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सोमवार, 20 जुलाई 2009

आयोगों के बहाने घटने दो सरकारी खजाने

मध्य प्रदेश के कथित गर्भ परीक्षण मामले में राज्य महिला आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग ने जिस तरह परस्पर विरोधी निष्कर्ष सामने रखे उससे इस तरह के आयोगों की निरर्थकता एक बार फिर उजागर हो गई। राज्य महिला आयोग की मानें तो मध्य प्रदेश में सामूहिक विवाह के दौरान गर्भ परीक्षण जैसी कोई घटना हुई ही नहीं, लेकिन राष्ट्रीय महिला आयोग इस नतीजे पर पहुंच रहा है कि ऐसे परीक्षण होने के आरोपों की पुष्टि होती है। आखिर देश की जनता किस आयोग के निष्कर्षो को सही माने? वह इस नतीजे पर क्यों न पहुंचे कि दोनों आयोगों ने संकीर्ण राजनीति से प्रेरित होकर कार्य किया और केंद्र एंवं राज्य में सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों की आकांक्षाओं की पूर्ति की? यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि मध्य प्रदेश में सामूहिक विवाह के आयोजन पर उभरे विवाद के मामले में किसी ने भी सच्चाई की तह तक जाने की जरूरत नहीं महसूस की, क्योंकि अब ऐसी भी बातें सामने आ रही हैं कि एक ओर जहां महिलाओं को सच सार्वजनिक करने से रोका गया वहीं उन्हें पैसे देकर झूठ बोलने के लिए प्रेरित किया गया। अब इस पर संदेह नहीं कि ऐसे आयोग उन उद्देश्यों की पूर्ति के अलावा और सब कुछ कर रहे हैं जिनके लिए उनका गठन किया गया है। यह पहला अवसर नहीं है जब किसी मामले में दो आयोग विपरीत निष्कर्षो पर पहुंचे हों। बात सिर्फ राज्य महिला आयोगों और राष्ट्रीय महिला आयोग की ही नहीं है, बल्कि अन्य अनेक आयोगों की भी है। भरोसे पर खरा न उतरने और संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थो की पूर्ति करने वाले आयोगों के दायरे में जांच आयोग भी आते हैं। अभी हाल में अयोध्या मामले की जांच करने वाले लिब्रहान आयोग ने दो, चार नहीं, बल्कि पूरे सत्रह वर्ष बाद अपनी जांच रपट पूरी की। इस आयोग को अपना कार्य तीन माह में पूरा करना था, लेकिन उसने डेढ़ दशक से ज्यादा समय खपा दिया। यह किसी से छिपा नहीं कि इस आयोग ने अयोध्या मामले की जांच के नाम पर समय और धन की बर्बादी क्यों की?

आयोगों की कार्यप्रणाली और उनके राजनीति से प्रभावित होकर कार्य करने के संदर्भ में गोधरा कांड की जांच करने वाले नानावती आयोग और बनर्जी आयोग का स्मरण होना स्वाभाविक है। इन दोनों आयोगों ने भी एक-दूसरे को खारिज करने वाले निष्कर्ष सामने रखे और इस तरह देश को भ्रमित करने का काम किया। कम से कम अब तो आयोगों के बहाने राजनीति करने का काम बंद होना ही चाहिए। आखिर कब तक आयोगों और समितियों की आड़ में राजनीतिक दल अपने स्वार्थो की पूर्ति करते रहेंगे? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पहली बार केंद्रीय सत्ता की कमान संभालते हुए ऐसे संकेत दिए थे कि वह किस्म-किस्म के आयोगों और समितियों की समीक्षा करेंगे, लेकिन पूरे पांच वर्ष गुजर गए और ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उलटे स्वयं उनकी सरकार ने न जाने कितने आयोग और समितियां गठित कर दीं। ऐसा लगता है कि यह सिलसिला आगे भी कायम रहेगा। यदि वास्तव में ऐसा होता है तो इसका मतलब है कि शासन स्वयं में सुधार लाने के लिए तैयार नहीं। अब यह जरूरी हो गया है कि विभिन्न तरह के आयोगों की कार्यप्रणाली पर नए सिरे से विचार किया जाए। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि केंद्र सरकार कुछ आयोगों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने की तैयारी कर रही है।

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