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बुधवार, 22 जुलाई 2009

भिक्षावृत्ति मजबूरी नहीं बन रहा है व्यवसाय

पहले के जमाने में लोग बहुत ही मजबूरी में शर्म से निगाह नीचे करके भिक्षा मांगने जाते थे और भिक्षा भी इतनी जिससे उनका गुजारा हो जाये। मगर आज के इस समय में भिक्षावृत्ति फायदे का व्यवसाय बन गया है। लोग मजबूरी में नहीं फायदे के लिये भिक्षा मांग रहे हैं और शर्म से निगाह नीचे करके नहीं बल्कि अकड़ के ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करके भिक्षा मांगते हैं कि इनकी बातों से अनायास ही गुस्सा आ जाये। जैसे मालिक ने दिया है वही देगा। दाता देने वाला तो बुलाकर देता है। जो खुद नहीं खा सकते वह भला किसी को क्या खिलायेंगे। तमाम ऐसे भिखारी हैं जो एटा, छिबरामऊ तथा फर्रुखाबाद, मैनपुरी आदि शहरों से आकर यहां भिक्षा मांगते हैं। सबसे ज्यादा मुस्लिम भिखारियों की संख्या है। यह जहां हिन्दू आबादी है वहां हिन्दू देवी-देवताओं के नाम पर तथा मुस्लिम आबादी में खुदा के नाम पर भिक्षा मांगते हैं। अनेक महिलाएं भी इस धंधे में लिप्त हैं। जो आदिवासी गिहार जाति की हैं। जो दो-दो या तीन-तीन की टुकड़ी में मुहल्लों में जाकर तब भिक्षा मांगती हैं जब अधिकांश पुरुष अपने काम पर चले जाते हैं। यह मीठी, चिकनी, सुपड़ी बातें करके गृहणियों पर अपना जाल बिछाती है कि बहन मेरे छोटे बच्चे हैं इन्हें पुराने कपडे़ दे दो, अपने लिये साड़ी खाने के लिये भोजन, फिर भिक्षा में आटा तथा नकदी भी पांच-दस रुपये लेकर चलती बनती हैं।

बेवर के पास लालापुर ग्राम के पास ऐसे हरवोला जाति के लोग सदियों से भिक्षावृत्ति करते आ रहे हैं। यह सभी साधु वेष में भिक्षा मांगते हैं। साधु भी 12-13 वर्ष से लेकर 80 वर्ष तक के। प्रात: तड़के यह चन्दन का बढि़या तिलक लगाकर बाहों तथा गले में चंदन का लेप लगाकर पीले वस्त्र पहनकर झोली डालकर, डण्डा पकड़कर, शंख या घंटी बजाते हुये कस्बा तथा ग्रामीण क्षेत्र में भिक्षा मांगने निकल जाते हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें स्कूल में शिक्षा ग्रहण करके एक अच्छा नागरिक बनना चाहिये। उनके मां-बाप इन बच्चों को स्कूल भेजने के बजाये भिक्षा मांगने भेज देते हैं।

आशा है प्रशासन केवल नाम के लिए ही 'स्कूल चलो - स्कूल चलो' नहीं कहेता रहेगा बल्कि इन लोग को भी मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास करेगा |

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