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मंगलवार, 27 मार्च 2012

"नाज़ - ए - हिन्द सुभाष" पहुंची नेताजी भवन

जयदीप शेखर जी से एक वादा किया था कि जल्द से जल्द उनकी पुस्तक, "नाज़ - ए - हिन्द सुभाष", को कलकता के नेता जी भवन तक पहुंचा दूंगा ... सो 23 मार्च 2012 के दिन वो वादा पूरा हुआ !

वैसे तो अब तक मेरे लिए 23 मार्च का दिन केवल इस लिए विशेष था क्यों कि इसी दिन सन  १९३१ में  शहीद ए आज़म सरदार भगत सिंह जी , सुखदेव जी और राजगुरु जी ने देश के लिए अपना बलिदान दिया था और उनकी शहादत को याद करते हुए ही मैं कलकत्ता के गोल्फ ग्रीन में बने हुए अपने ताईजी के घर से निकला था नेता जी भवन के लिए !

लगभग ३० मिनट की टैक्सी यात्रा के बाद मैं खड़ा था कलकत्ता के एल्गिन रोड पर बने नेता जी भवन के सामने जो कि आजकल Netaji Research Bureau के कार्यालय और संग्रहालय के रूप में भी जाना जाता है ! पता नहीं क्यों पर १९९७ तक २० साल कलकत्ता में रहते हुए भी कभी भी यहाँ आना न हुआ था और आज जब मुझे मैनपुरी में रहते हुए १५ साल होने वाले है तब अपने ७ दिन के कलकत्ता प्रवास के दौरान खड़ा था वहां जहाँ जाने का सपना तो कई बार देखा पर कभी जा न पाया !

कुछ देर तक तो जैसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि मैं सच में यहाँ खड़ा हूँ  ... तरह तरह के विचारो से दिमाग भर गया था ... किसी तरह खुद को संभाला और वहां खड़े सुरक्षा कर्मी से श्री कार्तिक चक्रवर्ती से मिलने की अपनी इच्छा जताई तो पता चला कि एक मीटिंग चल रही है और सब उस में ही व्यस्त है ! यहाँ बता दूं कि श्री चक्रवर्ती प्रोफ़ेसर कृष्णा बोस के सचिव है ! प्रोफ़ेसर कृष्णा बोस नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के भतीजे श्री शिशिर बोस की पत्नी है और फिलहाल नेताजी रिसर्च ब्यूरो की चेअर पर्सन है और ब्यूरो की सभी गतिविधियों को संभालती हैं ! कलकत्ता जाने से पहले जब मैं इस कोशिश में था कि किस तरह किताब को नेताजी भवन तक पहुँचाया जाए उस दौरान प्रोफ़ेसर कृष्णा बोस से एक बार मेरी फोन पर बात हुयी थी और उन्होंने ही मुझे श्री चक्रवर्ती से मिलने को कहा था ।

जब आप कुछ अच्छा करने की सोचते है तो सभी समीकरण अपने आप ही आप की तरफ हो जाते है ... ऐसा मुझे तब लगा जब अचानक कमरे से प्रोफ़ेसर बोस खुद बाहर आती दिखी ... मैं झट बड़ा उन की ओर और उन्हें प्रणाम किया ... उन्होंने मेरा नाम पुछा और वहां होने का कारण भी ... मैं झट उनसे हुयी फोन पर बातचीत का जिक्र किया तो उन्होंने पहचाना और सब से पहले वहां खड़े सुरक्षा कर्मी को निर्देश दिए कि मुझे ऊपर की मंजिल पर बने संग्रहालय को जरुर दिखाया जाए मैंने उनसे थोड़े समय की मांग की तो मीटिंग का हवाला देते हुए उन्होंने खेद प्रगट किया और कहा कि उनके पास ५ मिनट है मैं चाहूँ तो अपनी बात उनको बता सकता हूँ ... मैंने सब से पहले उनको "नाज़ - ए - हिन्द सुभाष" की एक प्रति दी तो उन्होंने किताब को ले कर थोडा पढ़ा फिर मुझे निर्देश दिया कि मैं इस की २ प्रतियाँ वहां बने पुस्तकालय के लिए श्री चक्रवर्ती को दे दूं ! मैंने उनसे अनुरोध किया कि अगर उनकी आज्ञा हो तो किताब से साथ उनका एक चित्र ले लूं तो उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया साथ साथ उन्होंने कुछ बातें बताई जो एकदम सटीक है ... 

