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बुधवार, 15 मार्च 2017

अमर शहीद संदीप उन्नीकृष्णन की ४० वीं जयंती

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन (15 मार्च 1977 - 28 नवम्बर 2008)
अशोक चक्र (मरणोपरांत)
 

संदीप उन्नीकृष्णन (15 मार्च 1977 -28 नवम्बर 2008) भारतीय सेना में एक मेजर थे, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स (एनएसजी) के कुलीन विशेष कार्य समूह में काम किया. वे नवम्बर 2008 में मुंबई के हमलों में आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हुए। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें 26 जनवरी 2009 को भारत के सर्वोच्च शांति समय बहादुरी पुरस्कार, अशोक चक्र से सम्मानित किया गया.

"उपर मत आना, मैं उन्हें संभाल लूंगा...", 
 
ये संभवतया उनके द्वारा अपने साथियों को कहे गए अंतिम शब्द थे, ऐसा कहते कहते ही वे ऑपरेशन ब्लैक टोरनेडो के दौरान मुंबई के ताज होटल के अन्दर सशस्त्र आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गए.

बाद में, एनएसजी के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि जब ऑपरेशन के दौरान एक कमांडो घायल हो गया, मेजर उन्नीकृष्णन ने उसे बाहर निकालने की व्यवस्था की और खुद ही आतंकवादियों से निपटना शुरू कर दिया. आतंकवादी भाग कर होटल की किसी और मंजिल पर चले गए और उनका सामना करते करते मेजर उन्नीकृष्णन गंभीर रूप से घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए।

परिवार

संदीप उन्नीकृष्णन बैंगलोर में स्थित एक नायर परिवार से थे, यह परिवार मूल रूप से चेरुवनूर, कोजिकोडे जिला, केरल से आकर बैंगलोर में बस गया था. वे सेवानिवृत्त आईएसआरओ अधिकारी के. उन्नीकृष्णन और धनलक्ष्मी उन्नीकृष्णन के इकलौते पुत्र थे.

बचपन

मेजर उन्नीकृष्णन ने अपने 14 साल फ्रैंक एंथोनी पब्लिक स्कूल, बैंगलोर में बिताये, 1995 में आईएससी विज्ञान विषय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. वे अपने सहपाठियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे, वे सेना में जाना चाहते थे, यहां तक कि क्र्यू कट में भी स्कूल जरूर जाते थे. एक अच्छे एथलीट (खिलाडी) होने के कारण, वे स्कूल की गतिविधियों और खेल के आयोजनों में बहुत सक्रिय रूप से हिस्सा लेते थे. उनके अधिकांश एथलेटिक रिकॉर्ड, उनके स्कूल छोड़ने के कई साल बाद तक भी टूट नहीं पाए. अपनी ऑरकुट प्रोफाइल में उन्होंने अपने आप को फिल्मों के लिए पागल बताया.

कम उम्र से ही साहस के प्रदर्शन के अलावा उनका एक नर्म पक्ष भी था, वे अपने स्कूल के संगीत समूह के सदस्य भी थे.

सेना कैरियर

संदीप 1995 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (National Defence Academy) (एनडीए) में शामिल हो गए. वे एक कैडेट थे, ओस्कर स्क्वाड्रन (नंबर 4 बटालियन) का हिस्सा थे और एनडीए के 94 वें कोर्स के स्नातक थे. उन्होंने कला (सामाजिक विज्ञान विषय) में स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी.

उनके एनडीए के मित्र उन्हें एक "निः स्वार्थ", "उदार" और "शांत व सुगठित" व्यक्ति के रूप में याद करते हैं.

उनके खुश मिजाज़ चेहरे पर एक दृढ और सख्त सैनिक का मुखौटा स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था, इसी तरह से उनके पतली काया के पीछे एक सुदृढ़, कभी भी हार ना मानने वाली एक भावना छिपी थी, इन गुणों को एनडीए में आयोजित कई प्रशिक्षण शिविरों और देश के बाहर होने वाली प्रतिस्पर्धाओं में देखा गया, जिनमें उन्होंने हिस्सा लिया था.

