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बुधवार, 23 सितंबर 2009

जय हो - ओशनसैट-2 का सफल प्रक्षेपण, कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित

भारत ने अपने 16वें दूर-संवेदी उपग्रह ओशनसैट-2 और अन्य छह छोटे यूरोपीय उपग्रहों को बुधवार को 11.51 बजे धु्रवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान [पीएसएलवी-14] की सहायता से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन [इसरो] का भरोसेमंद स्वदेशी राकेट पीएसएलवी [पोलर सेटेलाइट लांच व्हीकल] बुधवार दोपहर 11:51 बजे ओशनसेट को लेकर रवाना हुआ। यह राकेट अपने साथ सात उपग्रहों को एक साथ लेकर रवाना हुआ है जिस में, हिंद महासागर में होने वाली हलचलों पर नजर रखने के लिए भारतीय उपग्रह ओशनसैट-2 भी अपने मिशन पर रवाना हुआ है ।

ओशनसैट-2 सहित सात उपग्रहों के प्रक्षेपण के 20 मिनट के अंदर इन्हें कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित कर दिया गया। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने छह यूरोपीय नैनो सेटेलाइट के साथ ओशनसेट-2 के सफल प्रक्षेपण के लिए इसरो के दल को बधाई दी।
इसरो के अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने छह नैनो सेटेलाइट के साथ ओशनसैट-2 के प्रक्षेपण को शानदार उपलब्धि करार दिया। 51 घंटे की उल्टी गिनती के बाद 44.4 मीटर लंबे और चार चरण वाले अंतरिक्षयान पीएसएलवी सी सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अंतरिक्ष के अपने सफर पर रवाना हुआ। उसने एक के बाद एक सभी उपग्रह कक्षा में स्थापित कर दिए।

आसमान साफ था और बुधवार सुबह 11 बज कर 51 मिनट पर जैसे ही पीएसएलवी ने आन बान के साथ आकाश का रुख किया वैज्ञानिकों में हर्षोल्लास की लहर दौड़ गई। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने के लिए वहां मौजूद थे।
ओशनसैट-2 देश का 16वां दूरसंवेदी उपग्रह है और यह मछली पकड़ने के संभावित क्षेत्रों की पहचान करने के साथ ही समुद्र की स्थिति की भविष्यवाणी करेगा और तटीय क्षेत्रों के अध्ययन में मदद करेगा। यह मौसम की भविष्यवाणी और जलवायु अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण सूचनाएं देगा। सफल प्रक्षेपण के तुरंत बाद अभियान केंद्र में मौजूद अंसारी और वरिष्ठ वैज्ञानिक एम जी के मेनन ने इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई दी। इसरो अध्यक्ष जी माधवन नायर ने वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए इसे एक आदर्श और सटीक प्रक्षेपण बताया।
नायर ने इस शानदार उपलब्धि के लिए वैज्ञानिकों को मुबारकबाद देते हुए कहा इस प्रक्षेपण ने एक बार फिर हमारी क्षमता साबित कर दी है। यह समूहकार्य की एक शानदार मिसाल है साथ ही पीएसएलवी प्रक्षेपणयान की परिपक्वता साबित हो गई है।
इशरो के अध्यक्ष नायर ने कहा यह एक शानदार उपलब्धि है। हमने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हम सटीक तरीके से काम कर सकते हैं। यह बात उन्होंने इसरो के राकेट पीएसएलवी द्वारा 20 मिनट की अवधि में सात उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने के चंद मिनट बाद कही।
उन्होंने कहा कि अभियान की सफलता पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की सराहना की है। प्रक्षेपण वाहन के प्रभारी वरिष्ठ अंतरिक्ष वैज्ञानिक जार्ज कोशी ने कहा कि जब भी हमारे समक्ष कठिनाई आती है, इसरो और मजबूत बनकर उभरता है।
इसरो के टेलीमेट्री, ट्रेकिंग और कमांड नेटवर्क निदेशक एस. के. शिवकुमार ने कहा कि मारिशस स्थित कमांड सेंटर ने प्रक्षेपण वाहन से अलग होते ही ओशनसेट-2 से निकलने वाले सिग्नलों को पकड़ा।
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के निदेशक के राधाकृष्णन ने कहा कि सात उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण ने पीएसएलवी की परिपक्वता को एक बार भी साबित किया है। उन्होंने कहा कि यह पीएसएलवी का लगातार 15वां सफल प्रक्षेपण था।

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

कलकत्ता की दुर्गा पूजा


मेरी पैदाइश और परवरिश दोनों कलकत्ता की है ! १९९७ में कलकात्ता छोड़ कर मैं मैनपुरी आया और तब से यहाँ का हो कर रह गया हूँ ! आज भी अकेले में कलकत्ता की यादो में खो सा जाता हूँ | कलकत्ता बहुत याद आता है , खास कर दुर्गा पूजा के मौके पर, इस लिए सोचा आज आप को अपने कलकत्ता या यह कहे कि बंगाल की दुर्गा पूजा के बारे में कुछ बताया जाये !

