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बुधवार, 29 जुलाई 2009

रक्षा सौदों की लेटलतीफी

कैग अर्थात नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ओर से गोर्शकोव एयरक्राफ्ट कैरियर की खरीददारी पर सवाल खड़े करने के बाद संसद में इस सौदे पर चर्चा होना स्वाभाविक ही है, लेकिन यह समझ पाना कठिन है कि रक्षा सौदों में लेटलतीफी एवं अन्य अनियमितताओं का सिलसिला थम क्यों नहीं रहा है? ध्यान रहे कि कैग ने केवल गोर्शकोव की खरीददारी पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि स्कार्पीन पनडुब्बी सौदे में भी कई अनियमितताओं की ओर संकेत किए हैं। इस सौदे में तो कैग ने यहां तक पाया कि फ्रांसीसी कंपनी को अनुचित वित्तीय लाभ पहुंचाया गया। यह चिंताजनक है कि तमाम दावों और आश्वासनों के बावजूद रक्षा सौदे न तो समय पर हो पा रहे हैं और न ही अनियमितताओं पर विराम लग पा रहा है। इतना ही नहीं, रक्षा सौदों की खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता भी नहीं दिखाई दे रही है। रक्षा सौदों के विलंब से संपन्न होने की बीमारी कम होने के बजाय किस तरह बढ़ती जा रही है इसका ताजा उदाहरण है कैग का यह निष्कर्ष कि वायुसेना के लिए उन्नत प्रशिक्षण विमान खरीदने में बाइस साल खपा दिए गए। कैग की मानें तो विलंब से हासिल किए गए इन विमानों को इलेक्ट्रानिक हथियार प्रणाली से लैस करने में इतनी अधिक देरी कर दी गई कि उन्हें सामरिक प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सका। वर्ष दर वर्ष रक्षा सौदों के संदर्भ में कैग की ओर से जैसी रपटें पेश की जा रही हैं उससे इस निष्कर्ष के अलावा और कहीं नहीं पहुंचा जा सकता कि सैन्य सामग्री की खरीद प्रक्रिया में कहीं कोई सुधार नहीं हो रहा है। दुर्भाग्य से यह तब है जब सभी यह महसूस कर रहे हैं कि भारतीय सेनाओं का आधुनिकीकरण समय से पीछे चल रहा है। इसका एक अर्थ यह है कि सेना की आवश्यकताओं को समय रहते पूरा करने में कहीं कोई तत्परता नहीं प्रदर्शित की जा रही। यह स्थिति तो सैन्य तंत्र को कमजोर करने वाली ही है।

रक्षा सौदों की खरीद प्रक्रिया में खामियों का सिलसिला यह भी सिद्ध कर रहा है कि चाहे जिस दल की सरकार हो, कुछ चीजें कभी नहीं बदलतीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि रक्षा सौदों की खरीद प्रक्रिया इसलिए अनियमितताओं से ग्रस्त है, क्योंकि सुरक्षा से संबंधित मामला होने के कारण सब कुछ गोपनीयता के आवरण में ढका रहता है। नि:संदेह रक्षा संबंधी मामले सार्वजनिक नहीं किए जा सकते, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि गोपनीयता के आवरण में अनियमितताओं को संरक्षण प्रदान किया जाए। यह संभव है कि विभिन्न रक्षा सौदों में जिन अनियमितताओं का उल्लेख किया गया उनसे रक्षा मंत्रालय पूरी तौर पर सहमत न हो, लेकिन कोई यह भी दावा नहीं कर सकता कि रक्षा सौदे समय पर और सही तरीके से संपन्न हो रहे हैं। अब तो यह भी लगता है कि सरकारी तंत्र में कैग की रपटों की अनदेखी करने की प्रवृत्तिभी घर कर गई है। शायद ही कोई मंत्रालय हो जो कैग की रपटों की परवाह करता हो और उसके द्वारा रेखांकित की गई खामियों को दूर करने का प्रयास करता हो। कहीं ऐसा इसलिए तो नहीं कि इस संस्था का दायित्व खामियों का उल्लेख करना भर है न कि उन्हें दूर करना अथवा कराना। बेहतर यही होगा कि इस संस्था को कुछ ऐसे अधिकार प्रदान किए जाएं जिससे वह अनियमितताओं के लिए दोषी लोगों को कटघरे में खड़ा कर सके। यदि ऐसा कुछ नहीं किया जा सकता तो किसी भी क्षेत्र में अनियमितताओं को रोकना कठिन होगा।

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