उन्हें 12 जुलाई 1999 को बिहार रेजिमेंट (इन्फेंट्री) की सातवीं बटालियन का लेफ्टिनेंट आयुक्त किया गया. हमलों और चुनौतियों का सामना करने के लिए दो बार उन्हें जम्मू और कश्मीर तथा राजस्थान में कई स्थानों पर भारतीय सेना में नियुक्त किया, इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स में शामिल होने के लिए चयनित किया गया. प्रशिक्षण के पूरा होने पर, उन्हें जनवरी 2007 में एनएसजी का विशेष कार्य समूह (एसएजी) सौंपा गया और उन्होंने एनएसजी के कई ऑपरेशन्स में भाग लिया.

वे एक लोकप्रिय अधिकारी थे, जिन्हें उनके वरिष्ठ और कनिष्ठ दोनों ही पसंद करते थे. सेना के सबसे कठिन कोर्स, 'घातक कोर्स' (कमांडो विंग (इन्फैंट्री स्कूल), बेलगाम में) के दौरान वे शीर्ष स्थान पर रहे, उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारीयों से "प्रशिक्षक ग्रेडिंग" और प्रशस्ति अर्जित की. संभवतया यही कारण था या बहादुरी के लिए उनका जुनून था कि उन्होंने एनएसजी कमांडो सेवा को चुना, जिसमें वे 2006 में प्रतिनियुक्ति पर शामिल हुए थे.

जुलाई 1999 में ऑपरेशन विजय के दौरान पाकिस्तानी सैन्य दलों के द्वारा भारी तोपों के हमलों और छोटी बमबारी के जवाब में उन्होंने आगे की पोस्ट्स में तैनात रहते हुए धैर्य और दृढ संकल्प का प्रदर्शन किया.

31 दिसंबर 1999 की शाम को, मेजर संदीप ने छह सैनिकों एक टीम का नेतृत्व किया और शत्रु से 200 मीटर की दूरी पर एक पोस्ट बना ली. इस दौरान वे शत्रु के प्रत्यक्ष प्रेक्षण और आग के चलते काम कर रहे थे.

ऑपरेशन ब्लैक टोरनेडो

26 नवम्बर 2008 की रात, दक्षिणी मुंबई की कई प्रतिष्ठित इमारतों पर आतंकवादियों ने हमला किया. इनमें से एक इमारत जहां आतंकवादियों ने लोगों को बंधक बना लिया, वह 100 साल पुराना ताज महल पेलेस होटल था.

ताज महल होटल के इस ऑपरेशन में मेजर उन्नीकृष्णन को 51 तैनात एसएजी का टीम कमांडर नियुक्त किया गया, ताकि इमारत को आतंकवादियों से छुड़ाया जा सके और बंधकों को बचाया जा सके. उन्होंने 10 कमांडो के एक समूह में होटल में प्रवेश किया और सीढियों से होते हुए छठी मंजिल पर पहुंच गए. सीढियों से होकर निकलते समय, उन्होंने पाया कि तीसरी मंजिल पर आतंकवादी हैं. आतंकवादियों ने कुछ महिलाओं को एक कमरे में बंधक बना लिया था और इस कमरे को अन्दर से बंद कर लिया था. दरवाजे को तोड़ कर खोला गया, इसके बाद आतंकवादियों ने एक राउंड गोलीबारी की जिसमें कमांडो सुनील यादव घायल हो गए. वे मेजर उन्नीकृष्णन के प्रमुख सहयोगी थे.

मेजर उन्नीकृष्णन ने सामने से टीम का नेतृत्व किया और आतंकवादियों के साथ उनकी भयंकर मुठभेड़ हुई. उन्होंने सुनील यादव को बाहर निकालने की व्यवस्था की और अपनी सुरक्षा को ताक पर रखकर आतंकवादियों का पीछा किया, इसी दौरान आतंकवादी होटल की किसी और मंजिल पर चले गए, और इस दौरान संदीप निरंतर उनका पीछा करते रहे. इसके बाद हुई मुठभेड़ में उन्हें पीछे से गोली लगी, वे गंभीर रूप से घायल हो गए और अंत में चोटों के सामने झुक गए.

