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शनिवार, 6 अगस्त 2016

पापा की दूसरी पुण्यतिथि

 
सुना था ... जिस लम्हा आप किसी अपने को हमेशा के लिए खो देते है ठीक उसी पल आपको एक नया भगवान मिल जाता है ... जिस का हाथ आपके सर पर हमेशा रहता है...
 
 
२ साल पहले आज ही के दिन ... मुझे मेरे भगवान मिले थे ... :(
 
पर ... वे तो हमेशा ही मेरे भगवान रहे थे ... 
 

"आप के द्वारा 'शिव' को समर्पित मैं ,

आज स्वंय 'शिवम्' हुए जाता हूँ ;

आप के वियोग का हलाहल ,

अपने जीवन में धारण किए जाता हूँ ॥"

2 टिप्‍पणियां:

  1. धैर्य जरूरी है। जीवन चक्र यही है। ईश्वर के पास बैठे लोग अपनों को देखते रहते हैं । नमन ।

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  2. सादर नमन और श्रद्धांजलि!

    उत्तर देंहटाएं

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