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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

लाल खून का काला धंधा


जरूरतमंद मरीजों को ऊंची कीमत पर अवैध रूप से खून उपलब्ध कराने वाले छह लोगों की दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तारी पर हैरानी नहीं होनी चाहिए। हैरानी तो इस पर होनी चाहिए कि पहले भी ऐसे मामलों के सामने आने के बावजूद शासन-प्रशासन और अस्पतालों द्वारा इन्हें रोकने के लिए कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? राजधानी के प्रतिष्ठित एम्स और सफदरजंग अस्पतालों में इस तरह का काला कारोबार फलना-फूलना बेहद चिंताजनक है। हालांकि सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक ने ऐसी गतिविधियों में अस्पताल के किसी कर्मी की संलिप्तता से इनकार किया है, लेकिन ऐसा कोई भी बयान देने से पहले इसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वाले कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई से परहेज नहीं करना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह मामला आखिरकार सीधे तौर पर लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ है। इस पर विश्वास करना कठिन है कि पिछले करीब दस वर्षो से गरीबों और नशेड़ियों से महज चंद रुपयों में खून लेकर उसे महंगी कीमत पर जरूरतमंदों को बेचा जाता था और संबंधित विभागों तथा पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लग पाई थी।

इस संदर्भ में ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब अस्पताल प्रशासन के साथ-साथ शासन-प्रशासन से अपेक्षित हैं। इसमें सबसे बड़ा सवाल गंभीर रूप से बीमार मरीजों को भी इलाज की सुविधा उपलब्ध कराने से पहले अस्पताल द्वारा खून का इंतजाम करने के लिए बाध्य करना है। जाहिर है कि समय पर खून का बंदोबस्त न कर पाने की स्थिति में तीमारदारों को मजबूरन दलालों की शरण लेनी पड़ती है। ऐसे में इस धंधे में अस्पतालकर्मियों की मिलीभगत से भला कैसे इनकार किया जा सकता है? इस आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कहीं खून के काले धंधे को फलने-फूलने देने के लिए ही तो अस्पतालों के ब्लड बैंकों में रक्त की कमी नहीं दर्शाई जाती? संक्रमित होने की स्थिति में अवैध रूप से हासिल खून जानलेवा भी साबित हो सकता है। यह महज एक या दो अस्पतालों से जुड़ा मामला नहीं माना जा सकता। यह तो जांच से ही पता चल पाएगा कि मुनाफे के कारोबार को देखते हुए इसके तार कितने अस्पतालों से और किस स्तर पर जुड़े हैं, लेकिन क्या संबंधित विभाग ऐसे किसी जांच के लिए आगे आएंगे?

गरीबों के इलाज का दिखावा

गरीब मरीजों के इलाज की उचित व्यवस्था न करने पर उच्च न्यायालय द्वारा राजधानी के अपोलो अस्पताल से जवाब तलब करने पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। सरकार द्वारा राजधानी के तमाम निजी अस्पतालों को इसी शर्त पर सस्ती जमीन और आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाती है कि वे एक निश्चित संख्या में गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज की सुविधा प्रदान करेंगे, लेकिन कोई भी अस्पताल इस कसौटी पर खरा उतरता नहीं दिख रहा। विडंबना यह है कि इस बारे में की जाने वाली शिकायतों पर सरकार द्वारा भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती। ऐसे में निजी अस्पताल गरीबों के इलाज के नाम पर महज रस्म अदायगी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। ऐसे में उच्च न्यायालय द्वारा अपोलो को कटघरे में खड़ा कर उससे यह स्पष्टीकरण मांगना पूर्णतया उचित है कि वहां गरीब मरीजों के इलाज के लिए किस तरह की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है?

इस संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जब मुफ्त जमीन देते समय ही निजी अस्पतालों के लिए गरीबों का इलाज करना अनिवार्य बना दिया गया है तब वे इस बारे में ना-नुकर क्यों करते हैं? यह सही है कि ऐसे अस्पतालों में इलाज कराना महंगा है, लेकिन शर्त से बंधे होने के बावजूद गरीबों का इलाज न करने पर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? ऐसा न करने पर उच्च न्यायालय ने 2007 में ही ऐसे अस्पतालों को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इसके लिए बनी कमेटी ने कभी ऐसे अस्पतालों की जांच की? अगर नहीं तो इसका मतलब तो यही है कि इसके लिए सरकार और संबंधित विभाग सीधे दोषी हैं। अदालती निर्देश पर कमेटी द्वारा अपोलो अस्पताल के दौरे में जो अनियमितताएं सामने आई वे चौंकाने वाली हैं। इससे तो यही लगता है कि वहां गरीबों के इलाज, बिस्तरों, ओपीडी और दवाइयों के नाम पर रस्म अदायगी ही की जाती रही है। फिर उन्हें सस्ती भूमि और अन्य सुविधाएं देने का क्या मतलब? गरीबों के नाम पर सुविधाएं हड़पने, पर उनके इलाज के लिए नाक भौं सिकोड़ने वाले तथाकथित महंगे अस्पतालों के खिलाफ जब तक कड़ी कार्रवाई नहीं की जाएगी तब तक वे हीलाहवाली से बाज नहीं आएंगे।

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