२८ की रात और कार्तिक का पहला ट्रेन का सफर :- २८ की रात को मैनपुरी स्टेशन से कालंदी एक्सप्रेस की S1 में सामान लगाने के बाद जब अपने ३ साल के बेटे कार्तिक से मुखातिब हुआ तो पता चला कि साहबजादे ने अपनी माताजी और दादी से सिफारिश की है कि
मुझे सुलाना नहीं ...... यह कार्तिक का पहला ट्रेन
का सफर था और उसमे भी इस सफर को ले कर काफ़ी उत्साह था ! खैर साहब, ट्रेन समय से चली और कार्तिक का पहला ट्रेन का सफर शुरू हुआ ! पूरे मूड में थे जनाब
, अपनी हर उस अदा का प्रदर्शन करते हुए जो हम सब को उनका दीवाना बनाए हुए
है ! लगभग २ घंटे तक खेलने के बाद थकन और नीद का मिलाजुला असर हुआ कार्तिक पर और उन्हें अपनी आरामगाह -
माँ की गोद - की याद आई, और थोडी ही देर में कार्तिक सो गए पर ट्रेन चलती
रही अपनी मंजिल की ओर !
२९ की सुबह दिल्ली की २९ की सुबह ६:३० पर पुरानी दिल्ली स्टेशन पर उतरना हुआ ! समान थोड़ा ज्यादा था सो एक कुली लिया गया और स्टेशन के पास बने
CUMSOME पर इंतज़ार करने लगे टैक्सी लिए जो मेरे भाई अनुज ने भेजी थी हमे घर तक लाने लिए !
टैक्सी का ड्राईवर -
नरेशथोडी देर के इंतज़ार के बाद टैक्सी आ गई .... एक २४-२५ साल का
बन्दा... सफ़ेद युनिफोर्म में .... एक मुस्कान के साथ मेरे पास आया और परिचय दिया,"सर, मैं
नरेश हूँ ....आपको घर ले जाने के लिए अनुज जी ने मुझे ही बोला है|"कुछ देर
चलने के बाद उससे पुछा,"कहाँ के हो ?"....... जवाब आया," जी सर ...... हिमाचल के एक छोटे से गाँव का हूँ |"
"यहाँ कब से हो ?"
"जी ... ६ साल से !"
"टैक्सी ही चलते हो शुरू से ?"
"नहीं सर !!" - पहली बार उसकी आवाज़ कुछ तेज़ और तीखी लगी !
"तो !?"
"यहाँ पढने आया था !!" - अब की बार आवाज़ में तल्खी की जगह कुछ अफ़सोस था !!
" तो पढ़े फ़िर ??"
"हाँ
पढ़ा पर कोई नौकरी नहीं मिली..!!"
आगे सब कुछ समझा हुआ था सो मैं चुप ही रहा !!बधाई अनुज और नेहा को
२९ और ३० दोनों दिन काफ़ी भागा भागी रही ३१ की तैयारी को ले कर ! आख़िर ३१ हमारे
अनुज का एक ख़ास दिन जो था .....
