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शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

इंडिया में बजेगा, इंग्लिस्तान तक गूंजेगा नगाड़ा


फिर से मंचों पर बहर-ए-तबील पर गायन के साथ कड़ ड़ ड़ ड़ ड़ गम का नगाड़ा गूंजेगा। विश्व धरोहर घोषित कनपुरिया नौटंकी पुनर्जीवित हो रही है। विदेशों में धूम मचा रही है। कानपुर में इस पर अगस्त में अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार होगा।

द्विअर्थी संवाद, उश्रृंखलता व अश्लीलता के कारण आम-ओ-खास के बीच से गायब हुई नौटंकी को यूनेस्को ने विशेष नाट्य विधा बता विश्व धरोहर घोषित किया है। तभी से हलचल शुरू हुई। 1920 में अलग रूप में जन्मी इस कला को 1932 में कानपुर में ही 'नौटंकी' नाम मिला और पहली महिला कलाकार गुलाब बाई कानपुर की ही थीं। नौटंकी शादी विवाह की रात घरों में महिलाओं द्वारा खेले जाने वाले स्वांग 'नकटौरा' से निकल कर कानपुर में स्थापित हुई, इसलिए इसके पुनर्जीवन का जिम्मा भी कानपुर ही संभालने जा रहा है। परिवर्तन व टाई यूपी संस्थाओं से जुड़े अनिल गुप्ता, मनोज अग्रवाल, गोपाल सूतवाला, राजीव भाटिया, आईएम रोहतगी व इतिहासकार प्रो. एसपी सिंह ने इसकी पहल की है।

अगस्त में शहर में 'नौटंकी विधा: कानपुर की परंपरा व विरासत' विषय पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार होगा। नौटंकी 'दहीवाली' का मंचन होगा जिसमें गुलाब बाई की पुत्रियां आशा व मधु भी भागीदारी करेंगी।

सात समंदर पार पहुंचा नगाड़ा

देश में प्रोत्साहन व संरक्षण को मोहताज नौटंकी की प्राणवायु रहीं गुलाबबाई ने जब पहली बार 1996 में नौटंकी [कंपनी गुलाब थिएट्रिकल] को त्रिनिडाड-टोबैगो रवाना किया तो विश्वास नहीं था कि यह विदेशों में लोकप्रिय होगी। अब विदेशों में इस पर शोध हो रहे हैं। अमेरिका के ओहायो विश्वविद्यालय में शोधकर्ता देवेंद्र शर्मा ने नौटंकी पर शोध में 'कार्निवाल थ्योरी' में लिखा कि नौटंकी से अधिनायकवाद के प्रति भड़ास निकालने अथवा दबी कुचली भावनाओं व कुंठाओं को सार्वजनिक करने का सहारा मिलता है।

क्राइस्ट चर्च कालेज के इतिहास प्रोफेसर एसपी सिंह कहते हैं कि कानपुर व हाथरस विधाओं की नौटंकी पर शोध का सबसे बड़ा नाम कोलंबिया विश्वविद्यालय की कैथरीन हैंसन का है। उन्होंने अपने शोध ग्राउंड फॉर प्ले: दि नौटंकी थियेटर ऑफ नार्थ इंडिया में नौटंकी के जन्म व कानपुर में हुए विकास का विस्तार से वर्णन किया है।

लोक कलाओं पर शोधकर्ता अवधेश मिश्र के मुताबिक और भी कई देशों में शोध हुए। इनमें शिकागो विश्वविद्यालय के एल्फ हिल्फवेले दि कल्ट ऑफ द्रौपदी [1988], टेक्सास विश्वविद्यालय के एमोस बेन डेन का फोकलेन जेनेर [1976], हवाई विश्वविद्यालय के लिएंडर डेरियस स्वान का थ्रीफार्म ऑफ ट्रेडिशनल थियेटर ऑफ उत्तर प्रदेश, नार्थ इंडिया [1992] आदि हैं।

फ्यूजन से लेकर सिनेमा तक नक्कारा

नौंटंकी दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर व मुंबई पृथ्वी थियेटर से होती हुई बड़े देशों के रंगमंच पर पहुंची। इसे संभव किया दिल्ली विश्वविद्यालय के देवेंद्र शर्मा व मुंबई की पूर्वा नरेश ने। डा. एसपी सिंह कहते हैं कि पूर्वा नरेश ने नौटंकी के समय भेद को लांघा। फिल्म मुझे जीने दो का प्रसिद्ध दादरा गीत 'नदी नारे न जाओ श्याम पैंयां परूं' गुलाब बाई की नौंटंकी की स्थायी प्रस्तुति थी जिसका 1940 के दशक में प्रयोग हुआ। अब फ्यूजन के चलते नौटंकी में दृश्य व श्रृव्य माध्यमों के कई प्रयोग हो रहे हैं।

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