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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

ममता भरा रेल अर्थशास्त्र -- डा. गौरीशंकर राजहंस


यह महज एक संयोग था कि 8वीं लोकसभा में सुनील दत्त, ममता बनर्जी और मैं एक ही सीट पर पांच वर्षो तक बैठते रहे। हमारे ठीक पीछे अमिताभ बच्चन बैठते थे। सुनील दत्त अत्यंत ही विनोदी स्वभाव के व्यक्ति थे और ममता बनर्जी से हंसी-मजाक करने में जरा भी संकोच नहीं करते थे। जब भी ममता बनर्जी सदन में बोलने के लिए खड़ी होती थीं तो सुनील दत्त चुटकी लेते हुए कहते थे कि अब ममता की 'तूफान मेल' शुरू होगी और आधे घंटे से पहले वह नहीं रुकेंगी। न तो स्पीकर की सुनेंगी और न माकपा की हूटिंग से डरेंगी। वह बंगाल की शेरनी हैं। शुरू में ममता बनर्जी को लोकसभा में बोलने में बहुत संकोच होता था, परंतु कुछ मित्रों ने उनमें आत्मविश्वास पैदा किया और कहा-'आप कोलकाता की कालीबाड़ी में रहती है जहां बिहार और उत्तर प्रदेश के हजारों लोग रहते है। इसलिए यदि आप टूटी-फूटी हिंदी में भी भाषण दें तो सारा सदन उसकी तारीफ करेगा। हुआ भी वही। उनके पहले भाषण का ही सांसदों ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया। दूसरे दिन दिल्ली के कई प्रमुख समाचार पत्रों ने लिखा कि ममता हिंदी की बिंदी है। तब से आज तक ममता ने अपने अधिकांश भाषण हिंदी में ही दिए हैं। 8वीं लोकसभा में गुलामनबी आजाद संसदीय कार्य मंत्री थे। प्रति वर्ष बजट सत्र में उनका आग्रह था कि कांग्रेसी सांसद 3 विषयों में से किसी एक पर ही भाषण दें-राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद, रेल बजट और आम बजट, क्योंकि बोलने वाले अनेक सांसद है। सुनील दत्त और मैं आम बजट पर बोला करते थे। ममता नियमपूर्वक रेल बजट पर बोलती थीं। मैंने इसके रहस्य के बारे में पूछा तो उन्होंने हंसकर कहा कि उन्हे रेल से बचपन से ही लगाव है। उनके क्षेत्र के लोग जब सुनेंगे कि ममता ने उनके लिए और अधिक ट्रेनों और रेल लाइनों की मांग की है तो उन्हे बड़ी खुशी होगी।

ममता शुरू से ही बंगाल के 'लेफ्ट' के खिलाफ थीं। एक बार बंगाल के एक अत्यंत ही सीनियर वामपंथी सांसद से उनकी लोकसभा में तीखी नोक-झोंक हो गई। ये सांसद बाद में गैर-कांग्रेसी सरकार में एक शीर्ष मंत्री हुए थे। उन दिनों हरियाणा के एक वरिष्ठ मंत्री की पुत्रवधू ने आत्महत्या कर ली थी। ममता का कहना था कि इस मामले पर लोकसभा में बहस होनी चाहिए। 'लेफ्ट' के उक्त सांसद ने कहा कि यह राज्य का विषय है और इस पर लोकसभा में बहस नहीं हो सकती है। स्पीकर बलराम जाखड़ दोनों को शांत करने का प्रयास कर रहे थे। अचानक ममता ने अपने हाथ से दो चूड़ियां निकालीं और उक्त सांसद के पास जाकर कहा-'चूड़ियां पहन लो और घर पर बैठो'। सारा सदन स्तब्ध रह गया और बलराम जाखड़ ने थोड़ी देर के लिए सदन की कार्रवाई रोक दी। ममता गुस्से में कुछ देर के लिए सेंट्रल हाल चली गईं। उक्त सांसद मेरी सीट पर आए और कहने लगे-'ममता को समझाइए। वह आपकी बात सुनेगी। उन्हे जो कुछ भी कहना हो अकेले में कहे। मेरे कहने पर ममता आदरपूर्वक उक्त सांसद के पास गईं, परंतु कहा कि महिलाओं पर अत्याचार वह कभी बर्दाश्त नहीं करेंगी और सदन में इस विषय पर बहस होकर रहेगी। अंत में बलराम जाखड़ को उस विषय पर बहस करानी ही पड़ी। ममता ने अभी-अभी जिस रेल बजट को लोकसभा में पेश किया है उसकी तारीफ समाज के हर तबके ने की है। ममता ने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की होगी कि उनके रेल बजट की इतनी तारीफ होगी। संसद में बजट भाषण देने के बाद ममता जब सेंट्रल हाल आईं तो मानो सारा सेंट्रल हाल उमड़ कर उनके पास चला गया। संभवत: इस तरह की बधाई की उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी।

