Saturday, November 7, 2009

क्रांतिकारी विचारों के जनक :- विपिन चंद्र पाल (०७/११/१८५८ - २०/०५/१९३२)


स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियाद तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाली लाल बाल पाल की तिकड़ी में से एक विपिनचंद्र पाल राष्ट्रवादी नेता होने के साथ-साथ शिक्षक, पत्रकार, लेखक बेहतरीन वक्ता भी थे और उन्हें भारत में क्रांतिकारी विचारों का जनक भी माना जाता है।

इस तिकड़ी ने 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन किया जिसे बड़े पैमाने पर जनता का समर्थन मिला। तिकड़ी के अन्य नेताओं में लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक शामिल थे।

गरम विचारों के लिए मशहूर इन नेताओं ने अपनी बात तत्कालीन विदेशी शासक तक पहुंचाने के लिए कई ऐसे तरीके इजाद किए जो एकदम नए थे। इन तरीकों में ब्रिटेन में तैयार उत्पादों का बहिष्कार, मैनचेस्टर की मिलों में बने कपड़ों से परहेज, औद्योगिक तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में हड़ताल आदि शामिल हैं। उन्होंने महसूस किया कि विदेशी उत्पादों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हो रही है और यहां के लोगों का काम भी छिन रहा है। उन्होंने अपने आंदोलन में इस विचार को भी सामने रखा। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान गरम धड़े के अभ्युदय को महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे आंदोलन को एक नई दिशा मिली और इससे लोगों के बीच जागरुकता बढ़ी।

गांधी स्मारक निधि के सचिव रामचंद्र राही के अनुसार राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जागरुकता पैदा करने में उनकी अहम भूमिका रही। उनका यकीन था कि सिर्फ प्रेयर पीटिशन से स्वराज नहीं हासिल होने वाला है।

रामचंद्र राही के अनुसार आंदोलन में महात्मा गांधी के शामिल होने के पहले विदेशी शासन के प्रति लोगों में जो नाराजगी एवं रोष था, वह विभिन्न तरीके से अभिव्यक्त किया जा रहा था। उन्हीं रूपों में से एक गरम दल के नेताओं का तरीका था। उसे जनता के एक बड़े वर्ग के बीच पसंद किया जा रहा था। राही के अनुसार स्वतंत्रता आंदोलन की बुनियाद तैयार करने में इस तिकड़ी की प्रमुख भूमिका रही।

हालांकि बाद में महात्मा गांधी ने महसूस किया कि हिंसा या टकराव के माध्यम से शक्तिशाली ब्रिटिश शासन से निजात पाना कठिन है और उन्होंने सत्याग्रह एवं अहिंसा का रास्ता अपनाया। राही का मानना है कि गांधी युग के पहले के दौर में राष्ट्रीय आंदोलन पर इस तिकड़ी का काफी प्रभाव रहा।

७ नवंबर 1858 को अविभाजित भारत के हबीबगंज जिले में [अब बांग्लादेश में] एक संपन्न घर में पैदा विपिनचंद्र पाल सार्वजनिक जीवन के अलावा अपने निजी जीवन में भी अपने विचारों पर अमल करने वाले और स्थापित दकियानूसी मान्यताओं के खिलाफ थे। उन्होंने एक विधवा से विवाह किया था जो उस समय दुर्लभ बात थी। इसके लिए उन्हें अपने परिवार से नाता तोड़ना पड़ा। लेकिन धुन के पक्के पाल ने दबावों के बावजूद कोई समझौता नहीं किया।

किसी के विचारों से असहमत होने पर वह उसे व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते। यहां तक कि सहमत नहीं होने पर उन्होंने महात्मा गांधी के कुछ विचारों का भी विरोध किया था। केशवचंद्र सेन, शिवनाथ शास्त्री जैसे नेताओं से प्रभावित पाल को अरविंद के खिलाफ गवाही देने से इनकार करने पर छह महीने की सजा हुई थी। इसके बाद भी उन्होंने गवाही देने से इनकार कर दिया था। जीवन भर राष्ट्रहित के लिए काम करने वाले पाल का 20 मई 1932 को निधन हो गया|

सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से श्री विपिनचंद्र पाल को शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि !

Friday, November 6, 2009

मूर्धन्य पत्रकार प्रभाष जोशी नहीं रहे


हिंदी पत्रकारिता के यशस्वी हस्ताक्षर प्रभाष जोशी का वृहस्पतिवार रात यहां दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वे 72 वर्ष के थे। उनके शोक संतप्त परिवार में पत्नी, दो पुत्र, एक पुत्री और नाती-पोते हैं।

पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि रात लगभग 11:30 बजे तबीयत बिगड़ने पर जोशी को नरेंद्र मोहन अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। प्रभाष जोशी दैनिक जनसत्ता के संस्थापक संपादक थे।

मूल रूप से इंदौर निवासी प्रभाष जोशी ने नई दुनिया से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। मूर्धन्य पत्रकार राजेंद्र माथुर और शरद जोशी उनके समकालीन थे। नई दुनिया के बाद वे इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े और उन्होंने चंडीगढ़ तथा अहमदाबाद में स्थानीय संपादक का पद संभाला। 1983 में दैनिक जनसत्ता का प्रकाशन शुरू हुआ जिसने हिंदी पत्रकारिता की दिशा और दशा ही बदल दी। 1995 में इस दैनिक के संपादक पद से सेवानिवृत्त होने के बावजूद वे एक दशक से ज्यादा समय तक बतौर संपादकीय सलाहकार इस पत्र से जुड़े रहे।

प्रभाष जोशी अपने साप्ताहिक स्तंभ 'कागद कारे' के साथ विभिन्न विषयों पर निरंतर लिखते रहे। सामाजिक, राजनीतिक सरोकारों के साथ ही खेल, खासकर क्रिकेट पर उन्होंने यादगार लेखन किया और आज भी वसुंधरा स्थित अपने जनसत्ता अपार्टमेंट स्थित आवास पर दिल का दौरा पड़ने से पहले उन्होंने भारत और आस्ट्रेलिया के बीच हुआ पांचवां एक दिवसीय मैच देखा था|

सभी मैनपुरी वासीयों की ओर से जोशी जी को शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि !

Wednesday, November 4, 2009

मेरी दिल्ली यात्रा !!

२८ की रात और कार्तिक का पहला ट्रेन का सफर :-

२८ की रात को मैनपुरी स्टेशन से कालंदी एक्सप्रेस की S1 में सामान लगाने के बाद जब अपने ३ साल के बेटे कार्तिक से मुखातिब हुआ तो पता चला कि साहबजादे ने अपनी माताजी और दादी से सिफारिश की है कि मुझे सुलाना नहीं ...... यह कार्तिक का पहला ट्रेन का सफर था और उसमे भी इस सफर को ले कर काफ़ी उत्साह था ! खैर साहब, ट्रेन समय से चली और कार्तिक का पहला ट्रेन का सफर शुरू हुआ ! पूरे मूड में थे जनाब, अपनी हर उस अदा का प्रदर्शन करते हुए जो हम सब को उनका दीवाना बनाए हुए है ! लगभग २ घंटे तक खेलने के बाद थकन और नीद का मिलाजुला असर हुआ कार्तिक पर और उन्हें अपनी आरामगाह - माँ की गोद - की याद आई, और थोडी ही देर में कार्तिक सो गए पर ट्रेन चलती रही अपनी मंजिल की ओर !

२९ की सुबह दिल्ली की

२९ की सुबह ६:३० पर पुरानी दिल्ली स्टेशन पर उतरना हुआ ! समान थोड़ा ज्यादा था सो एक कुली लिया गया और स्टेशन के पास बने CUMSOME पर इंतज़ार करने लगे टैक्सी लिए जो मेरे भाई अनुज ने भेजी थी हमे घर तक लाने लिए !

टैक्सी का ड्राईवर - नरेश

थोडी देर के इंतज़ार के बाद टैक्सी आ गई .... एक २४-२५ साल का बन्दा... सफ़ेद युनिफोर्म में .... एक मुस्कान के साथ मेरे पास आया और परिचय दिया,"सर, मैं नरेश हूँ ....आपको घर ले जाने के लिए अनुज जी ने मुझे ही बोला है|"कुछ देर चलने के बाद उससे पुछा,"कहाँ के हो ?"....... जवाब आया," जी सर ...... हिमाचल के एक छोटे से गाँव का हूँ |"
"यहाँ कब से हो ?"
"जी ... ६ साल से !"
"टैक्सी ही चलते हो शुरू से ?"
"नहीं सर !!" - पहली बार उसकी आवाज़ कुछ तेज़ और तीखी लगी !
"तो !?"
"यहाँ पढने आया था !!" - अब की बार आवाज़ में तल्खी की जगह कुछ अफ़सोस था !!
" तो पढ़े फ़िर ??"
"हाँ पढ़ा पर कोई नौकरी नहीं मिली..!!"
आगे सब कुछ समझा हुआ था सो मैं चुप ही रहा !!

बधाई अनुज और नेहा को

२९ और ३० दोनों दिन काफ़ी भागा भागी रही ३१ की तैयारी को ले कर ! आख़िर ३१ हमारे अनुज का एक ख़ास दिन जो था ..... केवल ३१ की शाम को उसकी सगाई होनी थी बल्कि ३१ को उसका जन्मदिन भी था | ३० की देर रात से ही घर में गाने बाजने का माहौल बना हुआ था ...१२ बजते बजते सब ने खूब धमाल किया | सब से ज्यादा अगर किसी ने मस्ती की होगी तो वह की होगी अनुज की दोनों भाभीयों ने .....एक तो मेरी पत्नी जया और दूसरी अनुज के बड़े भाई आशीष की पत्नी स्वाति ! दोनों ने ही अपने देवर के इस ख़ास दिन को और भी खास बनने में कोई कसर नहीं छोड़ी ! वैसे हम सब का तो एक ही स्वर में यहीं कहना है, " अनुज और नेहा - बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !"


