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बुधवार, 2 सितंबर 2009

एक विनती .... भारत से एक भारतीय की



कहीं पढ़ा तो सोचा आपको भी पढ़ा दूँ .......
चाँद अकेला तारे गायब
रातों रात नजारे गायब



यूं तो थे हमदर्द हजारों
वक़्त पडा तो सारे गायब



महफ़िल में तो बेहद रौनक
हम किस्मत के मारे गायब



संदेशों की आवाजाही
कैसे हो हरकारे गायब



इस नैया का कौन खिवैया
लहरें तेज़ किनारे गायब



मनमोहन ने मोहा मन को
अब मनमोहक नारे गायब



बलिदानों की बारी आयी
जितने नाम पुकारे गायब



"भरत" तू कर्मवीर बन
वचन-वीर तो सारे गायब


1 टिप्पणी:

  1. बलिदानों की बारी आयी
    जितने नाम पुकारे गायब

    "भरत" तू कर्मवीर बन
    वचन-वीर तो सारे गायब

    बहुत अच्छा लगा पढ़ कर.

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