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शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

नन्हें-मुन्हें बच्चे या खतरों के खिलाड़ी ??



स्कूली रिक्शों व वाहनों में खचाखच भर कर स्कूल जाने वाले इन बच्चों को खतरों का खिलाड़ी कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिन्हें देख अनायास ही हर किसी के मुंह से उफ निकलता है कि इन नन्हे मुन्हें बच्चों के साथ कहीं कोई अनहोनी घटना न घट जाये। ऐसा नजारा हर रोज स्कूली बच्चों के स्कूल आते जाते समय देखा जा सकता है।

स्कूल की छुट्टी होते ही इन नन्हें-मुन्हें बच्चों को स्कूली रिक्शों में ढूंस-ढूंस कर भर दिया जाता है। कुछ बच्चे तो रिक्शे पर आगे की ओर एक तख्ती पर बैठा दिये जाते हैं व सामने लगे एंगिल को पकड़ कर बैठे यह बच्चे अगर दचकी या ठोकर लगते ही नीचे सरक जाये व गिरकर घायल हो जाये तो कोई बड़ी बात नहीं है। वहीं स्कूली वाहनों पर भी जाने वाले बच्चों का यही हाल है। बच्चे वाहनों में लटक कर घर से स्कूल व स्कूल से घर का रास्ता तय करते हैं। इन्हें देख ऐसा ही लगता है जैसे यह स्कूली बच्चे नहीं बल्कि सर्कस के कलाकार हैं जो चलते वाहन से बाहर की ओर लटक कर करतब दिखा रहे हैं।

लेकिन इन बच्चों की जानमाल की सुरक्षा हेतु न तो विद्यालय प्रशासन जिम्मेदारी पूर्ण रवैया अपना रहा है, न अभिभावकों को इस बात की चिंता है। हद तो देखिए इन स्कूली बच्चों पर अब तक प्रशासन की नजर भी नहीं पड़ी है। जो ऐसे विद्यालयों के विरूद्ध कार्रवाई करें। जिनके रिक्शे व वाहन क्षमता से अधिक बच्चे ढोने का काम करते हैं जैसे यह बच्चे नहीं बल्कि सब्जी तरकारी या कोई सामान हो जो गिर भी जाये तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। यदि प्रशासन ने सख्त कदम नहीं उठाये तो किसी भी दिन इन स्कूली बच्चों के साथ कोई अनहोनी घटना घट सकती है।

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