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शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

उत्तर प्रदेश में बसपा विधायकों की शिकायतों के आधार पर उनके क्षेत्र के दरोगाओं और थानाध्यक्षों के तबादले की व्यवस्था

यह संभव है कि उत्तर प्रदेश में बसपा विधायकों की शिकायतों के आधार पर उनके क्षेत्र के दरोगाओं और थानाध्यक्षों के तबादले की व्यवस्था से सत्तारूढ़ विधायक संतुष्ट हो जाएं, लेकिन इससे पुलिस तंत्र अव्यवस्थित हो सकता है। यह निराशाजनक है कि बसपा विधायकों की शिकायतों के आधार पर दरोगाओं और थानाध्यक्षों के तबादलों का सिलसिला शुरू भी कर दिया गया। यह ठीक है कि विधायकों की सिफारिशों और शिकायतों की अनदेखी नहीं की जा सकती, लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं हो सकता कि वे परोक्ष रूप से थानाध्यक्षों और दरोगाओं का तबादला कराने में सक्षम हो जाएं। प्रश्न यह भी है कि थानाध्यक्षों और दरोगाओं के तबादलों के संदर्भ में जैसे अधिक बसपा विधायकों को अलिखित रूप से प्रदान कर दिए गए वैसे अन्य दलों के विधायकों को क्यों नहीं दिए जा सकते? निश्चित रूप से कानून एवं व्यवस्था के मामले में पुलिस तंत्र के निचले स्तर के अधिकारियों के कामकाज के बारे में जन प्रतिनिधियों की सुनवाई होनी ही चाहिए, लेकिन ऐसी भी कोई व्यवस्था बननी चाहिए जिससे यह पता चल सके कि विधायकों की शिकायत सही है या नहीं?

यदि यह सोचा जा रहा है कि थानाध्यक्षों और दरोगाओं के तबादलों के संदर्भ में जो नई व्यवस्था की जा रही है उससे कानून एवं व्यवस्था में सुधार होगा तो यह सही नहीं। राज्य सरकार की इस नई व्यवस्था से तो थानाध्यक्षों और दरोगाओं के समक्ष बसपा विधायकों को खुश रखना अनिवार्य हो जाएगा। इसका परिणाम यह भी हो सकता है कि विधायक थानाध्यक्षों के जरिए मनमानी करने लगें। दोनों ही स्थितियां पुलिस के कामकाज में सुधार लाने का उद्देश्य पूरा नहीं होने देंगी। उत्तर प्रदेश का पुलिस तंत्र पहले ही राजनीतिक हस्तक्षेप से त्रस्त है। एक ऐसे समय जब पुलिस को राजनेताओं के दखल से मुक्त बनाने की आवश्यकता थी तब ठीक इसके विपरीत निर्णय लिया गया। पता नहीं क्यो राज्य सरकार पुलिस के ढांचे में ही ऐसी किसी व्यवस्था का निर्माण क्यों नहीं कर पा रही है जिससे थानाध्यक्षों और दरोगाओं के कामकाज पर निगाह रखी जा सके? थानाध्यक्षों और दरोगाओं के तबादले का अधिकार परोक्ष रूप से बसपा विधायकों को सौंपने का निर्णय तो यही सिद्ध करता है कि पुलिस का अपना तंत्र इन अधिकारियों की निगरानी करने में सक्षम नहीं।

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