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मंगलवार, 3 नवंबर 2009

शायद इसी को घर लौटना कहते है !!

सभी ब्लॉगर मित्रों को प्रणाम !

आज सुबह ४ बजे मैनपुरी स्टेशन पर जब कलान्दी आ कर रुकी, तब यु लगा जैसे कितने सालो के बाद मैं अपने देश वापस लौटा हूँ ........हर एक आदमी अपना सा लगा, रोज़ जिन सडको की भीड़ मुझे परेशान करती थी.... उन्ही सड़को पर छाया भोर का सन्नाटा मुझे आज परेशान कर रहा था....क्यों खोज रहा था मैं किसी एसे को जो मुझे देखते ही बोले,"आ गए शिवम् !!" क्यों चाह रहा था मैं कि कोई साइकिल वाला या रिक्शा वाला मेरी गाड़ी के ड्राईवर को तेज़ चलने पर कुछ सुना दे ....क्यों थी यह ललक एक अदना से वार्तालाप की..............क्यों ???.............. शायद इसी को घर लौटना कहते है !!

8 टिप्‍पणियां:

  1. haaan! isey hi ghar lautna kahte hain ....Shivam ji.....

    Aapka swaagat hai.........

    Hum to aapko bahut miss kar rahe they.....

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  2. हाँ शायद इसी को...घर लौटना कहते हैं.

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  3. भिलकुल ऐसी ही अनुभूती मुझे भी हुई थी जब हम तीन साल बाद कुवैत से लौटे थे लग रहा था जैसे सडक पर चलने वाला हर शख्स मेरा रिश्तेदार है । इसी को घर लौटना कहते हैं ।

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  4. सही लिखा...इसी को कहते है घर लौटना...

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  5. हा इसी को कहते है घर लोटना.... जब सब अपने लगे, दिल शोर मचाने को करे... बहुत सुंदर.
    धन्यवाद

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  6. घर लौटने का यह अहसास बहुत ही सुखद होता है । मुझे शरद बिल्लोरे की एक् कविता याद आती है " हम नौकरी करने घर से बाहर निकलते है/ और फिर कभी घर लौट नही पाते

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  7. बधाई हो जी!
    अब आपकी पोस्ट नियमित पढ़ने को मिलेंगी!

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