मुख्यमंत्री मायावती के इस कथन पर विश्वास किया जा सकता है कि सरकारी अस्पतालों में दवाएं उपलब्ध कराने के लिए धन की कोई कमी नहीं है, लेकिन इसमें संदेह है कि चिकित्सक उनकी इस चेतावनी को गंभीरता से लेंगे कि गरीबों को सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा उपलब्ध कराने में कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संदेह इसलिए है, क्योंकि विगत में सरकारी स्वास्थ्य ढांचे को दुरुस्त करने और अस्पतालों में चिकित्सकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर जो भी घोषणाएं की गईं वे कुल मिलाकर निरर्थक ही साबित हुईं। सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा दिन-प्रतिदिन जर्जर होता जा रहा है। यह उतना ही जर्जर है जितना पिछली सरकार के समय था। इसके एक नहीं अनेक प्रमाण सामने आ चुके हैं, लेकिन समस्या यह है कि सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की बुनियादी खामियों को दूर करने के लिए किसी भी स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि एक ओर राज्य सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि अस्पतालों में दवाओं के लिए धन की कोई कमी नहीं है और दूसरी ओर आम जनता का अनुभव यह बताता है कि दवाओं की बात तो दूर, अस्पतालों में उसे चिकित्सक और अन्य सहयोगी कर्मचारी भी उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।
राज्य सरकार यद्यपि इस तथ्य से अवगत है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों के साथ-साथ अन्य कर्मियों के बड़े पैमाने पर पद रिक्त हैं, लेकिन उन्हें भरने के लिए कहीं कोई तत्परता प्रदर्शित नहीं की जा रही है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ घर-घर तक पहुंचाने का जो निर्देश दिया उसके पालन की दूर-दूर तक संभावना नहीं नजर आती। सच तो यह है कि मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता। यह ठीक है कि इस वर्ष चिकित्सा-स्वास्थ्य सेवाओं के बजट में वृद्धि की गई है, लेकिन जब तक इसका सदुपयोग नहीं सुनिश्चित किया जाता तब तक इस वृद्धि का कोई मतलब नहीं। वास्तव में चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर सुधारने के लिए धन कोई समस्या है भी नहीं, बल्कि इसके लिए तो दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

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