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सोमवार, 7 सितंबर 2009

..महापुरुष-महापुरुष में ज्यादा फर्क नहीं होता


उस दिन मंत्री जी को एक महापुरुष की स्मृति में भाषण देना था, लेकिन ऐन वक्त पर उन्हे याद आया कि पी.ए. से भाषण तैयार कराना तो भूल ही गये। समस्या पी.ए. को बताई। पी.ए. ने कहा- 'कोई बात नहीं सर, हालांकि उन महापुरुष के बारे में जानकारी तो मुझे भी कुछ नहीं है, लेकिन महापुरुष-महापुरुष में ज्यादा फर्क नहीं होता।' मंत्री जी की कुछ समझ में नहीं आया। पी.ए. बोला, 'चिंता मत कीजिए, सर, मैं अभी उन महापुरुष के बारे में जोरदार भाषण तैयार कर देता हूं। क्या नाम बताया था आपने उनका! हां, राधेश्याम जी। अभी तैयार हो जायेगा भाषण।'

पी.ए. द्वारा तैयार भाषण जब मंत्री जी ने पढ़ा तो जोरदार तालियों से उसे भरपूर प्रशंसा मिली। भाषण इस प्रकार था- ''भाइयों और बहनों! मुझसे आग्रह किया गया है कि मैं राधेश्याम जी की स्मृति में कुछ कहूं। लेकिन मैं उनके बारे में क्या कह सकता हूं? उनके बारे में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाना है। लेकिन फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि ऐसी महान आत्माएं रोज-रोज पैदा नहीं होतीं। उन्होंने अपना सारा जीवन देश-समाज के लिये समर्पित कर दिया। उन्होंने जीवन में पग-पग पर कष्ट सहे, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। सत्य के लिये जिये, सत्य के लिये मरे। उन्होंने कभी अपने सुख-चैन की परवाह नहीं की। जहां किसी की आंख में आंसू दिखे, उनका कोमल हृदय द्रवित हो उठा। वे सबको साथ लेकर चलने वालों में थे लेकिन सिद्धांतों की कीमत पर नहीं। उन्हे सर कटाना मंजूर था, सर झुकाना नहीं। स्वाभिमान उनके अंदर कूट-कूटकर भरा था, वे जमीन से जुड़े आदमी थे। वे किसी इंसान को छोटा नहीं समझते थे। उन्होंने गरीब, बेसहारा, दबे-कुचले लोगों को हमेशा गले से लगाया। वे अहिंसा के पुजारी थे, राष्ट्र के नायक थे, बात के धनी थे, सत्य के पुजारी थे। देश को आज ऐसे ही महापुरुषों की जरूरत है जो उनके दिखाये रास्ते पर चलकर देश और समाज का भला कर सकें। उनके असमय चले जाने से राष्ट्र को अपूर्णनीय क्षति हुई है, जिसकी भरपाई असंभव नहीं तो भी मुश्किल जरूर है। यादें तो बहुत आ रही है, किन्तु समय के अभाव में अपनी बात को यहीं विराम देता हूं। जय हिंद।''

तालियों की गड़गड़ाहट थमने तथा कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उपस्थित पत्रकारों ने मंत्री जी से कुछ सवाल पूछे।

पहला पत्रकार- 'मंत्री जी, जोरदार भाषण के लिये बधाई! लेकिन आपने कहा कि राधेश्याम जी अहिंसावादी थे, जबकि वे तो क्रांतिकारियों के समर्थक माने जाते थे।'

दूसरा पत्रकार- 'आपने कहा कि राधेश्याम जी असमय चले गये, जबकि वे तो 75 वर्ष के वृद्ध थे।'

तीसरा पत्रकार- 'आपने कहा कि राधेश्याम जी सिद्धांतों के पक्के थे लेकिन उन्होंने तो चार बार दलबदल किया।'

चौथा पत्रकार- 'आपने कहा वे स्वाभिमानी थे, लेकिन वो तो जुगाड़ के बल पर हर सरकार में मंत्री पद हासिल कर लेते थे।'

मंत्री जी थोड़ा सकपकाये और पी.ए. के कान में फुसफुसाए, 'अरे क्या-क्या बुलवा दिया मुझसे, किस कम्बख्त की स्मृति में यह आयोजन था?' पी.ए. ने बात सम्हालने का आश्वासन मंत्री जी को दिया और पत्रकारों से बोला, 'देखिये, मंत्री जी को आवश्यक मीटिंग में जाना है, आप सभी अपने प्रश्न लिखकर दे दीजिये। प्रेस-विज्ञप्ति में सबके उत्तार दे दिये जायेंगे।'

प्रेस-विज्ञप्ति, जिसे खुद पी.ए. ने ही तैयार किया, में दिये गये जवाब इस प्रकार थे-

1. क्रांतिकारियों का समर्थन उनके भावुक हृदय को दर्शाता है लेकिन सिद्धांतत: वे पक्के गांधीवादी थे। वे कभी किसी हिंसक गतिविधि में लिप्त नहीं रहे, जो उनके अहिंसावादी होने का अकाट्य प्रमाण है।

2. वे असमय चले गये, अन्यथा राजनीति में 75 वर्ष की उम्र होती ही क्या है? वे अनुभव का खजाना थे। वे अपने सपने अधूरे छोड़ गये। कुछ समय और जीते तो क्रांति ला सकते थे।

3. उन्होंने दलबदल अवश्य किया लेकिन अपने सिद्धांतों की खातिर। उन्होंने अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा, बल्कि जिस दल ने अपने सिद्धांत छोड़े, राधेश्याम जी ने ही उन दलों को लात मार दी।

4. वे हर सरकार में मंत्री जुगाड़ से नहीं अपनी योग्यता और प्रतिभा के बल पर बनते थे, क्योंकि कोई भी सरकार उनकी विलक्षण प्रतिभा से वंचित नहीं रहना चाहती थी।

प्रेस-विज्ञप्ति पढ़कर सभी पत्रकार एक-दूसरे का मुंह देखकर पहले मुस्कराये और फिर पूरा माहौल उपहासात्मक खिलखिलाहटों से गूंज उठा।

1 टिप्पणी:

  1. क्या बात है शिवम जी. इतना तीखा व्यंग्य!बेहद सधी हुई और सीधे चोट करने वाली भाषा. सच है नेताओं का यही सच है. बधाई. जागरण में "बुरा-भला" की चर्चा हुई इसके लिये भी बहुत-बहुत बधाई.

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