न केवल ३१ की शाम को उसकी सगाई होनी थी बल्कि ३१ को उसका जन्मदिन भी था | ३० की देर रात से ही घर में गाने बाजने का माहौल बना हुआ था ...१२ बजते बजते सब ने खूब धमाल किया | सब से ज्यादा अगर किसी ने मस्ती की होगी तो वह की होगी अनुज की दोनों भाभीयों ने .....एक तो मेरी पत्नी
जया और दूसरी अनुज के बड़े भाई
आशीष की पत्नी
स्वाति ! दोनों ने ही अपने देवर के इस ख़ास दिन को और भी खास बनने में कोई कसर नहीं छोड़ी ! वैसे हम सब का तो एक ही स्वर में यहीं कहना है,
" अनुज और नेहा - बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !"क्या ब्लू लाइन - क्या ग्रीन लाइन, अपनी तो गई होती लाइफ लाइन जी हाँ , दिल्ली में हमारी लाइफ लाइन कट गई होती, हुआ यूँ कि १ तारीख को हम को विकासपुरी जाना था अपनी बुआजी के घर ....बड़े भाई साहब,
विक्रम, आए हुए थे अपनी गाड़ी ले कर | सो हम सब चल दिए उनके साथ....रास्ते में
गाड़ी में लगे शीशे में विक्रम भाई को पीछे से आती एक ग्रीन लाइन बस दिखी ...जो बड़ी तेज़ी से ओवर टेक करने की फिराक में थी ........बस को रास्ता दे दिया गया ........पर यह क्या !!!!!!!!!! बस तो जैसे गाड़ी
के ऊपर ही आ रही
थी..... जैसे तैसे गाड़ी को किनारे किया गया ........बस कुछ इस तरह चिडाते हुए चली गई जैसे कह रही हो, " बच गया आज तो ....फ़िर मिला तो देख लूगी !!" बस के गुज़र जाने के बाद जब विक्रम भाई की तरफ़ देखा तो पाया कि गाड़ी उन्होंने नहीं रोकी थी बल्कि मेट्रो ट्रेन के पुल के खंभे
के सहारे से रुकी थी ! अब सोचता हूँ कि अगर बस अपने रास्ते न जा हमारी गाड़ी पर आई होती तो क्या होता ?? बहुत सुना था दिल्ली कि बसों के बारे में देख भी लिया !!
जिन को मालूम न हो उन्हें बता दू यह ग्रीन लाइन बस ही पहले ब्लू लाइन के नाम से जानी जाती थी !! कलकत्ता की मेट्रो के बाद अब दिल्ली की मेट्रो
बस वाले हादसे से हिले हुए हम सब जब घर पहुचे तो पाया हमारी
लीना भाभी गरमा गरम चाय और समोसों के साथ हमारा इंतज़ार कर रही थीं ! चाय की चुस्कियों के बीच उनको पूरा किस्सा सुनाया गया और चटनी के चटकारो के
साथ समोसों का आनंद ले इस घटना को भूलाया भी गया ! शाम हो चुकी थी और अगले ही दिन हमारी वापसी भी थी सो प्रोग्राम बना
"इंडिया गेट" जाने का पर अब की बार दिल्ली की मेट्रो की सवारी तय की गई ! मेट्रो का नाम सुन हमारी माता जी ने पैर .......ओह्ह्ह माफ़ कीजियेगा हाथ खड़े कर दिए ....दरअसल कलकत्ता में
१९९७ तक रहने के कारण उनका मेट्रो की लम्बी लम्बी सीढियों से बहुत बार सामना हुआ है !
यहाँ यह बताता चलू कि मेट्रो भारत में सब से पहले कलकत्ता में ही चली थी सन १९८४ के २४ अक्टूबर को भवानीपुर से एस्प्लानादे तक ५ स्टेशन के दरमियां | खैर साहब, खूब आनंद आया दिल्ली की मेट्रो
में इंडिया गेट तक गए और फ़िर लौटे ! कार्तिक को इस बीच हमारी लाडली भतीजी
श्रृष्टि का साथ मिल गया था सो वे भी मगन थे अपनी छोटी बहन के साथ !
एक साथ "
चारो धाम" :- एक शाम "इंडिया गेट" के नाम
इंडिया गेट - क्या कहू इस के बारे में ..... क्या है यह .....कभी सोचा आपने ??
मैंने सोचा .......और पाया मेरे लिए इसके दर्शन करना एसा है मानो मैंने चारो धाम एक साथ कर लिए
हो !! क्या आप किसी भी एक एसी और
जगह के बारे में जानते है ?? क्या हिंदू , क्या मुसलमान, क्या सिख, क्या ईसाई , या कोई
भी धर्मं मानने वाला क्यों न
हो ......कौन होगा जो यहाँ अपना शीश झुकाना न चाहे .....कौन जाने कितने लोगो की याद में बना है यह
"इंडिया गेट" पर उन सब में एक ही समानता .......सब के सब शहीद हो गए अपने वतन के लिए ........हमारे लिए .....हमारे बच्चो के लिए ..... यूँ कहे हमारी आगे आने वाली पढ़ियो के लिए ! क्या उनका कोई नहीं था ....उनके भी तो बच्चे रहे होगे.....हो सके तो एक बार उनकी जगह अपने आप को रख कर सोचियेगा ... हिल जायेगे आप अंदर तक .......अपने बिना अपने परिवार की कल्पना करना आसान नहीं !!
