यह कहना समस्या का सरलीकरण करना और अपनी कमजोरियों को छिपाना ही है कि चीन ने इतनी ताकत इसलिए हासिल कर ली, क्योंकि वह एक कम्युनिस्ट देश है। भारत की असली चिंता का कारण अपनी खामियों को दूर न कर पाना होना चाहिए। हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में इतनी अधिक खामियां घर कर गई हैं कि छोटी-छोटी चीजें भी सुधरने का नाम नहीं लेतीं। प्रत्येक स्तर पर व्यवस्था इतनी लचर और पंगु हो गई है कि समस्या के समाधान के उपाय होते हुए भी उनका हल नहीं हो पाता। परिणाम यह है कि देश अपेक्षित प्रगति नहीं कर पा रहा है। वास्तविकता यह है कि अनेक क्षेत्रों में तो वह चीन के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता। दुनिया इसे देख और समझ रही है, लेकिन पता नहीं क्यों हमारे नीति-नियंता जानकर भी अनजान बने हुए हैं? मौजूदा परिस्थितियों में चीन से भिड़ंत के कहीं कोई आसार नहीं हैं। हां यदि वह हमसे और आगे निकल गया तो हमारी परेशानियां बढ़नी तय हैं।

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