क्या ब्लू लाइन - क्या ग्रीन लाइन, अपनी तो गई होती लाइफ लाइन

जी हाँ , दिल्ली में हमारी लाइफ लाइन कट गई होती, हुआ यूँ कि १ तारीख को हम को विकासपुरी जाना था अपनी बुआजी के घर ....बड़े भाई साहब, विक्रम, आए हुए थे अपनी गाड़ी ले कर | सो हम सब चल दिए उनके साथ....रास्ते में गाड़ी में लगे शीशे में विक्रम भाई को पीछे से आती एक ग्रीन लाइन बस दिखी ...जो बड़ी तेज़ी से ओवर टेक करने की फिराक में थी ........बस को रास्ता दे दिया गया ........पर यह क्या !!!!!!!!!! बस तो जैसे गाड़ी के ऊपर ही आ रही थी..... जैसे तैसे गाड़ी को किनारे किया गया ........बस कुछ इस तरह चिडाते हुए चली गई जैसे कह रही हो, " बच गया आज तो ....फ़िर मिला तो देख लूगी !!" बस के गुज़र जाने के बाद जब विक्रम भाई की तरफ़ देखा तो पाया कि गाड़ी उन्होंने नहीं रोकी थी बल्कि मेट्रो ट्रेन के पुल के खंभे के सहारे से रुकी थी ! अब सोचता हूँ कि अगर बस अपने रास्ते न जा हमारी गाड़ी पर आई होती तो क्या होता ?? बहुत सुना था दिल्ली कि बसों के बारे में देख भी लिया !! जिन को मालूम हो उन्हें बता दू यह ग्रीन लाइन बस ही पहले ब्लू लाइन के नाम से जानी जाती थी !!

कलकत्ता की मेट्रो के बाद अब दिल्ली की मेट्रो

बस वाले हादसे से हिले हुए हम सब जब घर पहुचे तो पाया हमारी लीना भाभी गरमा गरम चाय और समोसों के साथ हमारा इंतज़ार कर रही थीं ! चाय की चुस्कियों के बीच उनको पूरा किस्सा सुनाया गया और चटनी के चटकारो के साथ समोसों का आनंद ले इस घटना को भूलाया भी गया ! शाम हो चुकी थी और अगले ही दिन हमारी वापसी भी थी सो प्रोग्राम बना "इंडिया गेट" जाने का पर अब की बार दिल्ली की मेट्रो की सवारी तय की गई ! मेट्रो का नाम सुन हमारी माता जी ने पैर .......ओह्ह्ह माफ़ कीजियेगा हाथ खड़े कर दिए ....दरअसल कलकत्ता में १९९७ तक रहने के कारण उनका मेट्रो की लम्बी लम्बी सीढियों से बहुत बार सामना हुआ है ! यहाँ यह बताता चलू कि मेट्रो भारत में सब से पहले कलकत्ता में ही चली थी सन १९८४ के २४ अक्टूबर को भवानीपुर से एस्प्लानादे तक स्टेशन के दरमियां | खैर साहब, खूब आनंद आया दिल्ली की मेट्रो में इंडिया गेट तक गए और फ़िर लौटे ! कार्तिक को इस बीच हमारी लाडली भतीजी श्रृष्टि का साथ मिल गया था सो वे भी मगन थे अपनी छोटी बहन के साथ !


एक साथ "चारो धाम" :- एक शाम "इंडिया गेट" के नाम

इंडिया गेट - क्या कहू इस के बारे में ..... क्या है यह .....कभी सोचा आपने ??
मैंने सोचा .......और पाया मेरे लिए इसके दर्शन करना एसा है मानो मैंने चारो धाम एक साथ कर लिए हो !! क्या आप किसी भी एक एसी और जगह के बारे में जानते है ?? क्या हिंदू , क्या मुसलमान, क्या सिख, क्या ईसाई , या कोई भी धर्मं मानने वाला क्यों न हो ......कौन होगा जो यहाँ अपना शीश झुकाना न चाहे .....कौन जाने कितने लोगो की याद में बना है यह "इंडिया गेट" पर उन सब में एक ही समानता .......सब के सब शहीद हो गए अपने वतन के लिए ........हमारे लिए .....हमारे बच्चो के लिए ..... यूँ कहे हमारी आगे आने वाली पढ़ियो के लिए ! क्या उनका कोई नहीं था ....उनके भी तो बच्चे रहे होगे.....हो सके तो एक बार उनकी जगह अपने आप को रख कर सोचियेगा ... हिल जायेगे आप अंदर तक .......अपने बिना अपने परिवार की कल्पना करना आसान नहीं !!
पर कोई था जिसने यह सब जानते हुए भी अपना सब कुछ बलिदान कर दिया ताकि हमे यह कल्पना न करनी पड़े!
इस लिए मेरे लिए "इंडिया गेट" किसी भी पूजा स्थल से कम नहीं......और इस लिए मैं गया वहाँ सपरिवार मत्था टेकने !
अपने परिवार की और अपनी ओर से उन सब शहीदों को मेरा शत शत नमन |


