जीवन में कभी कभी कुछ दिन ऐसे आ जाते है जब आप यह तय नहीं कर पाते कि खुश हो या दुखी ... ऐसा ही एक दिन मेरे जीवन में आज से ठीक ५ साल पहले आया था |
७ फरवरी २००६ के दिन यूँ तो तय था कि मेरे विवाह का योग है ... और आखिर तक हुआ भी यही ... पर इस बीच कुछ ऐसा घटा जिस ने ज़िन्दगी बदल दी ना सिर्फ़ मेरी पर मेरे बड़े भाई विक्रम की भी ... !!
विक्रम मेरी बुआ जी के लड़के है और दिल्ली में रहते है अपने परिवार के साथ | उस दिन सुबह से ही घर में भागम भाग थी ... सालो बाद घर में शादी थी ... और वह भी घर में इकलौते लड़के की ... हर तरफ रोनक और चहल पहल ... बीच बीच में ढोलक की थाप और महिलायों के मंगल गीत गाने की आवाजे ... पर मैं मन ही मन डरा हुआ था ... सरिता बुआ काफी दिनों से बीमार थी ... विक्रम भईया से रोज़ हाल चाल तो ले रहा था ... पर कभी भी ऐसा कुछ नहीं बताया उन्होंने जिस से यह लगे कि सब ठीक है ... सो एक अनजाना सा डर घेरे हुए था ... साथ साथ घर के माहौल में भी घुला हुआ था ! पापा , अम्मा और मैं तीनो यही दुआ कर रहे थे कि बस आज का दिन भी आराम से गुज़र जाए ... कुछ ही घंटे ही तो बाकी थे ... पर होनी को कुछ और ही मंजूर था ... दोपहर के १ से १:३० के बीच का ही समय था ... ठीक से याद नहीं है अब ... मेरे मोबाइल पर एक कॉल आई ... देखा तो विक्रम भईया का नाम आ रहा था नंबर के साथ ... मेरी धड़कन वहीँ रुक गई ... जिस बात का डर था ... वह घटना घट चुकी थी ... मेरी बुआ ... मेरी शुन्नो बुआ ... जा चुकी थी ...
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| मेरी प्यारी बुआ - सरिता |
एक लम्बी लड़ाई का ऐसा अंत ... पर मुझे सच कहूँ तो ... कुछ देर बाद ... एक अजीब सा सुकून महसूस हो रहा था ... मेरी प्यारी बुआ अब चैन से सो रही थी ... हाँ जानता था ... फिर कभी ना उठने के लिए ... पर फिर भी मुझे राहत थी ... बुआ मेरी अब दर्द से आजाद थी ... फोन पर जब उनकी आवाज़ में उनका दर्द शामिल हो जाया करता था ... मैं बता नहीं सकता कलेजा हिल जाता था | बहुत खुश थी वो कि मेरी शादी हो रही है ... अक्सर ही मुझे गिनवा दिया करती थी ... देख तेरी शादी में मुझे मिलने वाली साड़ियाँ संभल कर रख लेना ... पता नहीं मैं आ सकूँ या नहीं ... शायद उनको पता था ... वो नहीं आ पाएंगी ! अम्मा से भी कहा था ... लड़की वालों से कह देना ... मेरी एक ही नन्द है ... उसकी साडी सब से अच्छी होनी चाहिए !
साडी आई भी सब से अच्छी उनके लिए ... पर पहनने वाली नहीं थी ...
विक्रम भईया और मेरे बीच सिर्फ़ ११ महीने और १२ दिन का अंतर है ... जब हम दोनों छोटे थे ... तो अक्सर ही बुआ के पास सोने को ले कर लड़ा करते थे ... दोनों एकलौते ... और दोनों ही बुआ के लाडले ... बस एक फर्क था ... मैं थोडा बदमाश था सो आसानी से रोता नहीं था ... पर भईया मेरा सीधा साधा और अक्सर ही मेरी बदमाशीयों का मुख्य शिकार ... इस लिए बुआ को भईया को चुप करने के लिए उनका ही साथ देना पड़ता था |
मेरे जिस भाई को मैं यह कह कर रुलाया करता था कि तेरी मम्मी तो गई बाज़ार तुझे नहीं ले गई ... आज उसकी मम्मी इतनी दूर जा चुकी है कि उसके साथ साथ मैं भी रो रहा हूँ ! पूरे साल एक दुसरे से अक्सर बात करने वाले हम दोनों पिछले ५ सालों से ... पता नहीं किस डर के चलते ... साल के इस एक दिन एक दुसरे से बात करने से कतराते है !
इस समय कितनी ही बातें याद आ रही है ... क्या क्या लिखूँ ... बस ... बुआ ... जहाँ भी हो अपना आशीर्वाद देना और देख देख खुश होना कि जिस आँगन में कभी तुम खेल करती थी आज तुम्हारा कार्तिक खेल रहा है !
पर बुआ ... क्या करूँ कि तुम बहुत याद आती हो ...

