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बुधवार, 29 जुलाई 2009

जुलाई की १०० वी पोस्ट :- विकास योजनाओं का हश्र

उत्तर प्रदेश में सूखे और अन्य समस्याओं के लिए केंद्र सरकार से विशेष पैकेज की मांग कर रही राज्य सरकार को इस सवाल का जवाब देना ही चाहिए कि वह विभिन्न योजनाओं के तहत केंद्र सरकार से मिले करोड़ों रुपये क्यों नहीं खर्च कर सकी है? यह चिंताजनक है कि जिन योजनाओं का धन खर्च नहीं किया जा सका है उसमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के साथ पिछड़े क्षेत्रों के विकास की योजनाएं भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त बारहवें वित्त आयोग की संस्तुति पर प्राप्त धनराशि भी खर्च नहीं की जा सकी है। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि स्वयं अंबेडकर ग्रामों के विकास के लिए धन भी खर्च नहीं किया जा सका है। स्थिति यह है कि अंबेडकर ग्रामसभाओं का पैसा खर्च हो पाने के कारण मुख्यमंत्री को नए गांवों के चयन पर रोक लगानी पड़ी है। यह शुभ संकेत नहीं कि जिन गांवों को 1995-96 में अंबेडकर गावों के रूप में चयनित कर लिया गया था उनका विकास अभी तक आधा-अधूरा है।

इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि अंबेडकर गांवों के विकास के लिए अप्रयुक्त धनराशि लगभग सात सौ करोड़ रुपये है। इससे तो यही संकेत मिलता है कि न तो केंद्र की योजनाएं सही तरह से आगे बढ़ पा रही हैं और न ही खुद राज्य सरकार की। इस पर चिंता करने के पर्याप्त कारण हैं कि बारहवें वित्त आयोग की सिफारिश पर वर्ष 2005 में शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं के विकास के लिए केंद्र से जो धन आवंटित हुआ था उसमें करीब ग्यारह सौ करोड़ रुपये अभी भी अप्रयुक्त हैं। इसका सीधा मतलब यही है कि समस्या धन की नहीं बल्कि उसका सही तरीके से इस्तेमाल न किए जाने की है। यह समस्या यही बताती है कि शासन तंत्र अपनी प्राथमिकताओं के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है। इससे अधिक निराशाजनक और कुछ नहीं हो सकता कि धनराशि उपलब्ध होते हुए भी उसका उपयोग न किया जा सके। जहां तक उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पिछड़े क्षेत्रों के विकास और सूखा राहत के नाम पर केंद्र से पैकेज मांगने की बात है तो इस मांग में कुछ भी अनुचित नहीं, लेकिन कम से कम ऐसी किसी व्यवस्था का निर्माण किया ही जाना चाहिए जिससे विकास योजनाओं का धन अप्रयुक्त न रह जाए।

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