पर कोई था जिसने यह सब जानते हुए भी अपना सब कुछ बलिदान कर दिया ताकि हमे यह कल्पना न करनी पड़े!
इस लिए मेरे लिए
"इंडिया गेट" किसी भी पूजा स्थल से कम नहीं......और इस लिए मैं गया वहाँ सपरिवार मत्था टेकने !
अपने परिवार की और अपनी ओर से उन सब शहीदों को मेरा शत शत नमन |
दिल्ली में बिताये हुए वह आखिरी कुछ घंटे 
२ तारीख को रात १० बजे फ़िर कालंदी पकड़नी थी मैनपुरी वापसी के
लिए सो यह तय किया गया कि दोपहर के खाने के बाद ही कहीं जायेगे | खाने के बाद राजोरी गार्डन जाने का प्रोग्राम बना श्रीमती जी को कुछ खरीदारी करनी थी अपनी जेठानी जी के संग मिल कर ....तो साहब निकल लिए हम सब पर अब की बारी भाई साहब की गाड़ी
से |
वहाँ पहुँच मॉल्स में खरीदारी और हवाखोरी का दौर चला | कार्तिक और श्रृष्टि, दोनों अपनी अपनी नीद ले चुके थे सो दोनों मस्ती कर रहे थे | वहाँ मॉल्स में मौजूद विभिन्न राइड्स और गमेस का दोनों ही बच्चो ने भरपूर आनंद लिया,
खासकर कार्तिक ने ! वहाँ से हम सब शाम ६:
३० - ७:०० तक लौटे और फ़िर झटपट पैकिंग निबटा खाने का लुत्फ़ लिया गया | टैक्सी भी टाइम से आ गई थी ... गुरु पर्व होने के नाते जाम से बचने में ही भलाई
दिखी सो ८ बजे तक विक्रम भइया और लीना भाभी से विदा ले घर से स्टेशन के लिए निकल पड़े |
अविनाश भाई और अजय भाई का गुनहगार हूँ२९ की शाम को ही अविनाश वाचस्पति और अजय कुमार झा से फ़ोन पर बात की कि हम तेरे शहर में आए है मुसाफिर की तरह, एक मुलाकात का मौका दे दे ....
दोनों तैयार और हम भी पर ................
आखिर तक यह मुलाकात न हो सकी !
कुछ तो हम इतने व्यस्त रहे अपने कामों में और कुछ दिल्ली में एक जगह से दूसरी जगह की दूरी इतनी ज्यादा कि हम जैसा मैनपुरी वासी निकल ही नहीं पाया | खैर,
यह सब तो बातें है ...
मैं सच में बेहद शर्मिंदा हूँ कि दिल्ली में होते हुए भी आप दोनों से मिल नहीं पाया !
अगली बार जरूर जरूर मिलना होगा एसा यकीं है | इस बार के लिए आप दोनों से ही माफ़ी की उम्मीद करता हूँ !
तो साहब, यह थी मेरी दिल्ली यात्रा - एक बेहद सुखद और यादगार यात्रा !!
और हाँ मुझे जवाब भी मिल गया है अपने उस सवाल का जो मेरे जहेन में था दिल्ली जाने से पहले - अपने ब्लॉग से दूर कैसा लगता है ??
बहुत बुरा लगता है भाई बहुत बुरा लगता है मानो किसी ने जुबान ही काट डाली हो ....अपने दिल की बात तो आजकल ब्लॉग के मध्यम से ही करी जाती है न !!