ममता के रेल बजट में अनेक नई बातें है, जो पहले किसी बजट में नहीं थीं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ठीक ही कहा है कि यह बजट रेल के सफर को सुखद बनाएगा। कम समय में एक प्रभावी प्रदर्शन किया गया है। यह बजट यात्री किराया और माल भाड़े में बढ़ोतरी के जरिए कोई बोझ नहीं डालता है। अंग्रेज भारत में रेल लाए थे। ब्रिटिश पार्लियामेंट में कई बार रेल की उपयोगिता को लेकर बहस हुई है और हर बार प्रधानमंत्री तथा रेल मंत्री ने यही कहा है कि ब्रिटेन एक 'वेलफेयर स्टेट' है। रेल मुनाफा कमाने के लिए नहीं है, बल्कि आम जनता को सुविधा प्रदान करने के लिए है। इसलिए रेल मंत्रालय से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह मुनाफा कमाकर सरकार को देगा, बल्कि यह देखना चाहिए कि उसने जनता की आकांक्षाओं को किस हद तक पूरा किया है। ब्रिटेन के कई विश्वविद्यालयों में यहां तक कि 'लंदन स्कूल आफ इकनामिक्स' में 'रेल इकनामिक्स' पर कई पीएचडी थीसिस लिखे गए है, जो बाद में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए है। सभी का निष्कर्ष यही है कि रेल मंत्रालय और रेल विभाग जन कल्याण के लिए है।

यदि ममता ने रेलवे के गत पांच वर्षो के कार्यकलापों पर 'श्वेत-पत्र' लाने की बात की है तो इसमें किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। 'श्वेत-पत्र' आने से दूध का दूध और पानी का पानी स्पष्ट हो जाएगा। यह पता चल जाएगा कि कहां-कहां से रेल की आमदनी आई और कहां-कहां वह पैसा खर्च किया गया? श्वेत पत्र से प्रशासन में पारदर्शिता आएगी और हर मंत्री यही सोचेगा कि उसके हटने के बाद श्वेतपत्र लाकर उसके कार्यों की समीक्षा की जाएगी। कई लोगों को आशंका है कि सरकारी अफसर शायद ममता के सपनों को साकार नहीं होने देंगे। ममता प्राय: कहा करती हैं-'कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ, जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ'। जिस दिन वह समझ जाएंगी कि उन्हे पूरा सहयोग नहीं मिल रहा है वह अपना झोला उठाएंगी और अपनी टूटी-फूटी गाड़ी में बैठकर रेल भवन को सदा के लिए अलविदा कह कर चल देंगी, क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है। उन्हे यह संतोष होगा कि जन कल्याण के लिए उन्होंने एक जोरदार प्रयास अवश्य किया था।

-- डा. गौरीशंकर राजहंस: [लेखक पूर्व सांसद एंवं पूर्व राजदूत हैं]

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जागरण से साभार |

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