प्रोफ़ेसर बोस का कहना है कि ,
  • "लोग बाग़ नेता जी की मृत्यु में ज्यादा रूचि लेते है न कि देश के लिए किये गए उनके कामो में ... जो बेहद दुखद है !"
  • "ऐसा क्यों है कि देश में 'महात्मा' शब्द पर तो एकाधिकार है ... पर 'नेताजी' हर ऐरा गैरा बन जाता है !?"
  • "क्यों युवा वर्ग आगे नहीं आता और पहल करता कि नेताजी के बारे में भी उनको पूरी जानकारी दी जाए !"   
  • "अपने इतिहास के प्रति उदासीनता घातक है!"
  मैं चुपचाप उनको बोलता देख रहा था और महसूस कर रहा था उस दर्द को जो नेताजी के प्रति सरकारों की अनदेखी से उपजा है ! अचानक उनका फोन बजा और जैसे वो और मैं दोनों एक नींद से जागे ... उन्होंने किताब मुझे लौटाई और वापस जाने को मुड़ी कि मैंने एक बार फिर उनको प्रणाम किया इस बार उनके मुख से निकला ... "बेचे थाको बाबा" और उनका हाथ मेरे सर पर था ... और गदगद हो गया मैं उनका आशीष पा कर !
 
 उनके जाते ही मेरा फोन बजा देखा घर में बड़े भाई साहब का फोन था ... बात कि तो पता चला जयदीप भाई द्वारा भेजी पुस्तकें आ गयी है ! एक बार फिर मन ही मन ऊपर वाले का शुक्र अदा किया ... मेरे पास सिर्फ एक  ही प्रति थी "नाज़ - ए -हिंद सुभाष" की और प्रोफ़ेसर बोस ने पुस्तकालय के लिए कम से कम २ प्रतियाँ मांगी थी ... पर अब जब जयदीप भाई का भेजा पकेट आ गया था तो चिंता की कोई बात ही नहीं थी ! मैंने पता किया मीटिंग कितनी देर चलने वाली है पता चला लगभग घंटे भर में ख़त्म होगी ... मेरे लिए काफी था घंटा भर ... दोबारा टैक्सी ली और घर आया पकेट लेने ... रस्ते में जयदीप भाई को फोन किया और पूरी बात बताई !
 
जब तक मैं लौटा मीटिंग ख़त्म हो चुकी थी पर कुछ लोग अभी भी ऑफिस में थे इस लिए श्री चक्रवर्ती अभी भी व्यस्त थे ... मुझे कहा गया आप तब तक ऊपर की मंजिल पर बने संग्रहालय को देख आइये ... मुझे आईडिया बढ़िया लगा ... और मैं चल पड़ा ऊपर की मंजिल की ओर ... 

लकड़ी के बने जीने को जैसे जैसे मैं चढ़ता जा रहा था एक अजीब से रोमांच भर रहा था सारे शरीर में ... हर तरफ नेताजी और उनसे जुडी यादो का जखीरा ... बिना खुद देखे महसूस करना या शब्दों में उसको यहाँ बता पाना संभव नहीं है ! कुछ चित्र लिए मैंने वहां ... कुछ ऐसी जगह पर भी जहाँ चित्र लेना मना था ... मुझे टोका भी गया मेरी गलती पर ... पर क्या करता मन को कैसे समझाता ... पर समझाना पड़ा ! जो चित्र मैं ले पाया वो फेसबुक पर अपलोड किये है लिंक नीचे दे रहा हूँ आप भी देखें !
 
संग्रहालय में नेता जी से जुडी हुयी विभिन्न वस्तुओ और दस्तावेजो को देख कर नेताजी के प्रति मेरी आस्था और श्रद्धा और बढ़ गई ... जो संभव हो तो आप भी एक बार जरुर कलकत्ता जाएँ और नेताजी से मिल कर आयें ... उनके अपने ही घर में !
 
संग्रहालय को देखने के बाद मैंने एक बार फिर श्री चक्रवर्ती से मिलने की इच्छा जताई तो मुझे वहां बने पुस्तकालय में ले जाया गया । श्री चक्रवर्ती पुस्तकालय के अन्य पदाधिकारियों के साथ वहां मौजूद थे ... मेरा परिचय उनसे करवाया गया और मैंने अपने वहां आने का कारण और प्रोफ़ेसर बोस से हुयी बातचीत और मुलाकात के बारे में उनको बताया और "नाज़ - ए - हिन्द सुभाष" २ प्रतियाँ उनको दी ! उन लोगो ने मेरे सामने ही किताब को थोडा पढ़ा और किताब को पुस्तकालय में शामिल करने की बात कही ।
मैंने उनका जयदीप भाई , अरुण जी और अपनी ओर से आभार प्रगट किया और उन से विदा ली ! लौटते हुए जयदीप भाई को दिए अपने वादे के पूरे होने की ख़ुशी के साथ साथ इस बात की भी बेहद ख़ुशी थी कि जिस जगह को देखने के बारे में बचपन से सोच रखा था आज वो सपना भी पूरा हुआ !

