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गुरुवार, 8 अक्तूबर 2009

तराशते हैं लक्ष्मी फिर भी मुफलिस


आगरा के प्रजापति समाज की कई बस्तियां, जहां इन दिनों दीपावली पर उजियारा और समृद्धि फैलाने के लिए दिन-रात सैकड़ों हाथ जुटे हुए हैं। ये हाथ कहीं मिंट्टी के दीपक बना रहे हैं, तो कहीं लक्ष्मी-गणेश प्रतिमाएं। लक्ष्मी की प्रतिमा को आकार देने वाले ये शिल्पकार आज भी मुफलिसी में जी रहे हैं। लोहामंडी में दो सौ, नामनेर और छिलीईंट घटिया में सौ-सौ परिवार इस शिल्प से पीढि़यों से जुड़े हैं। दीपावली के महापर्व की तैयारियों में यहां लक्ष्मी, गणेश के साथ सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनायी जा चुकी हैं, अब उन्हें दिया जा रहा है अंतिम रूप। सिरकी मंडी में प्रतिमा बना रहे प्रेमचंद बताते हैं कि यहां दीपावली से कई महीने पहले लक्ष्मी व गणेश और गणेशोत्सव से पूर्व गणपति की प्रतिमाएं बननी शुरू हो जाती हैं।
शिल्पकार ब्रह्मानंद का कहना था कि यहां दीपावली पर कई करोड़ का व्यापार होता है। यहां से मूर्तियां दिल्ली, जयपुर, मुंबई सहित तमाम महानगरों में जाती हैं। कोलकाता और लखनऊ की मूर्तियों में सुंदरता अधिक होती है, जबकि आगरा में तादाद।
वे बताते हैं कि पहले मूर्तियां सादी ही पसंद की जाती थीं, अब कपड़े की पोशाक, मोतियों की माला, मुकुट यहां तक कि गणेशजी को धागे का जनेऊ भी पहनाया जाता है। मूर्तियां तो जमाने के मुताबिक बदल गई हैं लेकिन उनकी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। तकनीक भी पुरानी ही चल रही है। मूर्ति बना रहे ताराचंद का कहना था कि उनकी कई पीढि़यां इस काम को कर रही हैं। शासन-प्रशासन उनकी परवाह नहीं करता। उन्हें सुविधायें मिलें तो तरक्की हो सकती है। शिल्पियों का कहना है कि उनकी मेहनत का लाभ विक्रेताओं को मिलता है। उन्हें तो मजदूरी भी नहीं मिल पाती।
पिछले दो साल से यहां साईं बाबा की प्रतिमा की मांग बढ़ी है। इनकी मूर्तियां भी बड़ी संख्या में बन रही हैं। तीन पीढि़यों से मिट्टी के दीपक बना रहे 45 वर्षीय पूरन बताते हैं कि उनके किसी बच्चे ने चाक चलाना नहीं सीखा। पूरे दिन चाक पर काम करने के बाद भी 50 रुपए नहीं मिलते। अत: अब उनके परिवार में कोई चाक नहीं चलायेगा। वे प्लास्टर आफ पेरिस की ही मूर्तियां बनाएंगे।
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कुम्हार की चाक की रफ्तार धीमी


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