अंतिम संस्कार

उन्नीकृष्णन के अंतिम संस्कार में, शोक में लिप्त लोगों ने जोर जोर से चिल्ला कर कहा "लॉन्ग लाइव् मेजर उन्नीकृष्णन", "संदीप उन्नीकृष्णन अमर रहे". हजारों लोग एनएसजी कमांडो मेजर उन्नीकृष्णन के बैंगलोर के घर के बाहर खड़े होकर उन्हें श्रद्धांजली दे रहे थे. मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का अंतिम संस्कार पूरे सैनिक सम्मान के साथ किया गया.


आज अमर शहीद संदीप उन्नीकृष्णन की ४० वीं जयंती के अवसर पर हम उनको शत शत नमन करते है |

जय हिन्द !!!

जय हिन्द की सेना !!!

सोमवार, 13 मार्च 2017

१३ मार्च को लिया गया था जलियाँवाला नरसंहार का बदला

आज १३ मार्च है ... आज ही के दिन सन १९४० मे अमर शहीद ऊधम सिंह जी ने लंदन मे माइकल ओडवायर को मौत के घाट उतार कर जलियाँवाला नरसंहार का बदला लिया था !


लोगों में आम धारणा है कि ऊधम सिंह ने जनरल डायर को मारकर जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लिया था, लेकिन भारत के इस सपूत ने डायर को नहीं, बल्कि माइकल ओडवायर को मारा था जो अमृतसर में बैसाखी के दिन हुए नरसंहार के समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था। 
 
ओडवायर के आदेश पर ही जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में सभा कर रहे निर्दोष लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। ऊधम सिंह इस घटना के लिए ओडवायर को जिम्मेदार मानते थे। 
 
26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में जन्मे ऊधम सिंह ने जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी, जिसे उन्होंने अपने सैकड़ों देशवासियों की सामूहिक हत्या के 21 साल बाद खुद अंग्रेजों के घर में जाकर पूरा किया। 
 
इतिहासकार डा. सर्वदानंदन के अनुसार ऊधम सिंह सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आजाद सिंह रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है।
ऊधम सिंह अनाथ थे। सन 1901 में ऊधम सिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 
 
ऊधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: ऊधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले।
 
अनाथालय में ऊधम सिंह की जिंदगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया और वह दुनिया में एकदम अकेले रह गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
 
डा. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोगों ने 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन एक सभा रखी जिसमें ऊधम सिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे।
माइकल ओडवायर

ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर
इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर ने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दे। इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग को घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी कर दी, जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए।
 
जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी। बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही मिले।
 
आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डाक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी। राजनीतिक कारणों से जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई।
 
इस घटना से वीर ऊधम सिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओडवायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। ऊधम सिंह अपने काम को अंजाम देने के उद्देश्य से 1934 में लंदन पहुंचे। वहां उन्होंने एक कार और एक रिवाल्वर खरीदी तथा उचित समय का इंतजार करने लगे।
गिरफ्तारी के तुरंत बाद का चित्र 
भारत के इस योद्धा को जिस मौके का इंतजार था, वह उन्हें 13 मार्च 1940 को उस समय मिला, जब माइकल ओडवायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया।
 
ऊधम सिंह ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवाल्वर के आकार में काटा और उनमें रिवाल्वर छिपाकर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गए। सभा के अंत में मोर्चा संभालकर उन्होंने ओडवायर को निशाना बनाकर गोलियां दागनी शुरू कर दीं।
 
ओडवायर को दो गोलियां लगीं और वह वहीं ढेर हो गया। अदालत में ऊधम सिंह से पूछा गया कि जब उनके पास और भी गोलियां बचीं थीं, तो उन्होंने उस महिला को गोली क्यों नहीं मारी जिसने उन्हें पकड़ा था। इस पर ऊधम सिंह ने जवाब दिया कि हां ऐसा कर मैं भाग सकता था, लेकिन भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है।
 
31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में ऊधम सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया जिसे उन्होंने हंसते हंसते स्वीकार कर लिया। ऊधम सिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा नहीं करते। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने ऊधम सिंह के अवशेष भारत को सौंप दिए। ओडवायर को जहां ऊधम सिंह ने गोली से उड़ा दिया, वहीं जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से घिर कर तड़प तड़प कर बुरी मौत मारा गया।
 
भारत माँ के इस सच्चे सपूत को हमारा शत शत नमन |

इंकलाब ज़िंदाबाद !!!

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