यूँ तो महाराष्ट्र की गणेश पूजा पूरे विश्व में मशहूर है, पर बंगाल में दुर्गापूजा के अवसर पर गणेश जी की पत्नी की भी पूजा की जाती है।

जानिए और क्या खास है यहां की पूजा में।

[षष्ठी के दिन]




मां दुर्गा का पंडाल सज चुका है। धाक, धुनुचि और शियूली के फूलों से मां की पूजा की जा रही है। षष्ठी के दिन भक्तगण पूरे हर्षोल्लास के साथ मां दुर्गा की प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। यह दुर्गापूजा का बोधन, यानी शुरुआत है। इसी दिन माता के मुख का आवरण हटाया जाता है।

[कोलाबोऊ की पूजा]

सप्तमी के दिन दुर्गा के पुत्र गणेश और उनकी पत्नी की विशेष पूजा होती है। एक केले के स्तंभ को लाल बॉर्डर वाली नई सफेद साड़ी से सजाकर उसे उनकी पत्नी का रूप दिया जाता है, जिसे कोलाबोऊ कहते हैं। उन्हें गणेश की मूर्ति के बगल में स्थापित कर पूजा की जाती है। साथ ही, दुर्गा पूजा के अवसर एक हवन कुंड बनाया जाता है, जिसमें धान, केला आम, पीपल, अशोक, कच्चू, बेल आदि की लकडि़यों से हवन किया जाता है। इस दिन दुर्गा के महासरस्वती रूप की पूजा होती है।
 
[108 कमल से पूजा]

माना जाता है कि अष्टमी के दिन देवी ने महिषासुर का वध किया था, इसलिए इस दिन विशेष पूजा की जाती है। 108 कमल के फूलों से देवी की पूजा की जाती है। साथ ही, देवी की मूर्ति के सामने कुम्हरा (लौकी-परिवार की सब्जी) खीरा और केले को असुर का प्रतीक मानकर बलि दी जाती है। संपत्ति और सौभाग्य की प्रतीक महालक्ष्मी के रूप में देवी की पूजा की जाती है।
 
[संधि पूजा]

अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि शुरू होने के 24 मिनट, यानी कुल 48 मिनट के दौरान संधि पूजा की जाती है। 108 दीयों से देवी की पूजा की जाती है और नवमी भोग चढ़ाया जाता है। इस दिन देवी के चामुंडा रूप की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इसी दिन चंड-मुंड असुरों का विनाश करने के लिए उन्होंने यह रूप धारण किया था।

[सिंदूर खेला व कोलाकुली]


दशमी पूजा के बाद मां की मूर्ति का विसर्जन होता है। श्रद्धालु मानते हैं कि मां पांच दिनों के लिए अपने बच्चों, गणेश और कार्तिकेय के साथ अपने मायके, यानी धरती पर आती हैं और फिर अपनी ससुराल, यानी कैलाश पर्वत चली जाती हैं। विसर्जन से पहले विवाहित महिलाएं मां की आरती उतारती हैं, उनके हाथ में पान के पत्ते डालती हैं, उनकी प्रतिमा के मुख से मिठाइयां लगाती हैं और आंखों (आंसू पोंछने की तरह) को पोंछती हैं। इसे दुर्गा बरन कहते हैं। अंत में विवाहित महिलाएं मां के माथे पर सिंदूर लगाती हैं। फिर आपस में एक-दूसरे के माथे से सिंदूर लगाती हैं और सभी लोगों को मिठाइयां खिलाई और बांटी जाती है। इसे सिंदूर खेला कहते हैं। वहीं, पुरुष एक-दूसरे के गले मिलते हैं, जिसे कोलाकुली कहते हैं। यहाँ सब एक दुसरे को विजय दशमी की बधाई  'शुभो बिजोया' कह कर देते है | यहाँ एक दुसरे को रसगुल्लों से भरी हंडी भेंट करना का भी प्रचालन है |


 
[मां की सवारी]

वैसे तो हम सब जानते है की माँ दुर्गा सिंह की सवारी करती हैं, पर बंगाल में पूजा से पहेले और बाद में  माँ की सवारी की चर्चा भी जोरो से होती है | यह माना जाता है कि यह उनकी एक अतरिक्त सवारी है जिस पर वो सिंह समेत सवार होती हैं | 
इस वर्ष देवी दुर्गा घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं और भैंसे की सवारी कर लौटेंगी। घोड़े की सवारी से युद्ध, रक्तपात होने की संभावना जताई जा रही है। साथ ही, भैंसे को यमराज की सवारी माना जाता है, इसलिए देवी का जाना भी शुभ फलदायक नहीं माना जा रहा है।



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