दिल्ली में बिताये हुए वह आखिरी कुछ घंटे

तारीख को रात १० बजे फ़िर कालंदी पकड़नी थी मैनपुरी वापसी के लिए सो यह तय किया गया कि दोपहर के खाने के बाद ही कहीं जायेगे | खाने के बाद राजोरी गार्डन जाने का प्रोग्राम बना श्रीमती जी को कुछ खरीदारी करनी थी अपनी जेठानी जी के संग मिल कर ....तो साहब निकल लिए हम सब पर अब की बारी भाई साहब की गाड़ी से |
वहाँ पहुँच मॉल्स में खरीदारी और हवाखोरी का दौर चला | कार्तिक और श्रृष्टि, दोनों अपनी अपनी नीद ले चुके थे सो दोनों मस्ती कर रहे थे | वहाँ मॉल्स में मौजूद विभिन्न राइड्स और गमेस का दोनों ही बच्चो ने भरपूर आनंद लिया, खासकर कार्तिक ने ! वहाँ से हम सब शाम ६:३० - ७:०० तक लौटे और फ़िर झटपट पैकिंग निबटा खाने का लुत्फ़ लिया गया | टैक्सी भी टाइम से आ गई थी ... गुरु पर्व होने के नाते जाम से बचने में ही भलाई दिखी सो ८ बजे तक विक्रम भइया और लीना भाभी से विदा ले घर से स्टेशन के लिए निकल पड़े |


अविनाश भाई और अजय भाई का गुनहगार हूँ

२९ की शाम को ही अविनाश वाचस्पति और अजय कुमार झा से फ़ोन पर बात की कि हम तेरे शहर में आए है मुसाफिर की तरह, एक मुलाकात का मौका दे दे .... दोनों तैयार और हम भी पर ................ आखिर तक यह मुलाकात हो सकी ! कुछ तो हम इतने व्यस्त रहे अपने कामों में और कुछ दिल्ली में एक जगह से दूसरी जगह की दूरी इतनी ज्यादा कि हम जैसा मैनपुरी वासी निकल ही नहीं पाया | खैर, यह सब तो बातें है ... मैं सच में बेहद शर्मिंदा हूँ कि दिल्ली में होते हुए भी आप दोनों से मिल नहीं पाया ! अगली बार जरूर जरूर मिलना होगा एसा यकीं है | इस बार के लिए आप दोनों से ही माफ़ी की उम्मीद करता हूँ !


तो साहब, यह थी मेरी दिल्ली यात्रा - एक बेहद सुखद और यादगार यात्रा !!
और हाँ मुझे जवाब भी मिल गया है अपने उस सवाल का जो मेरे जहेन में था दिल्ली जाने से पहले - अपने ब्लॉग से दूर कैसा लगता है ??

बहुत बुरा लगता है भाई बहुत बुरा लगता है मानो किसी ने जुबान ही काट डाली हो ....अपने दिल की बात तो आजकल ब्लॉग के मध्यम से ही करी जाती है न !!



Tuesday, November 3, 2009

शायद इसी को घर लौटना कहते है !!

सभी ब्लॉगर मित्रों को प्रणाम !

आज सुबह ४ बजे मैनपुरी स्टेशन पर जब कलान्दी आ कर रुकी, तब यु लगा जैसे कितने सालो के बाद मैं अपने देश वापस लौटा हूँ ........हर एक आदमी अपना सा लगा, रोज़ जिन सडको की भीड़ मुझे परेशान करती थी.... उन्ही सड़को पर छाया भोर का सन्नाटा मुझे आज परेशान कर रहा था....क्यों खोज रहा था मैं किसी एसे को जो मुझे देखते ही बोले,"आ गए शिवम् !!" क्यों चाह रहा था मैं कि कोई साइकिल वाला या रिक्शा वाला मेरी गाड़ी के ड्राईवर को तेज़ चलने पर कुछ सुना दे ....क्यों थी यह ललक एक अदना से वार्तालाप की..............क्यों ???.............. शायद इसी को घर लौटना कहते है !!

Wednesday, October 28, 2009

अब दिल्ली दूर नहीं ......

