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बुधवार, 22 जुलाई 2009

कसाब का कबूलनामा -- सज़ा में अब देर क्यों ??





मुंबई को रक्तरंजित और भारतीय मान-सम्मान को धूल-धूसरित करने वाले पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब द्वारा अप्रत्याशित रूप से अपने अपराध की स्वीकारोक्ति करने पर हैरत होना स्वाभाविक है, लेकिन बेहतर यह होगा कि उसे सजा सुनाने की प्रक्रिया को गति प्रदान की जाए। हो सकता है कि कसाब की स्वीकारोक्ति के पीछे कुछ खास कारण हों, लेकिन उनकी तह तक जाने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। इसलिए नहीं है, क्योंकि इसमें रंचमात्र भी संदेह नहीं कि उसने अपने नौ साथियों के साथ मुंबई में लाशों के ढेर लगाए। चूंकि वह एक तरह से रंगे हाथों पकड़ा गया था इसलिए किसी भी तकनीकी आधार पर उसके मामले को लंबा खींचने का कहीं कोई औचित्य नहीं। वैसे भी उसके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने और फिर सुनवाई शुरू होने में आवश्यकता से अधिक विलंब हुआ। कम से कम इस मामले में तो एक दिन की भी देरी नहीं होनी चाहिए थी। यह ठीक नहीं कि उसके मामले की सुनवाई एक सामान्य मुकदमे की तरह हो रही थी और यदि वह अचानक अपना अपराध स्वीकार नहीं करता तो संभवत: अभी अदालती कार्रवाई कुछ और महीनों तक जारी रहती। यह निराशाजनक है कि इस मामले की अब तक सुनवाई के दौरान कभी भी ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि कसाब को समय रहते सजा सुनाए जाने की पूरी तैयारी कर ली गई है। कसाब को सजा सुनाने के मामले में भारतीय प्रशासन और न्यायिक तंत्र को उन टिप्पणियों की कहीं कोई परवाह नहीं करनी चाहिए जो इस दुर्दात हत्यारे की ओर से अपने जघन्य कृत्य की स्वीकारोक्ति के बाद पाकिस्तान के विभिन्न अधिकारियों द्वारा की गई हैं। कम से कम पाकिस्तान के समक्ष तो यह साबित करने की कोई आवश्यकता नहीं कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया कितनी श्रेष्ठ है और कितनी नहीं?

यदि किन्हीं कारणों से कसाब को सजा सुनाने में और अधिक देरी होती है तो इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ नहीं हो सकता। यह लगभग तय है कि कसाब को मृत्युदंड की सजा से कोई नहीं बचा सकता। देखना यह है कि उसे यह सजा कब मिलती है और उसके उपरांत उस पर अमल करने के मामले में शीघ्रता और प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया जाता है या नहीं? यह अंदेशा इसलिए, क्योंकि संसद पर हमले के दोषी आतंकी अफजल को मृत्युदंड देने के मामले में भारत सरकार की ओर से तरह-तरह के बहाने बनाए जा रहे हैं। कभी निर्धारित प्रक्रिया के पालन की दुहाई दी जाती है और कभी पिछली सरकार पर दोष मढ़ा जाता है। यदि कसाब के मामले में भी ऐसा होता है इससे अधिक शर्मनाक और क्या होगा? यदि भारत सरकार आतंकवाद से लड़ने के लिए तनिक भी प्रतिबद्ध है तो उसे न केवल यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संसद पर हमले के दोषी आतंकी को मृत्युदंड मिले, बल्कि यह भी कि कसाब को दंडित करने में और अधिक देरी न होने पाए। अब यह आवश्यक हो चुका है कि अफजल और कसाब सरीखे आतंकियों को सजा सुनाने तथा उस पर अमल करने की कोई विशेष व्यवस्था बने। जो देश आतंकियों को समय रहते सजा न दे सके और उन्हें दिए गए दंड पर अमल न कर सके वह आतंकवाद से लड़ने का दावा नहीं कर सकता।

2 टिप्‍पणियां:

  1. भाई अपने देश का कानून जो है वो अपने देश वालों के लिए ही है :):)

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  2. अनिल जी ,
    अपने देश का कानून तो राम जाने किसके लिए है क्युकी अपने देश के ही बहुत से घोटाले बाज़ नेता आज भी मज्जे से आजाद घूम रहे है | १०० में से २ - ४ केस ही एसे होगे जिन में किसी vip को सजा हुयी हो |

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