16 टिप्‍पणियां:

  1. ओछी राजनीति के चलते आज नेता जी को भुला दिया है देश ने .... ये दुर्भाग्य है .... आपके इस प्रयास की सराहना है ... बधाई है ...

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  2. badhai.. desh ke krantikari neta ko dil se naman aur aapko badhai..!

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  3. सच है .अच्छे काम करने की सच्ची नीयत हो तो माध्यम स्वं ही सुलभ होते जाते हैं.
    बहुत खूब लिखा है.
    बधाई.

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  4. बहुत अच्छे से लिखा है और दिखलाया भि है ...शुक्रिया!!

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  5. asthapoorn prayas.Bahut achchha laga padhkar ...man gad-gad ho gaya ...!!
    shubhkamnayen ...!!

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  6. हमको पता है कि आप जिस काम को हाथ में लेते हैं उसको मुकाम तक पहुंचा कर ही दम लेते हैं..! आपके जज्बे को सलाम!!

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  7. आपके लिये निस्संदेह एक सपना पूरा होने जैसा रहा होगा, कोलकाता जाना हुआ तो जरूर इस तीर्थ स्थान पर जायेंगे।
    जयदीप शेखर जी की यह पुस्तक जरूर पढ़नी है।

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  8. बहुत अच्छा कार्य किया है आपने, नेताजी को उनके देश भर में अथाह ऊर्जा का संचार करने के लिये याद करना चाहिये।

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  9. शिवम् भाई, प्रकाशक के तौर पर सार्थक पहल से अभिभूत हूं. अच्छे मित्र मिले तो मंजिल आसान हो जाती है.वरना कुछ ऐसे लोग भी मिल जाते हैं जो आपको पीछे ले जाते हैं...
    इस पुस्तक पर एक चर्चा सहारा अखबार में आएगी जल्दी ही... झारखण्ड में नक्सली इलाके में एक पुस्तक मेले में यह पुस्तक मौजूद थी... अधिवासी इलाके में इस पुस्तक के प्रति जिज्ञासा देख अच्छा लगा.... आपसे सीख लेते हुए एक पुस्तकालय को हमने वहां यह पुस्तक अनुदान स्वरुप भी दी..... हम और जयदीप भाई दोनों आभारी हैं आपके...

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  10. आपने बहुत अच्छा काम किया। पुस्तक तो नहीं पढ़ी है, पर इसकी पांडुलिपी देखने का मौका मिला था। बेहद अच्छी पुस्तक है।

    आपकी लेखन शैली लाजवाब है। ऐसा लगा जैसे आपके साथ नेताजी भवन में हर पल हूं मैं।
    बधाई!

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  11. oh wow...awesome...
    iski tasveeren maine dekhi thi facebook par bhi lekin pata nahi kyun dhyan hi nahi gaya...
    jabardast kaam kiya hai aapne...
    jaideep ji ko bahut saara badhai :)

    superb post :)

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  12. बढिया जानकारी भरी पोस्‍ट।
    सच है, नेताजी शब्‍द का इस्‍तेमाल हर कोई करने लगा है, पर यह भी सच है कि नेताजी के आगे जो नाम है, सुभाषचंद्र बोस वह अपने आप में पूर्ण है......
    कलकत्‍ता जाना कई बार हुआ है, पर नेताजी भवन नहीं जा पाया.... अगली बार जब भी कलकत्‍ता गया, वहां जरूर जाउंगा......
    आभार आपका, इससे परिचय कराने के लिए।

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  13. पर 'नेताजी' हर ऐरा गैरा बन जाता है !?"…..

    कितनी वेदना है इस ज्वलंत और चुभते से प्रश्न मे जो अपने पीछे जाने कितने अनुत्तरित प्रश्न और छुपाए हुये है...
    आपके साथ नेताजी भवन की यात्रा अच्छी लगी....

    नाज ए हिन्द सुभाष के प्रकाशन पर सादर बधाई...

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  14. जय हिंद
    मैं श्री अनुज धर की पुस्तक " नेताजी एक रहस्य गाथा "
    पढ़ा हूँ ।
    उसी एकाग्रता से नाज ए हिन्द सुभाष जरूर पढूगाँ

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