सभी ब्लॉगर मित्रो को प्रणाम !

आज रात की ट्रेन से दिल्ली जाना हो रहा है, हमारे मामाजी के बेटे यानि कि हमारे छोटे भाई की सगाई का समारोह है सो अब आप लोगो से ०३/११/२००९ को मुलाकात होगी ! ब्लॉग शुरू करने के बाद से पहली बार कहीं जाना हो रहा है, सुना है बड़ा आजीब लगता है अगर - दिन अपने ब्लॉग से दूर रहे तो ..... देखते है क्या अनुभव होता है !!

वैसे जो भी होगा आप सब को पता चलेगा ही क्यों अगली पोस्ट तो उस पर ही होगी !! :)

चलिए फ़िर मिलते है दिल्ली से लौट कर !!

सादर आपका
शिवम् मिश्रा
मैनपुरी, उत्तर प्रदेश.

1857 के क्रांतिकारी इतिहास का साक्षी है कवर का नगला


आज से 152 वर्ष पहले जब भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंखनाद हुआ था। पूरा जनपद क्रांति की आग में जल रहा था। मैनपुरी के चौहान वंशी राजा तेज सिंह अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक दिया था। जनपद भर में अंग्रेजों के खजाने लुट रहे थे। मालगुजारी की वसूली बंद कर दी गयी थी और अंग्रेज सैनिकों, अधिकारियों को मार डालने की योजना बनायी जा चुकी थी।

ऐसे में मैनपुरी का ऐतिहासिक भोगांव कस्बा भी क्रांति की इस आग से अछूता नहीं था। अलीगढ़ में सेना ने विद्रोह कर दिया था। मैनपुरी में भी 22 मई को 4 बजे मैनपुरी के जिला कलेक्टर को सूचना मिली की नौंवी पल्टन ने ईस्ट इंडिया सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है और भारतीय सैनिक बंदूकों से फायर करते हुये अधिकारियों के स्थानों की तरफ कूच कर चुके हैं। इस स्थिति को देखते हुये ले. कोक्स, कै. कैलनर भाग खडे़ हुये। तत्कालीन मजिस्ट्रेट जॉन पॉवर नि:सहाय अवस्था में था। अंग्रेज अधिकारी भागते हुये ईसन नदी के पुल पर जाकर छिप गये। लेकिन वह विद्रोही सैनिकों को चकमा नहीं दे सके। उन्होंने मॉन्ट गुमरी और वाटसन के घरों को लूट लिया तथा उनके घरों में आग लगा दी। सैनिकों ने शस्त्रागार को भी पूरी तरह लूट लिया। अनेक अंग्रेजों को विद्रोही सैनिकों ने बंदी बना लिया था। क्रांतिकारी सैनिकों ने मालखाना लूट लिया था और यह क्रांति की आग देखते देखते भोगांव तक पहुंच गयी।

29 मई 1857 को मेजर हैंस, कै. कैरी और लै. वारबोर फरेर और कर्नल स्मिथ सन्नद्ध हुये। लै. वारबोर को 30 मई को भोगांव और 31 मई को कुरावली पहुंचने का आदेश मिला और अंग्रेज सेना 30 मई को भोगांव पहुंच गयी। उस समय भोगांव में वर्तमान जूनियर हाईस्कूल एवं वर्तमान नेशनल महाविद्यालय के मध्य मैदान में अंग्रेजों की ओर से एक पुर्विया पल्टन पड़ी हुयी थी। इस पल्टन ने 31 मई को अंग्रेजी सेना के खिलाफ विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह का दमन करने मेजर हैंस और कै. कैरी अंग्रेज सिपाहियों की फौज को लेकर 1 जून को भोगांव पहुंचे। जब यह दोनों अफसर क्रांतिकारी सेना के सामने पहुंचे और उनके सरेंडर करने के लिये कहा तो क्रांतिकारी फौज उनके ऊपर टूट पड़ी। देखते-देखते अंग्रेजी सेना के तमाम अंग्रेज सैनिक घटनास्थल पर धराशायी हो गये। मेजर हैंस और कै. कैरी जान बचाते हुये वहां से भागे। परंतु भारतीय सिपाहियों ने उनकों चारों तरफ से घेर लिया। एक क्रांतिकारी सिपाही ने मेजर हैंस के सिर पर तलवार से इतना तेज बार किया कि उनके प्राण पखेरू वहीं पर उड़ गये। कै. कैरी किसी प्रकार घोडे़ पर चढ़कर मैनपुरी की ओर भाग लिया। उसके साथ लगभग 50 अंग्रेज सिपाही थे जिन्हें घेर कर भारतीय क्रांतिकारी सैनिकों ने मार डाला।

