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शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

श्रेय की सियासत

बेहतर कार्यो का श्रेय स्वयं लेने और गलतियों का दोषारोपण दूसरे पर करने की हमारी आदत सी बन गई है। कोई भी क्षेत्र हो, हर जगह यही नजर आ रहा है। हरिद्वार में वर्ष 2010 में आयोजित किये जाने वाले महाकुंभ को ही लीजिये, इसकी तैयारियां चल रही हैं। कुछ योजनाओं पर काम चल रहा है, कुछ का खाका तैयार किया जा रहा है और कुछ विचाराधीन हैं। विडंबना यह कि इस आयोजन की तैयारियों पर जितना ध्यान देना चाहिए, उतना ध्यान दिया नहीं जा रहा है, लेकिन कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच इस बात को लेकर सियासी तूफान खड़ा कर दिया गया है कि कौन सी योजनाएं किस पार्टी की सरकार की सहायता से संचालित की जा रही हैं। कांग्रेस सरकार ने इसके लिए कितना योगदान किया है और भारतीय जनता पार्टी की सरकार कितना योगदान कर रही है। कौन सी योजना किस पार्टी की मदद से संचालित की जा रही है। होड़ की इस राजनीति के चलते महाकुंभ मेले के लिए स्थायी प्रकृति के जो अनिवार्य कार्य हैं, वे तक अभी शुरू नहीं हो पाये हैं। यह स्थिति न केवल दुखद है बल्कि चिंतनीय भी। वस्तुत: पहले तो कार्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पृथक उत्तराखंड राज्य का यह पहला महाकुंभ होगा। हरिद्वार की भौगोलिक स्थिति से सभी वाकिफ हैं। तीर्थनगरी में स्थान सीमित है। कुंभ मेले में करोड़ों श्रद्धालुओं के आने का अनुमान है। इनके लिए व्यवस्थाएं तो करनी ही होंगी। व्यवस्था में थोड़ी सी भी खामी स्थिति को गंभीर बना सकती है। देश में अन्य स्थानों पर पहले हुए कई धार्मिक आयोजनों में जरा सी चूक भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न कर चुकी है और इसका खामियाजा श्रद्धालुओं को भुगतना पड़ा है। प्रयास यह होना चाहिए कि महाकुंभ आयोजन सकुशल निपटे और श्रद्धालु यहां की व्यवस्थाओं के बारे में अच्छा अनुभव लेकर जाएं। भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियों को इस आयोजन को लेकर चल रही होड़ लेने की सियासत पर यहीं विराम लगा देना चाहिए। उन्हें सर्वप्रथम इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि महाकुंभ आयोजन की सभी योजनाओं पर तत्काल कार्य शुरू हो और समय से पहले ही संपन्न हो ताकि अनुमानित आपात स्थिति के लिए भी सक्षम तैयारी की जा सके। दोनों ही पार्टियों को पहले काम पर ध्यान देना चाहिए। श्रेय लेने की राजनीति बाद में भी की जा सकती है।

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