कुछ दिनों बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की अंग्रेज सेना पुन: सातवीं घुड़सवार पल्टन लेकर भोगांव आई। भोगांव के पास ही क्रांतिकारियों की सेना से उनकी भीषण मुठभेड़ हुयी। अंग्रेजी सेना पीछे खदेड़ दी गयी। सैकड़ों की संख्या में अंग्रेज यहां पर भी मारे गये। क्रांतिकारियों ने यहां के थाने पर आक्रमण कर दिया और इस लड़ाई में क्रांतिकारियों ने लै. कैंट जॉव को इतना बुरी तरह घायल कर दिया कि आगे चलकर उसकी मृत्यु हो गयी। मारे गये सैकड़ों अंग्रेज सिपाहियों को अंग्रेज सेना मैनपुरी उठाकर ले गयी तथा गोला बाजार के पास एक कब्रिस्तान में दफना दिया। गोरों की लाशों के दफनाये जाने के कारण इस जगह का नाम कवर का नगला पड़ गया। गोलाबाजार के पास सैकड़ों की संख्या में दफन अंग्रेज क्रांति की 152 साल पुरानी कहानी के आज भी गवाह बने हुये हैं।

21 जून को सूर्याेदय के पूर्व क्रांतिकारी फौज ने मैनपुरी जेल का फाटक तोड़ दिया। मुक्त बंदियों और क्रांतिकारियों ने मिलकर अंग्रेजों के घरों को खूब लूटा तथा उनमें आग लगा दी। जेल के फाटक का टूटना मैनपुरी जनपद से विदेशी सत्ता की समाप्ति का सूचक था। अधिकांश अंग्रेज अपने प्राणों की रक्षा करते हुये आगरा की ओर भाग गये। विदेशियों के पलायन के बाद मैनपुरी की बागडोर राजा तेजसिंह ने संभाली थी |

-अनिल मिश्रा

Tuesday, October 27, 2009

नानक वाणी में प्रेमिका हैं प्रभु !!

गुरु नानक का जन्म रावी नदी के तटवर्ती गांव तलवंडी में वर्ष 1469 में कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था। बाद में यह स्थान 'ननकाना साहब' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नानक की बड़ी बहन नानकी के नाम का अनुकरण करते हुए पिता कालू मेहता ने अपने बेटे का नाम नानक रखा था। नानक बचपन से ही प्रतिदिन संध्या समय मित्रों के साथ बैठकर सत्संग किया करते थे। उनके मित्रों में भाई मनसुख का नाम विशेष रूप से लिया जाता है, क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले नानक की वाणियों का संकलन किया था। कहते हैं कि नानक जब वेई नदी में उतरे, तो तीन दिन बाद प्रभु से साक्षात्कार करने पर ही बाहर निकले। 'ज्ञान' प्राप्ति के बाद उनके पहले शब्द थे 'एक ओंकार सतनाम' विद्वानों के अनुसार, 'ओंकार शब्द तीन अक्षर '', '' और '' का संयुक्त रूप है। '' का अर्थ है जाग्रत अवस्था, '' का स्वप्नावस्था और '' का अर्थ है सुप्तावस्था। तीनों अवस्थाएं मिलकर ओंकार में एकाकार हो जाती हैं।'

लोगों में प्रेम, एकता, समानता, भाईचारा और आध्यात्मिक ज्योति का संदेश देने के लिए नानक ने जीवन में चार बड़ी यात्राएं कीं, जो 'चार उदासी' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उनकी यात्राओं में उनके साथ दो शिष्य बाला और मरदाना भी थे। गुरु नानक का कंठ बहुत सुरीला था। वे स्वयं वाणी का गान करते थे और मरदाना रबाब बजाते थे।

नानक की समस्त वाणी 'गुरु ग्रंथ साहिब' में संकलित है। अपने काव्य के माध्यम से नानक ने पाखंड, राजसी क्रूरता, नारी गुणों, प्रकृति चित्रण, अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों का सजीव चित्रण किया है। अपने काव्य में नानक ने प्रभु को 'प्रेमिका' का दर्जा दिया है। नानक का मत था कि अपने आप को उसके प्रेम में मिटा दो, ताकि तुम्हें ईश्वर मिल सके। जब पूर्ण विश्वास के साथ हम सब कुछ प्रभु पर छोड़ देते हैं, तो प्रभु स्वयं हमारी देख-रेख करता है। गुरु नानक ने गृहस्थ जीवन अपनाकर समाज को यह संदेश दिया कि प्रभु की प्राप्ति केवल पहाड़ों या कंदराओं में तप करने से ही प्राप्त नहीं होती, बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन अपनाया जा सकता है। नानक का मत था कि वे सभी उपाय, जिनसे आप प्रभु का साक्षात्कार कर सकते हैं, अपनाते हैं, तो जीवन में सात्विकता आती है। इससे आपका मन आनंद, प्रेम और दया भाव से भरा रहता है। वे किसी व्यक्ति, समाज, संप्रदाय या देश के नहीं थे, बल्कि सबके थे और सब उनके। नानक के अनुसार, न कोई हिंदू है, न मुसलमान। सारा संसार मेरा घर है और संसार में रहने वाले सभी लोग मेरा परिवार है।

आज सभी लोग सांसारिक तृष्णा में लिप्त हैं और सतही जीवन जी रहे हैं। जीवन की वास्तविकता से दूर जाने के कारण जीवन में नीरसता, कुंठा और निराशा बढ़ती जा रही है। हम छोटी सी बात पर लड़ने-मरने को तैयार हो जाते हैं। हमारा अन्त:करण हमसे छूटता जाता है और हम अधिक तनाव में रहने लगते हैं। ऐसे में नानक की वाणी तपते मन में ठंडी फुहारों के समान हैं।

-डॉ. सुरजीत सिंह गांधी

शो़क समाचार - आख़िर हार गई अर्चना मौसी !!


"आख़िर हार गई, अर्चना !!" - यही कहना था उन सभी का जिसने भी यह सुना कि अर्चना पाठक नहीं रहीं !!
अर्चना पाठक मैनपुरी जनपद के बुद्धिजीवियों के लिए कोई नया नाम नहीं, सभी जानते थे उनको और उनके संघर्ष पूर्ण जीवन को !! किसी से भी कुछ भी छिपा नहीं, एक खुली किताब की तरह !

पिछले २ महीने से लगातार अपनी गिरती हुयी सेहत से परेशान अर्चना ने दिनांक २४/१०/२००९, दिन शनिवार प्रातः ११ बजे आख़िर हार मान ली और अपने चौथियाना मोहल्ला के निवास पर अपनी अन्तिम साँस ली ! वे लंबे समय से गुर्दे की बीमारी से जूझ रही थीं |

मैनपुरी में आप हस्तकला विशेषज्ञ के रूप में जानी जाती थीं | अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र जैसे विषयो से डबल एम.. की हुई अर्चना ने कलकत्ता के विख्यात कालाविध शंतिरंजन बोस से हस्तकला का प्रशिक्षण लिया था | आप लेदर बाटिक, क्ले मॉडलिंग, पोट्रेट, समेत कला के विभिन्न विधाओं की विशेषज्ञ थीं | अपने कैमल क्रयालिन की राष्ट्रीय पेंटिंग प्रतियोगिता में २ बार प्रथम पुरस्कार हासिल कर मैनपुरी जनपद को गौरवान्वित किया|

मैनपुरी में जिस ज़माने में लड़कियों की शिक्षा पर ही सवाल उठाये जाते थे उस समय अर्चना पाठक एक केडिट के रूप में भारत स्काउट एंड गाइड्स एवं एन सी सी में मैनपुरी का प्रतिनिधित्व कर रहीं थीं | यह उनके जीवन के छात्रावस्था काल की बात है |

उनका जीवन अनेक उतार चडाव से भरा था पर हर बार वो अपने आप को प्रोत्साहित कर आगे बढ़ती जाती थीं | कभी हार न मानना ही उनके जीवन का मूल मंत्र था | पर उस परम पिता की इच्छा के आगे वो भी हार गयीं !

मैनपुरी में आयोजित विभिन्न कला प्रतियोगिताओ में निर्णायक के रूप में आमंत्रित की गई अर्चना पाठक को जानने वाले जनपद के विभिन्न बुद्धिजीवियों ने गहरा शोक प्रकट किया है उनके निधन पर |

अपनी अर्चना मौसी को और क्या दे सकता था मैं सिवाए इस विनम्र श्रद्धांजलि के |

जाओ खूब खुश हो कर जाओ,
और जाते जाते यह भी जान जाओ,
जिसने हर बार की तकरार तुमसे न जाने किन किन बातों पर,
वही मैं आज यह कहता हूँ बहुत याद आओगी तुम न जाने किन किन बातों पर !!
बहुत कुछ सहा तुम ने ता-उमर,
अब बहुत हुआ जहाँ भी रहो खुश रहना,
'उससे' कर देना शिकायत,
नहीं तुम्हे है अब कुछ सहना,
बस मौसी अब खुश रहना !!

Saturday, October 24, 2009

अगले साल फिर बीस हजारी होगा सेंसेक्स

सेंसेक्स अगले साल जनवरी में फिर 20 हजारी हो जाएगा। वहीं नेशनल स्टाक एक्सचेंज के निफ्टी भी 6 हजार के स्तर को पार कर जाएगा। देश के प्रमुख उद्योग चैंबर एसोचैम ने ये आसार व्यक्त किए हैं। चैंबर ने निवेशकों के भरोसे को अपने इस अनुमान का आधार बनाया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों [एफआईआई] द्वारा दलाल स्ट्रीट में पूंजी झोंकने का सिलसिला जारी रखने से भी इस भरोसे को बल मिला है।

बीते साल जनवरी में सेंसेक्स ने 21 हजार का स्तर छुआ था। लेकिन दुनिया भर में आए वित्तीय बवंडर ने भारतीय शेयर बाजार का भी बंटाधार कर दिया। इससे सेंसेक्स अक्टूबर, 08 में आठ हजार के स्तर से भी नीचे चला गया था। फिलहाल यह 17 हजार के आसपास घूम रहा है।

एसोचैम के मुताबिक अगस्त, 09 में औद्योगिक उत्पादन की विकास दर बढ़कर 10.4 फीसदी हो गई। इसके आगे भी बढ़ने के अनुमान हैं। दूसरे अन्य कारक भी बाजार में जान फूंकने का काम करेंगे। ग्रामीणों की आमदनी में इजाफा होने से उनकी भी बाजारों में हिस्सेदारी बढ़ेगी। इसके अलावा टेलीकाम, आटो और एफएमसीजी क्षेत्र में जारी तेजी भी सेंसेक्स को 20 हजार के स्तर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाएगी।

क्रोध की ऊर्जा का रूपांतरण


अर्जुन को समझाते हुए कृष्ण कहते हैं, 'काम' के मार्ग में बाधा आने पर क्रोध का जन्म होता है। क्रोध मन के संवेगों का प्रवाह है, जिस पर बांध न बनाए जाने पर वह व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि 60 सेकेंड का क्रोध व्यक्ति के शरीर को 600 सेकेंड तक कंपित करता है, क्योंकि क्रोध से जुड़े तथ्य व्यक्ति को 600 सेकंड तक व्यथित करते रहते हैं। क्रोध एक ऐसी आग है, जिसमें जलने वाले व्यक्ति की ऊर्जा का क्षय हो जाता है।

लड़ने को सदैव तत्पर

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति हर स्थिति-परिस्थिति में अपने अनुकूल परिणाम चाहता है। इसके लिए ज्यादातर व्यक्ति लड़ने और बहस करने के लिए तत्पर हो जाते हैं। वहीं कोई व्यक्ति लड़ने को उद्यत हो रहा हो, तो हम तुरंत ईंट का जवाब पत्थर से देना शुरू कर देते हैं। जरा-सी बात पर हमारे अंदर का पशु क्रोध के रूप में सामने आ जाता है।

क्रोध के कारण

हमारे अंदर क्रोध का कारण शारीरिक, जैविक, परिवेश, संस्कार, दृष्टिकोण आदि हो सकता है। चिड़चिड़ाना, रोना, कड़वे वचन बोलना, कुंठा, हिंसा, ईष्र्या, द्वेष आदि के रूप में भी क्रोध की अभिव्यक्ति होती है। क्रोध के समय हम इतने व्यथित हो जाते हैं कि इससे बचने के बजाय उसमें ही उलझ जाते हैं। अधिकतर लोग क्रोध के बाद क्रोध के औचित्य को ही सिद्ध नहीं करते हैं, बल्कि अपने कुतर्क से इसके लिए दूसरों को उत्तरदायी भी ठहराते हैं।

अध्यात्म है क्रोध की औषधि

यदि व्यक्ति साधना और ध्यान का निरंतर अभ्यास करता है, तो वह जान पाता है कि उसे क्रोध क्यों आता है। वह समझ जाता है कि वह स्वयं ही क्रोध का कारण है। अध्यात्म से जुड़ा व्यक्ति निरंतर अभ्यास करता है, जिससे वह क्रोध से बच सके। निरंतर अभ्यास से मन शांत होने लगता है और बड़ी-बड़ी समस्याएं विवेकपूर्ण ढंग से सुलझा लेता है। निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ जाती है।

ऊर्जा परिवर्तित करना

आध्यात्मिक व्यक्ति अपने प्रति सजग हो जाता है। क्रोध का उत्तर वह क्रोध से नहीं देता। जब सामने वाले को जताया जाए कि उसकी बात पर आप न तो क्रोधित हैं और न ही उसकी बात का बुरा माना है, तो आप महसूस करेंगे कि वह न केवल शांत हो जाएगा, बल्कि शर्मिंदगी भी महसूस करेगा। व्यक्ति यदि चाहे, तो अपनी क्रोध की ऋणात्मक ऊर्जा को सकारात्मकता की ओर ले जा सकता है। सकारात्मक ऊर्जा के साथ व्यक्ति उचित निर्णय लेने की स्थिति में पहुंच जाता है। सच तो यह है कि क्रोध की ऋणात्मक ऊर्जा तर्क-कुतर्क करती है, जबकि सकारात्मक ऊर्जा जीवन को एक नया आयाम देती है।

-डॉ. सुरजीत सिंह गांधी

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